हाय रे उत्तराखंड, तेरी यही कहानी,इधर से आगमन, उधर से रवानगी

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बीस वर्षों में दस मुख्यमंत्री हो जाएँगे, ऐसी कल्पना शायद ही किसी ने कभी की होगी

डॉ. राजेश्वर उनियाल

बंधुओं, 9 नवम्बर, 2000 को उत्तराखंड राज्य बनते ही सभी उत्तराखंडियों के चेहरे पर इस बात की प्रसन्नता लहरा रही थी कि अब हमारा अपना राज्य बन गया है, अब हमारी अपनी सरकार होगी और मुख्यमंत्री भी हमारा अपना ही होगा। लेकिन बीस वर्षों में दस मुख्यमंत्री हो जाएँगे, ऐसी कल्पना शायद ही किसी ने कभी की होगी ।
दुर्भाग्य इस बात की नहीं है कि इनमें से किसी मुख्यमंत्री को अयोग्य ठहराया गया हो । भाजपा हो या काँग्रेस दोनों पार्टियों ने केवल राजनीतिक समीकरण के तहत मुख्यमंत्रियों को हटाया है । हालांकि अभी तक के तीनों समीकरण गलत ही सिद्ध हुए है ।
2002 में श्री नित्यानन्द स्वामी जी को इसलिए हटाया गया कि वह चुनावी नैया पार नहीं करा पाएंगे, तो जिन श्री भगत सिंह कोशियारी जी को मुख्यमंत्री बनाया, वे भी तो चुनावी नैया पार नहीं करा पाए । भाजपा को कोई लाभ नहीं हुआ, जबकि नुकसान मेरे नवजात राज्य का ही हुआ । भाजपा ने फिर 2012 में वही गलती दोहराई । माननीय निशंकजी को लाकर व फिर अकारण हटाकर उन्हीं खंडूरीजी को मुख्यमंत्री बनाया गया, जो ना तो लोकसभा में पार्टी को जीता पाए, ना विधान सभा में, किरकिरी भाजपा की ही हुई और नुकसान फिर मेरे उत्तराखंड का ही हुआ । भाजपा की यही गलती काँग्रेस ने भी दोहराई । श्री विजय बहुगुणा जी इतने सीधे मुख्यमंत्री निकले कि उन्हें तीन दिन तक तो पता ही नहीं चला कि केदारनाथ में इतना बड़ा प्रलय आया हुआ है, वो तो जब तीन दिन बाद राहुल गांधी जी भारत लौटे, उन्हें तब पता चला । श्री विजय बहुगुणा जी की रवानगी कर डाइनामिक मुख्यमंत्री के रूप में श्री हरीश रावत जी को सत्ता सौंपी गई, लेकिन बेचारे रावत जी जरा सा उधर नमाज पढ़ने क्या गए, इधर उनके मंत्री जय श्रीराम करते हुए भाजपा में चले गए ।
अब अगर आप यह कहें कि चुनाव से पहले मुख्यमंत्री नहीं बदलना चाहिए, तो 2007 में क्या हुआ ? उस समय के विकास पुरुष तो एक लोकगीत नौछमी नारायण की रसधार में इतने रम गए कि वह चुनाव की धार में ही बह गए । इसका सीधा सा अर्थ है कि मुख्यमंत्री को बदलने या ना बदलने से आप चुनावी वैतरणी पार नहीं कर सकते । चुनाव जीतने के लिए मुख्यमंत्री के चेहरे की अपेक्षा पार्टी के प्रति जनभावनाओं का समीकरण और तत्कालीन राजनैतिक परिदृश्य अधिक महत्व रखता है । बाकी विकास तो अटलजी ने भी किया था और तिवारी जी ने भी, लेकिन चुनाव तो दोनों हार गए थे । अब जब उत्तराखंड में तिवारी जी, खण्डूरी जी और भारत में माननीय वाजपेई जी जैसे रथी सत्ता में होते हुए हार सकते हैं, तो फिर चुनावी समय में चेहरा बदलने का कोई मतलब नहीं होता है । माननीय श्री त्रिवेंद्र जी का प्रबंधन कौशल कितना अच्छा था, यह हमें जोशीमठ प्रलय में दिख गया था । केवल चार घंटे के अंदर बाढ़ को नियंत्रित करने का इतिहास रचने वाले मुख्यमंत्री का नाम आज विश्व पटल पर लहराना चाहिए था, परंतु हम उत्तराखंडी अपने ही कीर्तिमानों को केवल निजी स्वार्थ और तुच्छ राजनीति के कारण उठने नहीं देते हैं ।
माननीय त्रिवेंद्र जी के अंदर सबसे बड़ी कमी इस बात की थी कि वह अपनी उपलब्धियों को चातुर्यता के साथ प्रदर्शित नहीं कर सके । अन्यथा हम देखते ही हैं कि कैसे चतुर राजनीतिक चुनाव से पहले दो-तीन स्कूलों व एकाध अस्पतालों की रंगाई पुताई करवाकर, व उसे ही चुनावी माडल के रूप में प्रस्तुत कर चुनावी वैतरणी पार कर देते हैं । इसलिए मुख्यमंत्री ऐसा अवश्य होना चाहिए, जो काम करने से अधिक काम करता हुआ दिखे । इससे लोगों के अंदर आशा की किरण जगी रहती है । इसका सबसे बड़ा उदाहरण हिमाचल, उड़ीसा, बिहार और मध्य प्रदेश आदि कई राज्य हैं। वहाँ के लोग अपने को अपने मुख्यमंत्री के साथ जुड़ा हुआ मानते हैं । मुख्यमंत्री को फाइलों से अधिक जनता के साथ घिरा हुआ रहना चाहिए । उसे सचिवालय से अधिक क्षेत्र में दिखना चाहिए । उसे ब्यूरोक्रेट के साथ रौबिला और जनता के साथ मधुर रहना चाहिए ।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को तो पलायन, प्रकृति, यहां की देवतुल्य संस्कृति और प्रवासियों पर भी अधिक ध्यान रखना चाहिए । उत्तराखंड विषमताओं से भरा प्रदेश है, इसलिए यहाँ एक योजना व एक नीति की अपेक्षा छोटी-छोटी योजनाएँ बनाकर उसकी अलग-अलग कार्यनीति बनानी होगी । विकास राज्य के साथ ही राज्यवासियों का भी होता हुआ दिखना चाहिए । हमें आशा है कि चूंकि हमारे उत्तराखंड के नव निर्वाचित मुख्यमंत्री श्री तीरथ सिंह रावत जी एक सरल हृदय के कर्मठ एवं जनता से जुड़े हुए आदर्श राजनीतिज्ञ हैं, अतएव निश्चित रूप से वह, उत्तराखंड की जनता की आशाओं और अपेक्षाओं में पूर्णतया खरा उतरेंगे । नव निर्वाचित मुख्यमंत्री श्री तीरथ सिंह रावत जी को हार्दिक शुभकामनाएँ । आपको छह वर्ष तक मुख्यमंत्री रहना है, ताकि उत्तराखंड में इधर से आगमन, उधर से रवानगी की कहानी का अध्याय समाप्त हो सके और मेरा उत्तराखंड अपना स्वर्णिम इतिहास लिखना प्रारम्भ कर दे ।
बाकी जहां भगवान भोलेनाथ जी स्वयं विराजित हों, वहाँ होगा तो वही जो बाबा चाहेंगे ॥
जय शिव शंकर … शिवरात्रि की शुभकामनाओं के साथ …
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