स्मरणीय दिवसः आपातकाल और राष्ट्रीय सेवक संघ की भूमिका

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स्वयंसेवक लिए ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ होगा। जरूरत पड़ने पर वह तन, मन और धन भी समर्पित कर देगा

  •  कमल किशोर डुकलान
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मात्र शाखा केंद्रित संगठन नहीं है। संघ का मानना है कि संघ कुछ भी नहीं करेगा, पर स्वयंसेवक समाज जीवन में सब कुछ करेगा। अर्थात स्वयंसेवक की जहां भी आवश्यकता होगी। उस आवश्यकतानुसार राष्ट्रहित में शाखा से लिए गए संस्कारों के अनुसार रणभूमि में कूद पड़ेगा। स्वयंसेवक लिए ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ होगा। जरूरत पड़ने पर वह तन, मन और धन भी समर्पित कर देगा। इसका स्पष्ट उदाहरण आपातकाल में संघ की भूमिका से स्पष्ट हो जाता है।
भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी, जिन्होंने भारत के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करवाई। (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977) तक  21 महीने की समय अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारत की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी थी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह समय सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक था।
आपातकाल में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा बिहार, गुज़रात में चुनाव स्थगित करवाए गए तथा भारतीय नागरिकों के अधिकारों को समाप्त करके अराजकता रूपी मनमानी की गई। राजनीतिक विरोधी नेताओं को कैद कर लिया गया और प्रेसवार्ता को पूर्णतया प्रतिबंधित कर दिया गया। देश में संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने में पुरुष नसबंदी का अभियान चलाया गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इसे ‘भारतीय इतिहास का सर्वाधिक काला अध्याय’ कहा था।
 परिणामस्वरूप श्रीमती इंदिरा गांधी को लगा कि पाकिस्तान की तरह सर्वोच्च शक्ति मेरे हाथों में आ जाए तथा मैं अपने हिसाब से लोकतंत्र की व्या॔ख्या किया करुं। अंततः श्रीमती इंदिरा गांधी ने पूरे देश में आपातकाल की घोषणा कर दी।
लगभग 2 वर्षों तक संघ पर प्रतिबंध लगा रहा। तब संघ नेतृत्व के समक्ष यह प्रश्न उठा कि हमें मात्र प्रतिबंध हटाने के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए या लोकतंत्र की रक्षा के लिए लोकसंघर्ष समिति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए। संघ विश्व का लोकतांत्रिक रूप से सबसे बड़ा संगठन है। यद्यपि संघ संस्थापक डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार एक राजनैतिक कार्यकर्ता भी थे, पर परिस्थितियों ने उन्हें संघ की स्थापना के लिए प्रेरित किया।(14 नवंबर, 1975 से 26 जनवरी, 1976) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मात्र प्रतिबंध हटाने को लेकर तैयार नहीं हुआ। उसके लिए भारतमाता सर्वोपरि है। इस दृष्टि से संघ ने प्रण किया है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए जय प्रकाश नारायण के आंदोलन में संघ के स्वयंसेवक अग्रिम पंक्ति में रहेंगे। जब संघ नेतृत्व को लगा कि विदशों में भी हमारा पक्ष मजबूत होना चाहिए तो प्रख्यात अर्थशास्त्री पी. सुब्रह्मण्यम स्वामी की पत्नी ने कई देशों की यात्रा की एवं आपातकाल में होने वाले कार्यों का विवरण प्रस्तुत किया।
