उत्तराखंड सेब उत्पादन मे अव्वलता की ओर अग्रसर

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राज्य के संसाधनों का दोहन राज्य स्मृद्धि में नहीं

सी एम पपनैं

बिल्लेख (रानीखेत)। उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए मातृशक्ति व युवाओ ने शक्ति झोंकी। अनेकों राज्य आंदोलनकारियों ने शहादत दी। इस उद्देश्य से कि राज्य गठन के बाद पर्वतीय अंचल विकास के पथ पर अग्रसर होगा, क्षेत्र के वाशिन्दो को जटिल समस्याओं व अभावो से मुक्ति मिलेगी।

दुर्भाग्य! समस्याओं व अभावो के ज्वलंत प्रश्न आज भी यथावत हैं। राज्य कल्पनानुसार नही बन पा रहा है। राज्य के संसाधनों का दोहन राज्य स्मृद्धि मे होता नही दिख रहा है। नए राज्य की कल्पना प्रश्न बनी हुई है। भूमि व जंगल के काले कानून तथा चकबंदी न होने से जटिल पहाडी खेती-किसानी से लोगों के अलगाव के कारणवश खेती बंजर, गांव खाली तथा मकान खंडहर होते जा रहे हैं, जो सोचनीय है। राज्य की दयनीय स्थिति बनी हुई है।

उत्तराखंड मूल के प्रवासी उद्यमियों के प्रयास से व्यवसायिक जागृति, स्वरोजगार से संसाधनों के संवर्धन तथा अन्य उद्यमिता विकास के माध्यम से भविष्य में पर्वतीय क्षेत्र को विकास की दौड़ में अग्रसर कर, अंचल के लोगों को दयनीय स्थिति से उबार, उसके स्वरूप को बदलने की कोशिश की जा रही है।

विषम भौगोलिक परिस्थितियों में स्थानीय स्तर पर युवाओं में बागवानी, कृषि, साग-सब्जी, मसाले, फूलों इत्यादि से जुडी तकनीकी दक्षता की ललक पैदा कर, उनकी सोच बदल, अंतरमन मे आत्मविश्वास पैदा कर, उन्हे उद्यमता विकास की ओर अग्रसर कर, पलायन व बेरोजगारी जैसी जटिल समस्याओं से निदान दिलवाया जा सकता है।

औपनिवेशिक युग ऐसा ही कुछ, शिक्षा के अलावा एक और शिक्षा के बारे में सोचा गया था, जो गांधी जी के शिक्षा सम्बन्धी आदर्शो, लक्ष्यों और विचारों को उत्तराखंड के संदर्भ में रूप देने के लिए तथा उनके चौदह सूत्री रचनात्मक कार्यक्रमो को ग्रामवासियों तक पहुचाने व उन्हे शिक्षित करने हेतु थी। जिस कारण एक विद्यालय की स्थापना गांधीवादी नेता देवकीनंदन पांडे द्वारा अल्मोड़ा जिले के ताडीखेत मे प्रेम विद्यालय नामक स्कूल की स्थापना कर की गई थी।

इस विद्यालय में छात्रों को पढ़ाई लिखाई व हिसाब तथा अंग्रेजी की शिक्षा के साथ-साथ खेती, फल और तरकारी उत्पादन, दस्तकारी के तहत चटाई पुलोभर बनाना, बढ़ई तथा लोहार का काम व स्वछता सफाई, वन रक्षा और संवर्धन तथा गांवो के विकास संबंधी अन्य कामो मे प्रशिक्षण दिया जाता था। ताकि विद्यार्थी उपयोगी शिक्षा भी प्राप्त करे और साथ ही कुछ धन की कमाई भी कर सके।

कोशिश की गई थी कि, विद्यालय और उसमे काम करने वाले शिक्षक और विद्यार्थी स्वयं से उत्पादित किए गए उत्पादित उत्पादों से इतनी आमदनी जुटा सके कि वे आत्मनिर्भर हो सके, किसी पर आश्रित न हो। स्वराज और गांवो के कार्यो मे विद्यालय को ग्रामीण समाज की सेवा व उन्हे भागीदार बना कर जोड़ने का प्रयास भी किया गया था।

