अपरिभाषित युद्ध कोरोना वार

आर्थिक गतिविधियां बन्द तो अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार धड़ाम

हरीश सती

हम लोग अपनी स्कूल के दिनों से पढ़ते आये कि अमेरिका और रूस के बीच स्टार्ट संधि, NPT( परमाणु अप्रसार संधि)। भारत ने तो पोखरण के बाद प्रतिबंध भी झेले। सद्दाम हुसैन का किस्सा भी याद है न रासायनिक हथियारों के चलते? परमाणु हथियारों के चलते अमेरिका और नार्थ कोरिया की तनातनी तो ताज़ा ही है।लोग भविष्य में परमाणु, रासायनिक या साइबर वॉर की अनहोनी से चिंतित थे।पर यहां तो एक विषाणु निकला।

क्या ये बात इतनी आसानी से पचायी जा सकेगी कि कोरोना वायरस वुहान से पौने दो सौ देशों में पहुँच गया लेकिन शंघाई, बीजिंग और शेनझेन नहीं पहुंचा। अगर वुहान सील होने से शंघाई और बीजिंग बच गए तो गया तो इटली,स्पेन, ईरान, जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका, साउथ कोरिया क्यों नहीं बचे। और रूस और नार्थ कोरिया बच गए। और विषाणु भी इतना अजीबोगरीब कि इलाज का न होना तो अलग बात है लेकिन इस वायरस के काम करने का मेकेनिज़्म भी नेचूरल सा नहीं लग रहा। SARS का विषाणु तो जल्दी ही अपने लक्षण प्रकट कर देता था पर ये पूरे 14 दिन तक सबको संक्रमित करने के बाद ही सामने आता हैं।इसे तेजी से फैलाया जा सकता है। जब तक वैक्सीन नहीं मिलती तब तक रोकने का एक ही तरीका क्वारेन्टीन। यानी सारी गतिविधियां बन्द। सारी गतिविधियां बन्द तो आर्थिक गतिविधियां भी बंद । आर्थिक गतिविधियां बन्द तो अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार धड़ाम।

कोरोना वायरस फैलने के बाद के घटनाक्रम पर बाद में बात करेंगे। पहले चीन की विश्वव्यापी होती जा रही नीतियों और आक्रामक भूराजनीतिक और आर्थिक गतिविधियों पर संक्षेप में ध्यान दिलाना चाहेंगे। चीन के अपने किसी भी पड़ोसी देश से सहज शान्तिप्रिय संबंध शायद कल्पना से परे की चीज है। वियतनाम, हांग कांग से लेकर ताईवान तक। हर पड़ोसी देश से सीमा विवाद। पहले चीन सागर में बर्चस्व फिर हिन्द महासागर में कब्ज़ा करने की रणनीति के तहत म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव, मॉरिशस, पाकिस्तान , नेपाल , ईरान,यमन, बहरीन,कतर में बेहद रणनीतिक आर्थिक गतिविधियों की आड़ में आक्रामक सामरिक नीति।

