• नये अनाज का भोग लगाने की सदियों पुरानी है परंपरा
  • सामूहिकता और एकता की भावना का जन जागरण करते हैं उत्सव मेले
  • नौठा कौथिग में चांदपुर व लोहबा, खंसर पट्टी के गांव करते हैं प्रतिभाग 

देवभूमि मीडिया ब्यूरो 

देहरादून : इतिहास के पन्नों में संवत 900 में आदिबदरी मंदिर समूह की स्थापना का इतिहास आज भी जिन्दा है आज भी वे परम्परायें जीवित हैं जब नई फसल पकने के बाद भगवान को पहला भोग लगाये जाने के लिए संघर्ष होता था। पलायन की मार के चलते भले ही खेती करने वाले परिवार गांवों में सिमट गए हों लेकिन आज भी परंपरा प्रतीक के रूप में यहां जिंदा है। पहाड़ में धार्मिक परंपराओं का निर्वहन आज भी स्थानीय ग्रामीण बखूबी निभाते हैं। वक्त बदल रहा है लेकिन आस्था व विश्वास की जड़ें आज भी गहरी और मजबूत हैं। भले ही परिस्थितियां विषम ही क्यों न हों जनपद चमोली के चांदपुरपट्टी के आदिबदरी धाम में नये अनाज का भोग लगाने के लिए कभी खूनी संघर्ष की परंपरा का प्रतीक स्वरूप लाठी-डंडे का युद्ध के प्रतीक रस्म निभाने की परंपरा आज भी जिन्दा है।

”सामाजिक कार्यकर्ता नरेन्द्र सिंह चाकर कहते हैं कि भले ही गांवों में खेती करने वाले परिवारों की संख्या सिमटती जा रही है लेकिन ग्रामीण आज भी आदिबदरी धाम में नये अनाज का भोग चढ़ाने की अनूठी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।”

नये अनाज का श्री आदिबदरीजी को भोग लगाये जाने के अवसर पर होने वाली विशेष पूजा का आज भी विधान कायम है। अंतर इतना भर आया है कि रस्म निर्वहन पूर्व की भांति खूनी संघर्ष के रूप में नहीं होता। आसपास के गांवों  खेती, रंडोली, पजियाणा, नगली के ग्रामीण पहले से तैयार लाठी-डंडों को प्रतीकात्मक रूप से चलाकर प्रथम पूजा का विधान आज भी पूरा करते हैं।

इस बार 13 मई को यह विशेष पूजा आदिबदरीधाम मंदिर समूह परिसर में होगी जिसके लिए मंदिर समिति ने मंदिर को सजाने व तीन दिवसीय नौठा कौथिग की तैयारियां शुरू कर दी है। 11 मई से प्रारंभ होने वाले मेले में शिक्षण संस्थाओं सहित महिला मंगल दलों के कार्यक्रम एवं उत्तराखंड संस्कृति विभाग की टीम की रात्रि सांस्कृतिक संध्या का कार्यक्रम रखा गया है।

नौठा मेले के संबंध में मान्यता है कि संवत 900 में क्षेत्र नरोठा मठ के रूप में प्रसिद्ध था, और समय बदलने के साथ यह परंपरा अपभ्रंश होकर नौठा कौथिग के रूप में मनाये जाने लगी। पूर्व में क्षेत्रवासी नये अनाज का भोग लगाने के लिए शक्ति प्रदर्शन कर प्रथम पूजा में भाग लेते थे यह प्रदर्शन खूनी संघर्ष रूप भी ले लेता था। इसके बाद विजेता ग्रामीण आदिबदरीधाम में नये अनाज का भोग लगाता था।

उल्लेखनीय है कि जनपद चमोली के आदिबदरी धाम में हर वर्ष वैशाखी के बाद आने वाले पांचवे सोमवार को यह पर्व मनाया जाता है और इस बार 13 मई को होने वाले नौठा कौथिग में चांदपुर व लोहबा, खंसर पट्टी के दर्जनों गांव के ग्रामीण प्रतीकात्मक रूप में खेती से नारायण की डोली के साथ मंदिर प्रांगण पहुंचते हैं, जहां चौफला, चांछडी आदि सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ प्यूंरा के पाडवाणी गायक कुताल सिंह पांडव लीला का गायन करते हैं।

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