आजादी के पूर्व दो दशकों में प्रेम विद्यालय ताड़ीखेत ने शिक्षा व उद्यमिता के क्षेत्र मे इतना नाम कमाया कि उसकी गणना देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षा व उद्यमिता से जुड़े नए शिक्षा केंद्रों में होने लगी। गांधी जी ने इस शिक्षा पद्धति से प्रभावित होकर सन 1929 मे कौसानी यात्रा के दौरान ताड़ीखेत की भी यात्रा की थी। एक रात यहां ठहरे व प्रेम विद्यालय की शिक्षा व्यवस्था, उत्पादन कार्यो व अन्य व्यवस्थाओं का अवलोकन कर मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रह सके।

शिक्षा के माध्यम से श्रम की गरिमा को प्रतिष्ठापित करने का इस विद्यालय का मुख्य आयाम था। विद्यालय के सभी कार्यो मे शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्रो के भाग लेने का मतलब होता था, उन छात्रो को आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर करना व नैतिक सहज स्फुरण होना।

देश को मिली आजादी के बाद, प्रारंभिक वर्षो मे ही शिक्षा के आधुनिकीकरण के नाम पर एग्लो वर्नाकुलर स्कूलो और कालेजो की हायर सेकेंडरी शिक्षा पद्धति को पूरी तरह हावी कर दिया गया। लादी गई शिक्षा पद्धति का अनुसरण सभी को करना पड़ा।

सर्वांगीण शिक्षा का यह प्रयोग जिसका लक्ष्य पहाड़ के गरीब तबके के बच्चों को बिना मां-बाप पर आर्थिक बोझ डाले शिक्षा व उद्यम तकनीक से जुड़ी अच्छी से अच्छी शिक्षा व ज्ञान उपलब्ध कराने का था, अनेक कारणों से आजादी के बाद के वर्षो मे सफल नहीं हो पाया। आजादी के बाद गांधी जी के सामाजिक उद्देश्यों से संबंधित कार्यक्रमो की अनदेखी होने लगी। आजाद भारत की नई सरकार द्वारा मैकाले निर्धारित शिक्षा व्यवस्था लगभग यथावत बनाए रखना जारी रहा। जिसमे परीक्षाओं में ज्यादा जोर दिया गया, जीवन के तथा व्यक्तित्व के विकास पर कम।

दुर्भाग्य! लादी गई शिक्षा व्यवस्था जो आज भी निरंतर जारी है, उक्त शिक्षा व्यवस्था से उत्तराखंड ताड़ीखेत विकास खंड के अंतर्गत सर्वांगीण विकास के क्षेत्र मे शिक्षा देने वाले प्रेम विद्यालय के साथ-साथ पहाड़ के गरीब बच्चों का बड़ा नुकसान हुआ। जिसके परिणाम स्वरूप उद्यम तकनीकी ज्ञान के अभाव में छोटे-मोटे रोजगार की तलाश मे अपने पुश्तैनी मकान खंडहर, खेत-खलिहान बंजर तथा प्रकृति के रमणीक सौन्दर्य व स्वच्छ पर्यावरण को छोड़ पर्वतीय अंचल के लोग गांव के गांव खाली कर नगरों व महानगरों को पलायन करने को विवश हो गए।

उक्त समस्याओं से पार पाने के लिए उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल मे बागवानी उद्यम विकास के क्षेत्र मे आधुनिक तकनीक के बल पहल कर, परिवर्तन शीघ्रता से लाया जा सके, प्रयास कर, उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। जिस बल रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे युवाओ की गांव वापसी सुनिश्चित की जा सकेगी। उक्त अप्रत्याशित व प्रेरणादायी उदाहरण उत्तराखंड अल्मोड़ा जनपद ताड़ीखेत विकास खंड के बिल्लेख गांव के केवलानंद उप्रेती के पुत्र गोपाल दत्त उप्रेती ने अपने व्यक्तिगत प्रयासो के बल ग्रामीण क्षेत्र में बागवानी मे नई क्रान्ति लाकर, कर दिखाया है।

बागवानी के क्षेत्र मे हुए इस विलक्षण कार्य ने राज्य के उद्यान विशेषज्ञयो और वैज्ञानिकों के बीच एक प्रेरणादायी उदाहरण स्थापित किया है। साथ ही उद्यम विकास मे संघर्षरत अन्य अनेकों उद्यमियो का ध्यान आकर्षित किया है। जिसके फलस्वरूप अल्प अवधि मे मिली उपलब्धियों के बल इस उद्यमी को विभिन्न सामाजिक मंचो के साथ-साथ उत्तराखंड राज्य सरकार द्वारा 2016 मे ‘उद्यान पंडित’ सम्मान से तथा 2019 लखनऊ में आईसीएआर तथा इंडियन सोसाइटी आफ हॉर्टिकल्चर रिसर्च एंड डैवलपमैंट द्वारा संयुक्त रूप से अखिल भारतीय स्तर पर ‘देवभूमि बागवानी सम्मान’ से नवाजा जा चुका है।