अपनी अलोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के कारण और श्रम कानूनों की दृष्टि से सस्ते गुलाम से श्रमिकों के चलते SEZ व्यवस्था को सफल बनाना और दुनिया के अन्य देशों से एकपक्षीय व्यापार चलाने में सफल रहना। और फिर धन के बूते दुनियाभर में फैले शीतयुद्ध के समय रेडिक्लाइज़ हुए और वर्ग संघर्ष और नास्तिकता के रोमांटिज़्म में अभिभूत लालची तत्वों के द्वारा अमेरिका विरोधी अभियान चलवाना और उस विचार उपकरण से पूंजीवाद के नाम पर प्रतिद्वंद्वी देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था की कमजोरियों का लाभ उठाकर उन्हें और कमजोर करना और इन्ही भ्रष्ट लोगों के माध्यम से उन देशों में अपने व्यापारिक और सामरिक हित साधना। चीन की महत्त्वाकांक्षाएं इतनी अधिक बढ़ गयी है कि उसने अपनी आक्रामक व्यापारिक और सामरिक नीतियों के तहत पश्चिम एशिया और यूरोप के बाजारों तक पहुंचने के लिए **वन बेल्ट वन रोड**जैसी महत्वाकांक्षी योजना में भारी भरकम निवेश कर डाला। पटाने में आ सकने वाले विश्व के अधिकांश देशों में निवेश किया है। लेकिन इसमें से बहुत सा निवेश खटाई में पड़ने से उसकी अर्थव्यवस्था चरमराने कीआशंका थी। तो उसने अपने व्यापारिक प्रतिद्वंदी अमेरिका का ध्यान बांटने के लिए बेहद गैर जिम्मेदार तरीके से अलग थलग पड़े देशों को प्रतिबंधित परमाणु कार्यक्रमों को चलाने के लिए उकसाया। जैसे पाकिस्तान,ईरान उत्तरी कोरिया।इन देशों ने क्या अपनी आंतरिक समस्याओं पर विजय प्राप्त कर ली जो अब वे परमाणु कार्यक्रम को प्राथमिकता में रखने लगे। लेकिन चीन ने उन्हें सिखाया इस परमाणु हथियार के नाम पर विश्व को कैसे ब्लैकमेल किया जा सकता है। ये सभी देश चीन के बहकावे में उल्टे से उल्टा कदम उठाते रहे।

स्पष्ट है चीन के ज्यादा ही अनैतिक अतीत के कारण ही उसके सीमावर्ती और विश्व के अन्य देश सचेत हुए। जब इटली ने यूरोप में अपने यहाँ चल रहे आर्थिक संकट के चलते चीन से व्यापारिक निकटता बढ़ायी तो तब भी पाश्चात्य देशों जैसों G-7 के देशों ने तीखी आपत्ति जताई थी।पुनः अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते अलग थलग पड़ा ईरान भी चीन के चंगुल में फंस गया। यहां तक कि अमेरिका को चिढ़ाने के लिए क्वॉम में परमाणु कार्यक्रम भी चीन की सहायता से चलाने पर अड़ा रहा। चीन की कुसंगत ने उसे फिर से अनावश्यक अमेरिका को चिढ़ाने वाला देश बना दिया।इसी बीच ईरानी जनरल सुलेमानी भी अमेरिकी हमले में मारा गया। इधर पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया के मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम में चीन का योगदान किसी से छिपा नहीं है। दुनिया में अमेरिकी विरोध के नाम पर हर गलत चीज को अपने स्वार्थ के लिए उसने पनपाया। आंतकवाद पर भारत के खिलाफ सयुंक्त राष्ट्र संघ में चीन का स्टैंड भी आपने देखा ही होगा।

लेकिन भारत की जबरदस्त रणनीति के कारण पाकिस्तान की बिगड़ती हालात के चलते वन बेल्ट वन रोड की परियोजना में किया निवेश पर पानी फिरता दिखाई दिया। और उधर ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के चलते वन बेल्ट वन रोड परियोजना पूरी तरह लड़खड़ाते दिखी। उधर ट्रम्प ने चीन के व्यापार पर शिकंजा कसना शुरू किया तो चीन की स्थिति खराब होनी शुरू हुईं और अमेरिका की सुधरनी। दोनों देशों में ट्रेड वार शुरू हुआ। अमेरिका के विपक्षी दलों ने भी जो ट्रम्प पर रूस के हाथों में खेलने का आरोप लगाते थे। ट्रम्प को नीचा दिखाने के हर वो काम किया जिससे चीन को ही लाभ हुआ। नैंसी पेलोसी द्वारा लाया गया महाभियोग से अमेरिका को भला क्या लाभ होना था? सिवाय अपने चुनावी लाभ के।पता नहीं अमेरिकी चुनावों के बीच ट्रम्प के भारत दौरे के समय भड़का दिल्ली दंगे के तार भी कहाँ -कहाँ जुड़े है?इधर चीन ने भले ही अपनी अर्थव्यवस्था को सामान्य दिखाया हो लेकिन चीन अंदर से कई आर्थिक और राजनैतिक चुनौतियों से जूझ रहा है। आपको डोकलाम पर चीन के कदम पीछे खींचने का वाकया भी याद होगा।

