गोपीनाथ मंदिर के पौराणिक त्रिशूल के खंडित होने का खतरा

काले रंग में आता था नज़र अब जंग से हो गया मटमैला लाल 

देवभूमि मीडिया ब्यूरो 

जिलाधिकारी चमोली स्वाति एस भदौरिया का कहना है कि गोपीनाथ मंदिर परिसर में लगा त्रिशूल हमारी पौराणिक धरोहर है। इसके संरक्षण के लिए सभी प्रयास किए जाएंगे। उन्होंने कहा पुरातत्व विभाग के अधिकारियों से बात करके वे त्रिशूल के रख-रखाव की व्यवस्था करने को कहेंगी।

गोपेश्वर (चमोली) । पुरातत्व विभाग ने उत्तराखंड के तमाम पुराने मंदिरों और पुरातात्विक महत्त्व के मंदिरों और स्थानों को भले ही अपने कब्जे में ले लिया है लेकिन  पुरातत्व विभाग पौराणिक महत्व के ऐसे मंदिरिओ और वहां रखे पौराणिक उपकरणों को संरक्षित करने में हीला-हवाली करता रहा है।  परिणाम स्वरूप पौराणिक काल की ये विरासतें बर्बादी के कगार पर आ पहुंची हैं। इसका जीता जागता उदाहरण गोपेश्वर के गोपीनाथ मंदिर प्रांगण में स्थापित पौराणिक त्रिशूल है जो रख-रखाव के अभाव से जंग (Rust) से ग्रसित है और जंग से कभी भी धराशाही हो सकता है। 

स्थानीय निवासियों के अनुसार जंग लगने से  इस पौराणिक त्रिशुल का स्वरूप बदलने लगा है, तो दूसरी ओर इसके खंडित होने का खतरा भी बना हुआ है। स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन से त्रिशुल के संरक्षण की मांग करते हुए पुरातत्व विभाग की कार्य प्रणाली पर नाराजगी व्यक्त की है। स्थानीय लोगों मामले में जिलाधिकारी से हस्तक्षेप कर पौराणिक धरोहर के संरक्षण की मांग कर रहे हैं। 

गौरतलब हो कि गोपेश्वर के गोपीनाथ मंदिर के प्रागण में स्थापित यह लौह त्रिशुल पौराणिक काल से मौजूद है और पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है लेकिन रख-रखाव के अभाव में चलते यह पौराणिक त्रिशुल जंग खाने लगा है। जहां कई वर्ष पहले यह त्रिशुल काले रंग में नज़र आता था अब यह  जंग के कारण मटमैला लाल रंग का दिखने लगा है। इतना ही नहीं जंग से त्रिशुल के खंडित होने की संभावना बनी हुई है। मंदिर के रख-रखाव का जिम्मा संभालने वाले पुरातत्व विभाग इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।

वहीं गोपीनाथ मंदिर के पुजारी हरीश भट्ट, नवल भट्ट और शांति प्रसाद भट्ट का कहना है कि रख-रखाव न होने से त्रिशूल बदहाली की मार झेल रहा है। त्रिशूल के ऊपरी हिस्से पर जंक लगने लगा है। उन्होंने जिलाधिकारी से त्रिशूल के संरक्षण करने की मांग की है। 

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