उद्यमी गोपाल दत्त उप्रेती वर्ष 2015 से अपने गांव बिल्लेख मे सत्तर नाली भूमि मे आधुनिक तकनीक से विकसित सेव के बगीचे मे एक हजार रूट स्टॉक हालैंड विदेशी प्रजाति तथा एक हजार हिमाचली अव्वल सेव प्रजाति के पेड़ो की किस्मो मे रेड डेलीसस, रेड गोल्ड, सुपर चीफ, ओर्गे स्पॉट, स्कॉलर टू, वांश, गेलगाला, मिचगाला, ग्रोनिश स्मिथ के एम (नाइन) तथा एम एम (111) प्रजाति के पेड़ो से शुरुआती दौर मे ही अव्वल किस्म के सेवो का अप्रत्याशित उत्पादन व उच्च बाजार भाव प्राप्त कर तहलका मचा चुके हैं। अव्वल दर्जे के उक्त उत्पादित सेव की किस्मो का बाजार भाव प्रति किलोग्राम दो सौ पचास रुपयो के करीब है।

बगान मे उत्पादित एम (नाइन) प्रजाति के सेव पेड़ 9-10 फुट की अधिकतम ऊंचाई के है, जिनसे फल आसानी से तोड़े जा सकते हैं। एक नाली भूमि मे इस प्रजाति के करीब पचास पेड़ लगाए जा सकते हैं तथा प्रति पेड़ करीब पच्चीस किलोग्राम फल प्राप्त किया जा सकता है। एम एम (111) प्रजाति के सेव पेड़ो की उत्पादन क्षमता प्रति पेड़ चालीस किलोग्राम है।

आधुनिक तौर-तरीकों से उत्पादित अव्वल किस्म के इन देशी-विदेशी प्रजाति के सेवो की बिक्री से जहां यह उद्यमी विगत तीन वर्षो मे ही लाखो रुपयों का व्यवसाय कर चुका है, वही क्षेत्र के करीब दो दर्जन बेरोजगारो को रोजगार मुहैया करवाने के साथ-साथ परोपकार के नाते स्थानीय युवाओ व काश्तकारों को बागवानी के क्षेत्र मे स्वरोजगार व उद्यम स्थापित करने हेतु फलों के पेड़ व आधुनिक तकनीकी ज्ञान देकर प्रोत्साहित भी कर रहा है।

बागवानी के क्षेत्र मे दृढ़ संकल्प के साथ कदम रखने की प्रेरणा इस उद्यमी को वर्ष 2012 मे अपने निजी खर्च पर दोस्तों के साथ फ्रांस के चैस्टक्स पैपरिकनं तथा वर्ष 2016 मे नीदरलैंड मे अव्वल प्रजाति के सेव व अखरोट से लदी प्राइवेट नर्सरियों व बागानों का अनेकों बार अवलोकन करने के पश्चात हासिल हुई।

फ्रांस व नीदरलैंड के पहाड़ी इलाको की वनस्पति, जलवायु, भौगोलिक तापमान, मौसम इत्यादि सब कुछ उत्तराखंड के पहाड़ी अंचल जैसा ही था। इस उद्यमी के मन में भाव उभरे, जब इन देशों की उत्तराखंड जैसी जलवायु व तापमान मे यहां के बागवान सेव व अखरोट की इतनी अव्वल किस्म की पैदावार उत्पादित कर अपने देश की अर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ बना सकते हैं, तो उत्तराखंड मे बागवानी उद्यम कर वे स्वयं क्यों नहीं कर सकते?