हम ये तो नहीं कह सकते की कोरोना वायरस चीन का हताशा में तैयार किया हुआ वायरस है। लेकिन कुछ बाते तो एक सामान्य आदमी की बुद्धि में भी आ सकती है जो नियमित समाचार पड़ता हो, कि जो वायरस दुनिया के पौने दो सौ देशों में फैल गया वो शंघाई, बीजिंग और शेनयांग तक नहीं पहुँचा। जिससे ऑस्ट्रेलिया के गगृह मंत्री पीटर हट्टन, ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री नॉरिस डोरिस स्पेन की उप प्रधानमंत्री कारमन काल्वो, कनाडा के प्रधानमंत्री की पत्नी सोफी जार्जियस ट्रेड्यू,ब्रिटेन के चार्ल्स मोनाको के राजा प्रिंस अल्बर्ट और कई बॉलीवुड स्टार जैसे टॉम हैंक्स, रीता विल्सन,केरी लेन्की, इद्रीस एल्बा जैसे सैकड़ों बड़ी बड़ी सेलेब्रिटीज़ संक्रमित हो गयी।ईरान के राष्ट्रपति के सलाहकार मोहम्मद मिर तो जीवित भी न रह सके।लेकिन चीन में कोरोना वायरस से न कोई नेता न कोई बड़ा आर्मी अफ़सर संक्रमित हुआ। न वहां की सामरिक राजधानी बीजिंग न आर्थिक राजधानी शंघाई में कुछ हुआ।

एक सामान्य ही व्यक्ति समाचारों और घटनाक्रमों पर थोड़ा और दिमाग लगाये तो पायेगा जिस तरह से चीन ने वुहान में, इस कोरोना संक्रमण के हालात में,सिर्फ दो हफ्ते में 12000 बिस्तरों का अस्पताल तैयार करने का चमत्कार किया ।और जो तैयारियां और प्रयुक्त उपकरण सोशल मीडिया पर हमने देखी उससे कई सवाल मस्तिष्क में कौंधते है कि क्या चीन ने इस तरह के वायरस युद्ध से लड़ने के लिए पहले से ही युध्द स्तर की तैयारियां कर रखी थी। क्योंकि जो क्वारेन्टीन और सेनेटाइज़ करने जैसे अन्य उपाय हैं, वो तो विश्व की महाशक्ति अमेरिका और अन्य सक्षम देश भी कर रहे हैं। पर मामला है कि उनसे थमता ही नहीं।

लेकिन यदि आप सोशल मीडिया के माध्यम से घटनाक्रम पर पैनी निगाह रखते हैं तो सारे घटनाक्रम की तस्वीर कुछ स्क्रिप्टनुमा सी होती चली जाती है। जब यह जानकारी आती है कि चीन ने शरुआती दौर में इस कोरोना जन्य संक्रमण को छुपाए रखा।इसके शरुआती सेंपल को नष्ट कर दिया। इसको सबसे पहले सामने लाने वाले डॉक्टर ली वेन लियांग और पत्रकार के साथ जो हुआ वह संदेह के दायरे में है। WHO के निदेशक भी इसी दौरान जनवरी में चीन में थे और 11 जनवरी तक WHO लगातार दावा कर रहा था कि यह संक्रमण आदमी से आदमी में नहीं फैल सकता और अंतरराष्ट्रीय उड़ाने उड़ान भरती रही। लाखों लोगों को वुहान से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों से जाने दिया गया।आश्चर्य है कि इन फ़्लाईटस ने शंघाई और बीजिंग की उड़ान नहीं भरी क्या? यदि भरी तो क्या वहां संक्रमित लोग नहीं गए?अद्भुत संयोग है। चीन में कोरोना के संक्रमण के चलते जहां आइसोलेशन जोर पकड़ रहा था तो इटली में सहानुभूति अभियान के तहत चीनियों को आलिंगन करने के अभियान को मना क्यों नहीं किया गया।

