दो प्रतिशत अधिक मतदान आखिर किसके पक्ष में हुआ

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जहाँ  2012 में 66.6 प्रतिशत  तो  इस बार 68 प्रतिशत हुआ मतदान 

सूरमाओं के चेहरे की उड़ी हवाइयां 

देहरादून। उत्तराखंड राज्य में चौथी विधानसभा के लिए हुए मतदान के दौरान हरिद्वार तथा उधमसिंह नगर में छिटपुट घटनाओं को छोड़कर शांतिपूर्ण संपन्न हो गया। चौथी विधानसभा के लिए करीब 68 प्रतिशत मतदान हुआ है, जो 2012 में तीसरी विधानसभा के लिए हुए 66.6 प्रतिशत से लगभग दो फीसदी अधिक है। सबसे अधिक उत्तरकाशी में 73 प्रतिशत और सबसे कम अल्मोड़ा में 52 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। भारी मतदान को लेकर दोनों ही राजनीतिक दलों के सूरमाओं की नींद उड़ गयी है , हालाँकि दोनों ही इसे अपने पक्ष में होने का दावा कर रहे हैं लेकिन इस दो फीसदी अधिक वोट से उनके चेहरों की हवाइयां उड़ी साफ़ नज़र आ रही है। 

मतदान प्रतिशत का जहां तक सवाल है, उसमें वृद्धि दर्ज हुई है, लेकिन यह वृद्धि बहुत अधिक नहीं है। अधिक मतदान को परिवर्तन के तौर पर लिया जाता है। लेकिन यहां सवाल उठ रहा है कि करीब दो प्रतिशत अधिक मतदान क्या उत्तराखंड में परिवर्तन की चाह में हुआ है या इसके मायने कुछ और ही हैं ?

उत्तराखंड के चुनाव में अधिकांश सीटों पर भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधे मुकाबला रहा है। भाजपा की चुनाव रणनीति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ईर्द-गिर्द घूमती है। भाजपा ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि नरेंद्र मोदी के चेहरे को लेकर वह चुनाव में जाएगी। जबकि कांग्रेस का चुनाव प्रचार पूरी तरह से मुख्यमंत्री हरीश रावत पर केंद्रित था। इस चुनाव में भाजपा का नारा परिवर्तन को लेकर था। मोदी समेत भाजपा नेताओं ने चुनाव प्रचार समाप्त होते-होते प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार के जमकर आरोप लगाए। भाजपा की इस आक्रामक रणनीति में कई बार शब्दों की सीमाएं भी लांघी जाती रही। कांग्रेस ने भी उसी भाषा में भाजपा को जवाब दिया। यदि कांग्रेस की चुनाव प्रचार नीति पर नजर डालें तो वह ‘‘ उत्तराखंड रहे खुशहाल, रावत पूरे पांच साल’’ पर केंद्रित रही। सरकार को दुबारा लाकर प्रदेश को खुशहाल बनाने का आहवान कांग्रेस ने किया।

हालांकि पिछले चुनाव के मुकाबले वोट स्विंग उतना बड़ा नहीं है। करीब दो प्रतिशत वोट अधिक पड़ा है। यह दो प्रतिशत वोट यदि मोदी फैक्टर की वजह से पड़ा है तो भाजपा को इसका लाभ मिलना तय है, लेकिन यह वोट यदि कांग्रेस सरकार के स्थायित्व को लेकर पड़ा है तो कांग्रेस की सरकार फिर से सत्ता में आ सकती है।

सबसे बड़ा सवाल स्थायी सरकार के लिए पूर्ण बहुमत की सरकार को लेकर है। क्या इस बार भी उत्तराखंड की जनता पूर्ण बहुमत की सरकार चुनने से परहेज करने वाली है? क्योंकि तीनों विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत की सरकार नही ंचुनी जा सकी है। इस स्थिति में निर्दलीय तथा छोटे दलों की भूमिका क्या होगी? वैसे आम तौर पर कहा जाता है कि सरकार पूर्ण बहुमत की होनी चाहिए, अन्यथा निर्दलीय तथा छोटे दल सौदेबाजी पर उतर आते हैं। जो राज्य की सेहत के लिए ठीक नहीं है।

बहारहाल मतदान से एक दिन पहले कोटद्वार से लेकर टनकपुर तक कुछ मारपीट की घटनाएं सामने आई थी, लेकिन मतदान के दिन पुलिस प्रशासन की चौकसी से कोई बड़ी घटना नहीं हुई। हरिद्वार तथा उधमसिंह नगर में कुछ छिटपुट घटनाएं हुई हैं। जबकि पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट में सेक्टर मजिस्टेट की ड्यूटी पर तैनात करन सिंह की हृदयघात से मौत होने की सूचना है।