 डॉ. हेडगेवार जी ने संगठन स्थापना काल में दीनहीन भारतीय समाज को देखा था। उनके मन में एकमात्र पीड़ा हमेशा रहती थी कि आखिर  भारतीय समाज बुराइयों के प्रतिकार के लिए संगठित क्यों नहीं होता-? भारतीय समाज की हीन दशा को लेकर वे अनेक वर्षों तक सो भी नहीं पाते थे। जिस संगठन का जन्म ही देश, समाज, राष्ट्र तथा भारतीय संस्कृति जैसे विषयों को लेकर हुआ हो वह संगठन व्यक्ति, राष्ट्र तथा राजनैतिक विकृति को लेकर सचेत तो होगा ही।
देश में चारों ओर मारपीट, धरपकड़, गिरफ्तारियां तथा सेंसर लगा दिया। लोकतंत्र की रक्षा के लिए ‘इंडियन एक्सप्रेस’ तथा ‘जनसत्ता’ का अमूल्य योगदान रहा। जो मेरे लेख ”आपातकाल और मीडिया’’ में देखा जा सकता है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। यह राष्ट्र का सजग प्रहरी भी होता है, लेकिन जब आकाशवाणी(इंदिरावाणी) तथा दूरदर्शन(इंदिरा दर्शन) बन जाए तो यह सत्य की हत्या ही हुई। आडवाणी ने आपातकाल में प्रेस को ”रेंगने वाला’’ तथा विद्या चरण शुक्ल ने ”स्वतंत्रता समाप्ति’’ की बात कही है।जनता के समक्ष एकमात्र विकल्प यही था कि वो या तो सशस्त्र विद्रोह करें या सेना बगावत करे। समस्या का समाधान कहीं भी निकल नहीं रहा था। सारे के सारे समाचार पत्र ‘सरकारी बन गए थे।
आपातकाल को विनोबा जी ने ”अनुशासन पर्व’’ कहा था। विनोबा जी एक प्रकार से ”सरकारी साधु’’ की तरह दिखाई दे रहे थे। उनके द्वारा आचार्यकुल’’ नामक संस्था सरकार समर्थित लगने लगी थी। उस समय संघ नेतृत्व ने यह विचार किया कि वर्धा में आयोजित आचार्य सम्मेलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक अपना पक्ष रखेंगे। आचार्यकुल सम्मेलन में उन्होंने विनोबा जी को एक पत्र दिया। जिसमें लिखा था। बाबा आपने आपातकाल को अनुशासन पर्व कहा है तथा यह कैसे सम्भव हो सकता है कि आचार्यों का चिंतन स्वतंत्र एवं निष्पक्ष हो। आपको इस पर भी विचार करना चाहिए।
आपातकाल में सरकार तथा पुलिस संघ के स्वयंसेवकों के प्रति बहुत दुर्भावना रखती थी। आपातकाल के इन बीस महीनों में पुलिस ने सत्याग्रहियों को काफी यातनाएं दी गईं।
संघ के स्वयंसेवकों पर हो रहे  अत्याचारों से ऐसा लगता है कि श्रीमती इंदिरा गांधी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शत्रु क्रमांक 1 का रहा हो। संघ के विशाल सत्याग्रह में उस समय लगभग 60 हजार स्वयंसेवकों ने भाग लिया।
समाचार पत्रों, आकाशवाणी केंद्रों एवं दूरदर्शन केंद्रों ने श्रीमती इंदिरा गांधी के तानाशाह पूर्ण आपातकालीन संघर्ष को इतना मुखारित किया कि एक समझौते के साथ सन्धि के लिए हाथ आगे बढ़ाना पड़ा, किन्तु आपातकाल हटने के बाद देश में लोकतंत्र के तहत हुए चुनाव में श्रीमती इंदिरा गांधी को हार का मुंह देखना पड़ा।
श्रीमती इंदिरा गांधी का कहना था कि संघ सरकार से समझौता करें। समझौता में दोनों पक्षों को कुछ लेनदेन तो करनी ही होती हैं। आपके स्वयंसेवक 21 महीने से जेलों में हैं, इसलिए समझौता करने का श्रीमती इंदिरा गांधी ने संघ से अनुरोध किया, किन्तु आपातकाल के बाद पूरे देश में हुए चुनाव में पूरी कांग्रेस को इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में हार का मुंह देखना पड़ा।