क्या यूरोप में इटली में व्यावसायिक घनिष्ठता के चलते इसे चलाना आसान था। जहाँ से ये सारे पश्चिम में फैल गया। कोरोना का जो प्रसार चीन से बाहर अपने अनिश्चितता के साथ होता गया लेकिन चीन के अंदर पूरी निश्चितता के वुहान से बाहर नहीं गया। चीन कह रहा है कि उसने बड़े योजनाबद्ध तरीके से कोरोना को रोका,तो वो योजना शेष विश्व को भी बता देते। बाकी सोशल डिस्टेन्स ,सेनिटायीजेशन और अन्य सभी ज्ञात तरीके तो सभी विकसित देश अपना रहे हैं। लेकिन रुक नहीं रहा। कहीं चीन ने वायरस के साथ कोई एंटी डोड ,वेक्सीन भी तो नहीं ढूंढ दी थी ?वरना कैसे कि कैसे अचानक वुहान को कोरोना मुक्त करके अप्रैल में पूरी ही तरह से व्यावसायिक गतिविधियों के खोलेने का दावा किया जा रहा है।

आखिर क्या कारण है कि चीन के हथकंडों को सुबह शाम झेलने वाले कोरिया, हांगकांग, ताईवान,सिंगापुर और कुछ-कुछ जापान ने तुरंत मामला भांप लिया और जरा सी भी ढिलाई किये बगैर थोडी क्षति के साथ स्वयं को तुरन्त सुरक्षित कर लिया।क्योंकि चीन के निकट रहने से उन्हें कई तरह का अंदेशा बना ही रहता था।उन्होंने पश्चिम की तरह मामले को हल्के में नहीं लिया।

चीन के राष्ट्रपति द्वारा RM1 फेसमास्क पहनकर पीड़ितों का हालचाल पूछने जाने की पोस्ट भी सवाल खड़ा कर रही है कि जहां डॉक्टरों द्वारा पूरी बचाव ड्रेस पहनने बाद भी उसे उतारने के समय हुई चूक से भी कई डॉक्टर संक्रमित हो गए, तो शी जिनपिंग मात्र एक फेसमास्क लगाकर ही कैसे गए? वो तो चीन जैसे देश के मुखिया हैं। अनुमान लगाए जा रहे हैं कि वे कोई वेक्सीन इंजेक्ट करके कोरोना पीड़ितों के केम्प में गए।

और अब यदि और एक्सपर्ट सूचनाओं पर निर्भर रहें तो वूहान संकट के समय चीन में चीनी मुद्रा का अवमूल्यन हुआ और चीन केवल वाच करता रहा। आर्थिक गतिविधियां ठप्प पड़ने से चीन स्थित सभी यूरोपीयन और अमेरिकी कंपनियों के शेयर बुरी तरह से 40% तक लुढ़क गए। जबकि चीन का शेयर बाजार मामूली ही गिरा। इधर डीव जोंस, हेंगसेंग, निक्की सहित यूरोपियन स्टॉक बाजार धड़ाम हो गए। भारत में भी निफ्टी 12000 से 7000 पर आ गया। चीन स्थित अमेरिकी और यूरोपियन कंपनियों के शेयर चीन द्वारा निर्णायक भूमिका के साथ खरीद लिए गए। कि हजारों बिलियन की कंपनियां चीन में ही बेहतर अवसर उपलब्ध होने से चीन में ही चीन के नियंत्रण में रहेंगी।उच्च तकनीक और पूंजी से युक्त ये कम्पनियां अब चीन के स्वामित्व में,उसके ख़ज़ाने की शोभा बढ़ा रहीं हैं।और जब कोरोना के प्रहार से अमेरिका और यूरोप के बाजार लड़खड़ाए तो वहां की कंपनियों के भी शेयर खरीद लिए जाएं। अब चीन को 1•18 ट्रिलियन भंडार के साथ अमेरिकी कोष का सबसे बड़ा मालिक कहा जा रहा है।

