सुप्रसिद्ध लोकगायक हीरासिंह राणा बने दिल्ली सरकार में पहले उत्तराखंडी लोकभाषाओं के उपाध्यक्ष !

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हीरा सिंह राणा अभी तक नहीं मिला कोई अधिकारिक पत्र 

सी एम पपनै 

नई दिल्ली। दिल्ली सरकार के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्वीट कर उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध लोकगायक व जनकवि हीरा सिंह राणा को कुमांउनी, गढ़वाली व जौनसारी भाषा अकादमी का पहला उपाध्यक्ष बनाऐ जाने की सूचना जारी की है। इस बावत हीरासिंह राणा से संपर्क कर अवगत हुआ, अभी तक उन्हे कोई अधिकारिक पत्र नही सौपा गया है।

खबर ट्वीट होते ही दिल्ली प्रवास मे निवासरत उत्तराखंडियों व विभिन्न नगरों मे बसे उत्तराखंडी समाजो के बीच खुशी की लहर दौड़ गई। कुमांउनी, गढ़वाली व जौनसारी बोली-भाषा को आंठवी अनुसूचि मे स्थान दिलवाने व दिल्ली मे उत्तराखंडी बोली-भाषा अकादमी की मांग हेतु आवाज विगत कई वर्षो से उठनी शुरू हो गई थी। प्रबुद्ध सामाजिक संस्थाओं द्वारा मांग मनवाने हेतु संघर्ष यथावत जारी था।

दिल्ली की केजरीवाल सरकार द्वारा दो वर्ष पूर्व उक्त मांग पर गौर फरमा, जल्द ही अकादमी खुलवाने की घोषणा कर दी गई थी। इंतजार था, मौके का।

16 सितम्बर को पश्चिमी विनोदनगर दिल्ली मे उत्तराखंड के सु-प्रसिद्ध लोक गायक व कवि हीरासिंह राणा का 77वा जयंती समारोह ‘लोक संस्कृति सम्मान दिवस’ के रूप मे बड़े धूमधाम से मनाया गया था। दिल्ली सरकार के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की अनुपस्थिति मे उनके ओएसडी कार्यक्रम मे मौजूद थे।

उक्त जयन्ती समारोह मे वक्ताओ द्वारा केंद्र सरकार के साथ-साथ उत्तराखंड तथा दिल्ली की राज्य सरकारों को इस सु-प्रसिद्ध लोकगायक व जनकवि को उनके द्वारा उत्तराखंड की लोक संस्कृति, साहित्य व लोकगायन के क्षेत्र मे दिए गए अतुलनीय योगदान पर स्थापित सरकारों द्वारा लंबी अवधि निकल जाने पर भी किसी भी सम्मान से वंचित रखने पर आक्रोश व्यक्त किया गया था। स्थापित सरकारों की नीतियों की कड़े शब्दों मे निंदा की गई थी।

वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया था, एक ओर जहां बड़ी तादात मे सामाजिक व सांस्कृतिक संस्थाए अपने लोकप्रिय गायक व कवि को सम्मानित करने हेतु कतार मे खड़ी रहती हैं, वही दूसरी ओर स्थापित सरकारो द्वारा इस बहुप्रतिष्ठित लोकगायक व कवि की निरंतर अवहेलना करना सरकारों की बदनियती का खुलासा करती है। सवाल खड़े करती हैं।

वक्ताओं की बात दिल्ली सरकार तक पहुचने की देर थी, फैसला ले लिया गया हीरासिंह राणा को कुमांउनी, गढ़वाली, जौनसारी भाषा अकादमी का पहला उपाध्यक्ष बनाए जाने का।

दिल्ली सरकार के उप-मुख्यमंत्री ने अकादमी के गठन पर व्यक्त किया, ‘दिल्ली सांस्कृतिक रूप से अति स्मृद्ध महानगर है। हम लोगो को एक ऐसा प्लेटफार्म मुहैया कराना चाहते हैं, जहां वह अपनी कला और संस्कृति से रूबरू हो सके, साथ ही दिल्ली के लोगों को उत्तराखंड की स्मृद्ध लोक सांस्कृतिक परम्पराओं व विधाओं के ज्ञान से अवगत करा सके।

उन्होंने कहा, गठित अकादमी भाषा और संस्कृति मे बेहतरीन काम करने वालो को प्रोत्साहन देने के लिए विभिन्न तरह के पुरूष्कार शुरू करेगी। अकादमी के जरिए भाषाई कोर्स भी शुरू किए जायेंगे। कुमांउनी, गढ़वाली व जौनसारी सांस्कृतिक, साहित्यिक व अन्य लोक कला की विधाओ से सबद्ध कार्यक्रमो का बृहद तौर पर आयोजन करने के साथ-साथ उनका संवर्धन व संरक्षण भी किया जायेगा।

उत्तराखंडी लोकभाषा व संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए दिल्ली सरकार द्वारा घोषित अकादमी उपाध्यक्ष सुप्रसिद्ध लोकगायक व कवि हीरा सिंह राणा के कृतित्व व व्यक्तित्व का अवलोकन कर ज्ञात होता है, इस लोकगायक ने अपने सरोकारों को अपने गीतों मे रच कर उत्तराखंड के लोक साहित्य व लोक गायन पर अपनी सृजनशीलता बनाए रखी। अपने मधुर कंठ के गायन व हुड़का वादन से लोगो को रिझाया, जिसे सुनने को लोग सदा ललाइत रहे। श्रोताओं ने जब भी जिस गीत को गाने की फरमाइश की सहर्ष गाया। यह धारणा इस लोकगायक को एक जनगायक की प्रसिद्धि की ओर ले गया। चेतना जगा कर फलक का व्यापक रहना, समाज की संवेदनाओ को कविताओं व गीतों मे उतार कर निराले प्रभावशाली अंदाज मे प्रस्तुत कर समाज के प्रत्येक वर्ग को झकझोरना, जिनमे दुःख, दर्द,संघर्ष व पलायन की पीड़ा के साथ-साथ सौन्दर्य भी समाया हुआ रहा, इस रचियता की रचनाशीलता की ताकत के रूप मे चरितार्थ हुआ। रची रचनाओं मे गति प्रवाह व समुद्र की गहराई देखी गई। जन आंदोलनों मे स्वरचित क्रांतिकारी गीतों को गाकर राष्ट्रीय चेतना जगाने के कारण हीरासिंह राणा को राष्ट्रीय कवि के तौर पर आंक, हिंदी साहित्य की अमर विभुति का दर्जा हासिल हुआ।

हीरासिंह राणा ने अपनी रचनाओं के माध्यम से लोगो को जीवन के उतार-चढ़ाव के रास्तों से अवगत करा, उन्हे संघर्ष करने की सीख दी साथ ही रास्ता भी सुझाया, जिसे एक मिशाल के रूप मे ही नही देखा गया, बल्कि यह सब इस लोकगायक व रचयिता की प्रसिद्धि व खासियत के रूप मे चर्चा का विषय भी निरंतर बना रहा। श्रोताओं के मध्य इस मौलिक रचनाकार की रचना व बेमिशाल गायन विधा की कला को कोई नही भूल सकता, माना जा सकता है। इस लोकगायक के गीतों व रचनाओं को सुन प्रवास मे लोगों को गांव की याद आ जाती है, उन्हे अपनी जडों से मिलने का अवसर मिलता है।