”उत्तर भारत लाइव” ने कुछ दिनों पहले अपनी स्पेशल स्टोरी ”अजेय रहेंगे त्रिवेंद्र” में बता दिया था कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा करेंगे

आशीष कुमार ध्यानी
देहरादून। दिल्ली विधानसभा का चुनाव संपन्न होने के साथ ही उत्तराखंड के मुखिया के बदले जाने की खबर सूबे के वेब पोर्टलों और सोशल मीडिया में सुर्खियों पर है। समाचार जगत से संबंधित व्हाट्सअप या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को बदले जाने की खबर (प्रमाणहीन) से संबंधित दिन में चार से छह पोस्ट अवश्य पड़ रही है। हालांकि उत्तर भारत लाइव ने कुछ दिनों पहले अपनी स्पेशल स्टोरी अजेय रहेंगे त्रिवेंद्र में बता दिया था कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा करेंगे।

अब यह बात समझ से परे हैं कि दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की हार का ठीकरा आखिर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पर क्यों फोड़ा जा रहा है? क्या वो दिल्ली विधानसभा चुनाव के प्रभारी थे, या फिर उनके किसी बयान ने पार्टी के खिलाफ वोटिंग की वजह रहा। क्या वो दिल्ली की हर विधानसभा क्षेत्र में रैली कर रहे थे, या फिर में दिल्ली विधानसभा में पार्टी के तरफ से लड़ रहे प्रत्याशियों का चयन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने किया था। उत्तर भारत लाइव की पड़ताल में ऐसी कोई भी चीज सामने निकल कर नहीं आई है कि जिसमें दिल्ली विधानसभा चुनाव के हार का कारण मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत हैं।

उत्तराखंड के न्यूज वेब पोर्टलों को पीएमओ सीधे करता है रिपोर्ट!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में जाना जाता है कि जब तक वो न चाहे किसी को भी पता नहीं चलता कि वो क्या करने वाले है? यहां तक कि उनके खास रणनीतिकारों को भी। यहां तक कह सकते हैं कि उनके दाएं को भी पता नहीं होता कि बायां हाथ क्या करने वाला है। पर उत्तराखंड के वे न्यूज वेब पोर्टल जिन्हें शायद उनका पड़ोसी भी नहीं जानता, संभव है कि उनके परिवार के सदस्य भी न जानते हो उनको पीएमओ और लुटियन जोंस की पूरी खबर रहती है। वो जिस तरह से खबरों को ब्रेक करते हैं उसे देखकर लगता है कि जैसे पीएमओ उन्हें स्वयं रिपोर्ट करता हो। बस इन संस्थानों की खबर त्रिवेंद्र सिंह रावत को कुर्सी से हटाने तक ही सीमित रहती है। उत्तराखंड में शायद ही कोई हफ्ता बीतता हो जब किसी न किसी संस्थान में त्रिवेंद्र सिंह रावत को बदलने की खबर न ब्रेक होती हो।

आखिर किसे बनाना चाहते हैं ये मुख्यमंत्री?

ये संस्थान त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री के पद से हटाकर किसे कुर्सी सौंपना चाहते है ये स्पष्ट नहीं करते हैं? जब इनकी लुटियन जोंस और पीएमओ में इतनी पकड़ हैं तो उस चेहरे को भी बता दें जिसे उत्तराखंड का अगला मुख्यमंत्री बनाया जाने वाला है। साथ ही वो पैमाना भी बता दें जिसके आधार पर त्रिवेंद्र सिंह रावत की कुर्सी छीनी जाएगी और दूसरे चेहरे को ये कुर्सी दी जाएगी।

समय-समय पर उड़ती रहती है अफवाह

भारतीय जनता पार्टी में ही कई ऐसे चेहरे हैं तो त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल को नहीं पचा पा रहे हैं। इनमें से ज्यादातर वो दिग्गज हैं जो अपनी जिम्मेदारियों का सही से निर्वहन तो नहीं कर पाए पर कुर्सी पर बैठने की तमन्ना भी खत्म नहीं कर पाएं। इनमें से कई ऐसे भी चेहरे हैं जिनके काले कारनामों को त्रिवेंद्र सिंह रावत ने हरी झंडी नहीं दिखाई। कुछ ऐसे भी दिग्गज है जिनकी पहले पार्टी और प्रदेश में जमकर पूछताछ होती थी पर आजकल इनके इलाके का छोटा मोटा नेता भी देखकर दूर से ही किनारे हो लेता है। पहले ये मीडिया में जमकर दिखावा करते थे, जनता के हितैषी बनकर ये नेता जमकर कोरी घोषणाएं करते रहते थे। पर आजकल न तो मीडिया इन्हें तवज्जों दे रहा है न ही इनके संगठन के लोग।

 नहीं मिल पा रही मलाई तो ये ख़बर फैलाई 

पार्टी में ही कुछ ऐसे भी छुटभैय्या नेता है जो लंबे समय से मलाईदार पद की आकांक्षा पाले बैठे हैं। प्रदेश में पार्टी की सरकार को तीन साल पूरे होने वाले हैं पर इन नेताओं को अभी तक सत्ता का रसापान नहीं मिल पाया है। इन चेहरों को लग रहा है कि अगर ऐसा ही रहा तो सत्ता के पांच साल रुखे-सूखे बीत जाएंगे। जो थोड़ा बहुत इलाके में रसूख बचा है वो भी खत्म हो जाएगा। ये वहीं नेतागण है जो कि आए दिन दिल्ली का भ्रमण करते हैं। कभी किसी के कोटा का टिकट लेकर तो कभी किसी का काम करवाने के एवज में उसकी लग्जरी गाड़ी से दिल्ली दरबार पहुंच जाते हैं। वहां पार्टी के किसी बड़े चेहरे से मिल लिए और प्रदेश आते ही बता दिया जल्द ही मुख्यमंत्री बदल जाएगा फिर आपका काम करवा देंगे।

त्रिवेंद्र से पहले तो फिर पार्टी के बड़े चेहरे को हटाना पड़ेगा

अगर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाने का पैमाना दिल्ली या झारखंड विधानसभा का चुनाव है तो सबसे पहली गाज प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, समेत कई प्रदेशों के पार्टी अध्यक्ष, सैकड़ों सांसद, कई प्रभारी ऐसे न जाने कितने नाम होंगे। इसके बाद कहीं जाकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का नंबर आएगा। अतः ऐसे लोगों को इस तरह की ब्रेकिंग समाचार देने से पहले खबरों की प्रमाणिकता की जांच कर लेनी होगी। इस संस्थानों का दायित्व बनता है कि क्षेत्रीय स्तर पर जो समस्याएं हैं उन्हें प्रमुखता से सरकार के सामने लाएं, भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करें। जिससे सरकार प्रदेश की जनता के हित में कार्य कर सकें।

(नोट- लेखक किसी भी सरकार या चेहरे का पक्ष नहीं ले रहा है। बस मीडिया में चल रही इस तरह की अफवाहों पर अपने विचार व्यक्त कर रहा है। लेखक का मानना है कि मीडिया को अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए व भ्रम फैलाने वाले समाचारों से बचना चाहिए, ताकि मीडिया की प्रमाणिकता बची है। इन्ही सबको दृष्टिगत रखते हुए लेखक ने ये टिप्पणी की है)