चीन ने अप्रत्याशित तरीके से अपने को तथाकथित सम्हाल लिया है। और यदि ऐसा हुआ तो अब दौर होगा चीन में तेजी से उत्पादन का। कब्जायी गयी अमेरिकी और यूरोपियन कंपनियों की उंच्च तकनीक से बाजार में बर्चस्व ऒर भी आसान हो सकता है।अब बाजार के लिए तरस दुनिया भर के लड़खड़ाये बाजारों से सस्ती खरीद की जा सकती है। जैसे अति आवश्यक कच्चा तेल। ईरान तो दे ही सकता है। पश्चिम और अन्य देशों के लिए आवश्यक सामग्री को ऊंचे दामों में बेचना। यद्यपि भारत के संदर्भ में हार्डवेयर और इलेक्ट्रानिक जैसे क्षेत्रों की चर्चा समय की नजाकत को देखते हुए कम ही करें लेकिन बता दें कि भारत का फार्मा उद्योग अपने दवाइयों के लिए 58 प्रकार के अति महत्वपूर्ण मॉलिक्यूल के लिए चीन पर ही निर्भर है।

चीन की रणनीति के बारे में बता दें कि पिछले ही कुछ वर्षों में लगभग 8 देशों ने अपने स्ट्रेटेजिक एसेट्स चीन का कर्ज उतारने में चीन को दी हैं। इटली में तो लगभग सारे ही क्षेत्र चीनी निवेशकों के लिए खोल दिये गए थे। वहाँ के चार पोर्ट्स में चीन का भारी निवेश हैं। इधर ईरान के तेहरान से टर्की जाने वाली 2000 km की चीन की महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना , क्वॉम के न्यूक्लियर प्लांट के अलावा और भी निवेश है। इटली और ईरान दोनों की हालत बुरी है। यही हाल पाकिस्तान का भी अब धीरे धीरे होता जा रहा है। 1962 के हिंदी चीनी- भाई भाई के बाद कहीं हम इटली- चीनी भाई, ईरानी-चीनी भाई भाई और अब पाकिस्तानी चीनी भाई-भाई का आधुनिक वर्जन को देखने को नहीं मिलेगा। मवैसे पाकिस्तान में उस हिसाब से कोरोना अभी तक तो फिर भी धीरे- धीरे से फैला है। जिस रफ्तार से यूरोप और अमेरिका में फैल रहा है उससे पाकिस्तान जैसे बेहद निम्न चिकित्सा सुविधा वाले देश में इसकी कम रफ्तार विरोधाभास ही दिखाती है।क्योंकि जिस तरह पाकिस्तान में चीनी कंपनिया काम कर रहीं है और कम से कम 10 फ़्लाईट रोजाना वहां से चीन को जाती हैं उस हिसाब से इटली की तुलना में पाकिस्तान में धीमी गति से फैलना भी शोध का विषय है। भले ही इन फ्लाईट्स में अधिकांश चीनी हों और 10 पाकिस्तानी ही हों। तो भी क्या चाहे खरबूजा चाकू पर गिरे या चाकू खरबूजे पर। कटना तो खरबूजे को ही है।

अब कोरोना सचमुच में जानवरों से ही आया हो या वुहान की लैब से लापरवाही से फैला हो या किसी रणनीति के तहत फैला हो घटनाक्रम तो अभी तक किसी स्क्रिप्ट की तरह ही लग रहा है। अब अमेरिका की एक ला फर्म और कंपनी ने चीन पर 25 लाख के मुआवजे का भी दावा कर दिया है। देखते हैं कोरोना के विश्वव्यापी प्राणघातक प्रहार और शेयर बाजार में क्या सहसंबंध निकलता है? फिलहाल तो मानवता एक अभूतपूर्व संकट में फंसी है। अब इसे युद्ध माना जाय य न माना जाय।लेकिन इसमें चौकसी वैसी ही करनी है जैसे युद्ध के समय जवान सीमा सीमित साधनों के साथ अपने बंकरों में करता है। आशा विश्वव्यापी समुद्रमंथन में अभी निकले विष के बाद अमरत्व ही निकले।