संकल्प ले, मन मे ठान, दिल्ली प्रवास मे सिविल इंजीनियरिंग के पेशे मे रमे इस उद्यमी ने वर्ष 2015 मे हिमाचल के जुव्वल, नंदपुर, कोटखाई तथा टोंस नदी पार उत्तराखंड चकराता के सेव बागानों का गहन अवलोकन किया। दृढ़ संकल्प के साथ बागवानी के क्षेत्र मे निष्ठापूर्वक कार्य करने का निर्णय ले, वर्ष 2015 मे ही अपने गांव बिल्लेख मे खेती-किसानी से निराश हो चुके गांव के काश्तकारों से सत्तर नाली जमीन खरीद, एक हजार हाईडेंसिटी सेव के पेड़ हालैंड से आयात कर तथा एक हजार हिमाचली सीडलिंग आधारित सेव के पेड़ो की परंपरागत बागवानी विधि से हट कर, नीदरलैंड रूट स्टाक प्रणाली से अव्वल दर्जे का सेव उत्पादन कर, पांच वर्षों की अल्प अवधि में ही उत्तराखंड के बागवानी क्षेत्र मे सरकारी बाग-बगीचो को पछाड़ कीर्तिमान स्थापित कर डाला।

उक्त कीर्तिमान का प्रत्यक्ष जायजा तथा अवलोकन कर स्थानीय काश्तकारो के साथ-साथ उत्तराखंड राज्य के सभी तेरह जिलों के जिला उद्ययान अधिकारी इस आधुनिक तकनीक की बागवानी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।

फलों को जंगली सुअरो, बंदरो व लंगूरों से बचाने के लिए बगान के चारों ओर चार फुट की मजबूत पत्थर दिवार, उसके ऊपर चार फुट तार जाली तथा उसके ऊपर चार फुट सोलर फेंसिंग लगाई गई। साथ ही चार कुत्ते व दो स्थाई चौकीदार दिन रात बगीचे की निगरानी हेतु तैनात किए गए।

बगान की भूमि व पेड़ो को स्वस्थ रखने के लिए अनेकों वैज्ञानिक विधियां अपनाई गई। पानी की किल्लत से निजात पाने के लिए उक्त बगान की ऊंचाई पर सवा लाख लीटर वर्षा जल क्षमता का टैंक निर्मित किया गया, जिससे गर्मियों में विदेशी व देशी प्रजाति के सेव पेड़ो की पानी की पूर्ति कर उन्हे स्वस्थ व तरोताजा रखा जा सके।

पर्याप्त मात्रा में वर्षा जल संग्रहण से इस उद्यमी की भावी योजनाओ को भी बल मिलने लगा। सेव उत्पादन के अतिरिक्त निर्मित बगान में सब्जियों मे ब्रोकली, कैप्सिकम, लेमनग्रास के साथ-साथ फ्लोरीकल्चर, मिंट, तुलसी, लहसुन इत्यादि का उत्पादन करने की योजना इस उद्यमी द्वारा बनाई गई है। केल, लहसुन, मटर, लाई, मेथी, सरसों का उत्पादन यह उद्यमी शुरू कर चुका है। विगत वर्षों मे पहाड़ी ककड़ियों (खीरे) की भारी मात्रा मे उत्पादन कर यह उद्यमी अच्छा-खासा लाभ अर्जित कर, स्थानीय निराशावादी काश्तकारों के सम्मुख उदाहरण प्रस्तुत कर चुका है।

निर्मित बगान मे उपजाए गए अन्य फलों के पेड़ो खुमानी, आडू, पुलम, नीबू इत्यादि का उत्पादन यह उद्यमी स्वयं के उपभोग हेतु कर रहा है।

हालैंड से सेव पेड़ आयात करने में उद्यमी गोपाल दत्त उप्रेती को कई समस्याओं से जूझना पड़ा। पहली समस्या थी आयातित पेड़ो मे लिपटी मिट्टी की कौरनटीन एक्ट के तहत वायरस जांच कराना। जिसके तहत आयातित पेड़ो को एक वर्ष तक जांच के दायरे में रखना आवश्यक होता है। ताज्जुब, उक्त जांच हेतु देश के सबसे बड़े उत्तराखंड पंतनगर स्थित गोबिंद बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय मे उक्त जांच की कोई सुविधा थी ही नही। जिसका खुलासा, आरटीआई के द्वारा हुआ। इस उद्यमी की कार्य विधि व प्रयासों के बाद ही उक्त कृषि विश्वविद्यालय मे विश्वव्यापी महत्वपूर्ण कौरनटीन एक्ट के तहत वायरस जांच का श्रीगणेश वर्ष 2017 मे हो पाया।

