वैक्सीन के लिए दुनिया भर में 185 स्थानों पर चल रहे हैं प्रयास

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कोरोना वैक्सीन राष्ट्रवाद बढ़ती कवायद

कोरोना वैक्सीन निर्माण में लगी दुनिया भर की तमाम कंपनियां

कंपनियां अब इस कवायद में जुटी हैं कि विश्व के देश उनके वैक्सीन की खरीद की दें अग्रिम वचनबद्धता 

कमल किशोर डुकलान 
पिछले मार्च माह से ही देश-दुनिया में कोरोना से निजात दिलाने हेतु तेजी से प्रयास चल रहे हैं। माना जा रहा है कि कोरोना के स्थायी हल के नाते वैक्सीन ही एकमात्र उपाय है। कोरोना वैक्सीन शरीर में एंटीबाडी का निर्माण करने में सहयोगी होती है, जिससे मनुष्य पर कोरोना का असर नहीं होगा।
कोरोना संक्रमण एक ऐसा संक्रमण है,जो पहले कभी न देखा या सुना गया है,यह संक्रमण अन्य संक्रमणों से कई गुणा अधिक तेजी से फैल रहा है, इस वैक्सीन निर्माण का काम इस समय विश्वभर के चिकित्सा वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बना हुआ है। इस वैक्सीन बनाने के लिए दुनिया भर में 185 स्थानों पर प्रयास दुनिया में चल रहे हैं, जबकि 35 के तो ट्रायल भी अलग-अलग स्तरों पर चल रहे हैं।
साधारणतया सभी ट्रायल होने के बाद किसी वैक्सीन के बाजार तक पहुंचने में कम से कम छह वर्ष का समय लगता है। लेकिन कोरोना की वैक्सीन बनाने हेतु दुनिया के पास इतना समय नहीं है, क्योंकि कोरोना वायरस मानवता को तेजी से चपेट में ले रहा है,जिस कारण दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाएं धराशायी होती जा रही हैं। और लोगों के रोजगार नष्ट हो रहे हैं।
भारत सहित विश्व स्तर पर कोरोना वैक्सीन विकसित करने के प्रयास लगातार जारी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र ने 15 अगस्त को अपने संबोधन में कहा था कि देश में तीन वैक्सीन के ट्रायल अलग-अलग स्तरों पर चल रहे हैं और देश को कोरोना वैक्सीन जल्द मिल सकती है। उधर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा विकसित वैक्सीन की चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एंड रिसर्च में क्लीनिकल ट्रायल की मंजूरी टाल दी गई है, क्योंकि उसकी सुरक्षा स्वीकृति लंबित है। रूस ने भी एक वैक्सीन का पंजीकरण कर दिया है और उसका व्यावसायिक उत्पादन करने के लिए भारत से संपर्क साधा है।
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने भी वैक्सीन के उत्पादन के लिए भारत से संपर्क साधा है। वैक्सीन उत्पादन के क्षेत्र में भारत का कोई सानी नहीं है और भारत की कई नामी कंपनियां वैक्सीन उत्पादन में अग्रणी भूमिका रखती हैं। सात भारतीय फार्मा कंपनियां इस समय वैक्सीन निर्माण की दौड़ में शामिल हैं।
दूसरी तरफ कई देशों को यह चिंता सता रही है कि जिस वैक्सीन के बारे में खरीद की वचनबद्धता ली जा रही है, क्या वह कोरोना के खिलाफ प्रभावी सिद्ध भी होगी या नहीं ? अभी तक भारत में विकसित कोरोना वैक्सीन निर्माण में जो भी ट्रायल हो रहे हैं, उसके अच्छे नतीजे आ रहे हैं। उसके साथ ही रूस ने तो दुनिया में सबसे पहले कोरोना वैक्सीन के लिए लाइसेंस भी जारी कर दिया है। उनके द्वारा प्रकाशित शोध में भी नतीजे अच्छे बताए जा रहे हैं।भारत से उनकी अपेक्षा है कि भारत उसके उत्पादन में सहयोग प्रदान करें। 
रूस और भारत कोरोना वैक्सीन निर्माण में काफी आगे बढ़ जाने के कारण, वैश्विक स्तर पर वैक्सीन बेचकर लाभ कमाने की होड़ में लगी कंपनियां और उनका समर्थक विश्व स्वास्थ्य संगठन काफी विचलित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो यहां तक कह दिया है कि यह वैक्सीन राष्ट्रवाद वैक्सीन के निर्माण में देरी कर देगा। इससे यह भी कयास लगाया जा रहा है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और उनकी समर्थित कंपनियों से इतर वैक्सीन निर्माण के कार्य को हतोत्साहित कर सकता है।
आम तौर पर अधिकांश वैक्सीन बच्चों को दी जाती रही है। माना जाता है कि बच्चों में जो विभिन्न प्रकार की बीमारियों होती हैं जिन्हें बाल्य अवस्था में वैक्सीन देकर बीमारियों से बचाया जा सकता है। समय के साथ-साथ भारत में विभिन्न प्रकार की वैक्सीन राष्ट्रीय यूनीवर्सल इम्युनाईजेशन कार्यक्रम में शामिल की गई। इसके अलावा कुछ वैक्सीन ऐच्छिक रूप से भी दी जाती हैं। इसके अतिरिक्त गर्भवती महिलाओं को भी अनिवार्य रूप से कुछ वैक्सीन दी जाती हैं। यूं तो इनमें से अधिकांश वैक्सीन भारत में ही बनती हैं और वे काफी सस्ती भी होती हैं,क्योंकि उन पर कोई रायल्टी नहीं दी जाती हैं। लेकिन हाल ही में कई नई वैक्सीन यूआइपी में शामिल की गई हैं,जो काफी महंगी और पेटेंटीकृत होने से कंपनियां उनकी भारी कीमत वसूलती हैं।
आज भारत कोरोना से निपटने के तमाम बेहतर उपायों के बावजूद कोरोना संक्रमण से प्रभावित देशों की सूची में संख्या की दृष्टि से दूसरे स्थान पर पहुंच गया है, कोरोना से बचाव के लिए कोरोना वैक्सीन की अनिवार्यता बन रही है। दुनियाभर में चल रहे वैक्सीन के प्रयासों में से भारत को चुनाव करना होगा। इस चुनाव के तीन मापदंड होंगे। पहला, क्या चयनित वैक्सीन प्रभावी है?कोई भी वैक्सीन सौ प्रतिशत प्रभावी नहीं होगी और उसकी अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। लेकिन ऐसी वैक्सीन चुननी होगी जो सबसे ज्यादा प्रभावी होगी।
दूसरा मापदंड होगा वैक्सीन के साइड इफेक्ट का। जिस वैक्सीन का न्यूनतम साइड इफेक्ट हो,उसे चुनना होगा। भारत समेत दुनिया के विकासशील देश,जो इस महामारी के कारण आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं, धनाभाव भी एक प्रमुख मुद्दा है।
तीसरा मापदंड वैक्सीन की वास्तविक लागत है। यही वास्तव में वैक्सीन राष्ट्रवाद है, जिससे बचने की सलाह विश्व स्वास्थ्य संगठन दे रहा है। अधिकांश देशों को समझ में आने लगा है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन कंपनियों को लाभ पहुंचाने की कोशिश में वैक्सीन राष्ट्रवाद को क्यों खराब बता रहा है।