कृषि को जीविका से जोड़ने के वास्ते चकबन्दी करने जरूरी

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देहरादून  : रक्षासूत्र आन्दोलन के प्ररणेता सुरेश भाई ने कहा कि भले उत्तराखण्ड में कृषि योग्य भूमि कम हो इस कारण राज्य का युवा रोजगार की तलाश में गांव छोड़ कर चला जाता है मगर राज्य में कृषि को जीविका से जोड़ने के वास्ते चकबन्दी करने जरूरी है परन्तु उन्होने सवाल खड़ा किया कि चकबन्दी से पहले राज्य के भूमिहीनों के बारे में सरकार को एक सफल नीति बनाना होगी ताकि चकबन्दी जैसा कार्यक्रम समता का रूप ले पाये उन्होने कार्यशाला में युवाओं से जानना चाह कि क्या पानी का किराया बढ़ना चाहिए ? यह सवाल कौतुहल का विषय इसलिये है कि वर्तमान सरकार ने जलकर जिस तरह से बढाया है वह निश्चित रूप से उत्तराखण्डवासियों के लिये सकंट पैदा करने वाले है क्योंकि पानी से ही जीवन और जीविका जुड़ी है अर्थात इस तरह के अनैतिक निर्णय युवाओें को भारी मात्रा में प्रभावित करता है।

विश्व युवा केन्द्र के सहयोग से लोक जीवन विकास भारती बूढाकेदारनाथ व पर्वतीय शोध केन्द्र केन्द्रीय विश्व विद्यालय श्रीनगर गढवाल के सयुंक्त तत्वाधान में ‘‘युवा स्वावलम्बी जीवन विकास प्रशिक्षण’’ विषय पर दो दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया हैं। इस कार्यशाला में युवा ग्राम प्रधान, क्षेत्रपंचायत, जिला पंचायत के सदस्यों सहित विभिन्न स्वयं सेवी सस्थाओं से जुड़े कार्यकर्ता सम्मिलित हुये है।

 कार्यशाला में कृषि विश्व विद्यालय चिरबटिया के अधीष्ठाता डा0 भगवती प्रसाद नौटियाल ने युवाओं का ध्यान कृषि स्वावलम्बन की और खींचा है। उन्होने कहा है कि उत्तराखण्ड में बहुविविधता के प्राकृतिक संसाधन है जो आजीविका के साधन बन सकते है परन्तु एक मात्र कृषि को जीविका से जोड़ना ठोड़ा सा कठिन है क्योकि राज्य में कृषि की जमीन मात्र 13 प्रतिशत है जिसमे सींचित जमीन नाममात्र की है इसलिये राज्य में स्वावलम्बन विकास के लिये जैव-विविधता को रोजगार से जोड़ना होगा। वे उदाहरण दे रहे थे कि उन्होने मात्र 25 नाली जमीन पर कलमी अखरोट की खेती आरम्भ की है जिससे साल भर में रू0 दो लाख की आमदानी होती है।

उन्होने बताया कि अखरोट का एक पेड़ 200 रू0 का मुनाफा काश्तकार को देता है । उन्होने अगाह किया कि उत्तराखण्ड में 12 हजार के प्रकार है जिसे शिल्प उद्योग का दर्जा दिया जा सकता है जबकि 40 प्रकार के ऐसे प्राकृतिक संसाधन है जो युवाओं को स्वावलम्बन की और जोड़ सकता है । बशर्ते राज्य में एकीकृत विकास नीति दरकार है। उन्होने यह भी बताया कि अकेले उत्तराखण्ड के जंगल पूरी दूनिया को लगभग 36 हजार करोड़ की सेवा दे रहे है।

इस दौरान केन्द्रीय हेमवन्ती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो0 मोहन पंवार ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद तीन तरह के त्वरित परिवर्तन हुये है जिनमे जलवायू, राजनैतिक व जनांकीकी। इस परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित उत्तराखण्ड राज्य का युवा हुआ है। उन्होने सलाह दी की उत्तराखण्ड मे समावेशी विकास के लिये ग्राम उत्सव बनने चाहिये। इस हेतु छोटे-छोटे जलागम क्षेत्रों में शोध कार्य, संगठनात्मक निर्माण, जन पैरवी, व बौद्विक सम्पदा को संयुक्त रूप से एक कार्यक्रम के तहत आगे बदना होगा। उन्होने दूरस्थ क्षेत्र प्रतापनगर का एक उदाहरण प्रस्तुत करतें हुये कहा कि पटूड़ी गांव की 90 महिलाये औरगेनो जैसे पिज्जा मसाला की खेती करते है और वे एक साल में प्रति महिला 1.50 लाख रू0 की आमदानी करती है। इसलिये ऐसे स्वावलम्बन की दिशा में युवाओं को जोड़ने की नितान्त आवश्यकता है।

इस दौरान लोक जीवन विकास भारती के संस्थापक व शिक्षाविद् बिहारी लाल जी ने सभी अभिवादन किया। पर्वतीय शोध केन्द्र गढ़वाल विश्वविद्यालय के डा0 अरविन्द दरमोड़ा ने कार्यक्रम का संचालन किया। कार्यक्रम में लोक जीवन विकास भारती के मंत्री जयशंकर नगवान, उद्यान विभाग चतर सिहं, विश्व युवा केन्द्र दिल्ली के प्रवीन कुमार शर्मा, सत्य प्रसाद जोशी, साहब सिहं सजवाण, जन विकास संस्थान के अध्यक्ष बैशाखी लाल, धीरेन्द्र प्रसाद नौटियाल, किशोरी लाल नगवान, नागेन्द्र दत्त, जगदीश बंगरवाल, बीरेन्द्र सिहं नेगी, हर्षमणि उनियाल, अनिता शर्मा, लक्ष्मी विष्ट, सहित राज्य भर के सैकड़ो युवा और युवतियां सम्मिलित थे।

कार्यशाला में चकबन्दी से पहले भूमिहीनों को भूमि दिलवाने की बात सामने आयी। गुणवतापूर्ण शिक्षा का अभाव ही युवाओं में भटकाव पैदा कर है। रोजगार नीति में प्रबंधन का अभाव । जैसे भावनात्मक सवाल कार्यशाला प्रथम दिन खुल कर सामने आयी।