बागवानी क्षेत्र मे अन्य अनेकों आधुनिक विदेशी तकनीकी ज्ञान जो उत्तराखंड के उद्यान क्षेत्र मे अपनाया ही नहीं गया था। उद्यान अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा समय-समय पर बिल्लेख स्थित इस उद्यमी के सेव बागान का मौका- मुआयना करने के दौरान उक्त आधुनिक तकनीकी ज्ञान से रूबरू होने का मौका मिला।

गोपाल दत्त उप्रेती के सेव बगान के कीर्तिमान की गाथा सुन माह दिसंबर 2019 के अंतिम सप्ताह मे उक्त बगान का मौका-मुयाना करने के दौरान इस आलेख के वरिष्ठ पत्रकार की मुलाकात अल्मोड़ा जिले के मुख्य वरिष्ठ उद्यान अधिकारी टी एन पांडे तथा राम सिंह नेगी उद्यान सचल दल केंद्र बिल्लेख के साथ हुई। उक्त जनों से अवगत हुआ, उद्यमी गोपाल दत्त उप्रेती ने न सिर्फ अल्मोड़ा जिला बल्कि संपूर्ण उत्तराखंड में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक से अव्वल किस्म के सेवो का उत्पादन कर, प्रेरणादायी अलख जगाई है।

अवगत हुआ, वर्तमान में उत्तराखंड का उत्तरकाशी जिला सेव उत्पादन में तथा अल्मोड़ा जिला मसाले व साग-सब्जी उत्पादन में अव्वल है। स्वरोजगार व बागवानी उद्यम विकास मे प्रोत्साहन हेतु सरकार पचास लाख रुपया तक मुहैया करवा रही है, फिर भी लोग नही मिल रहे हैं। स्वरोजगार व उद्यम विकास हेतु राज्य बजट में जो प्रावधान है, वह राशि काश्तकारों की उदासीनता के कारणवश खर्च ही नहीं हो पा रही है। पानी की किल्लत और जंगली जानवरों की समस्या के कारणवश लोग आगे नही आ रहे हैं। भूमि को स्वस्थ रखना पहला काम है, परंतु जंगली जानवरों के उत्पात व खेती-किसानी से ग्रामीणों के अलगाव के कारणवश बंजर हो रही भूमि ने प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

उद्यान विभाग से जुड़े उक्त अधिकारियों ने अवगत कराया, उद्यान विकास योजना के तहत अल्मोड़ा जिले मे 54 हैक्टेयर मे अखरोट ग्राफ्टेड तथा सोलह हैक्टेयर मे बादाम के पेड़ लगवाने मे कामयाबी हासिल हुई है। पलायन से खाली हो चुके पंद्रह घरो मे मशरूम उगाया जा रहा है। बागानों मे मधुमक्खी पालन को प्रमुखता दी जा रही है, जिससे फल-फूलों व साग-सब्जी के साथ-साथ पर्यावरण पर मधुमक्खी परागण प्रक्रिया के बल सकारात्मक प्रभाव पड़े। बगान मे फलों को ओलों से बचाने के लिए जाल लगाने हेतु सरकार अस्सी प्रतिशत की सब्सिडी मुहैया करवा रही है।

दरअसल, उद्यमी बनना एक व्यक्तिगत कौशल है, जिस हेतु व्यक्तित्व की अहम भूमिका के साथ-साथ सकारात्मक रवैया तथा प्रेरणा की निहायत जरुरत होती है। सामाजिक उघमियो के प्रमुख उद्देश्यों मे एक सामाजिक संगठन के नवनिर्माण और स्वच्छ पर्यावरण निर्माण की भावना भी शामिल होती है। परन्तु उत्तराखंड के पलायन व अभावग्रस्त जटिल पिछड़े क्षेत्रो के काश्तकारों तथा युवाओं की आर्थिक तंगी, जंगली जानवरों का उत्पात तथा चकबंदी का न होना, लोगों की उद्यमिता भावना को बहुत अधिक प्रभावित करती है। ऐसे में स्थापित सरकारों का दायित्व बनता है, वे मुहैया की जा रही सब्सिडी तक सीमित न रह कर, अंचल के समग्र उद्यम विकास हेतु संवेदनशील होकर भूमि बिक्री के कड़े कानून लाकर तथा चकबंदी जैसे बड़े कदम उठा कर उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल को स्वरोजगार व उद्यम विकास के क्षेत्र मे अग्रसर करे।