जो यह कहते हैं कि ..इससे तो हम लखनऊ में ही ठीक थे, जी नहीं हम तो नहीं थे

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इस क्षेत्र को तिरस्कार की भावना से देखा जाता था,ऐसे में यहां का विकास होता भी कैसे, यह क्षेत्र पूरी तरह आदिवासी क्षेत्र की तरह समझा जाता था

अर्जुन बिष्ट की फेसबुक वाल से 
सुबह फेसबुक पर राज्य स्थापना दिवस की बीसवीं वर्षगांठ की बधाइयों की लंबी फेहरिस्त देखते हुए लाइक और कमेंट कर रहा था। इसी बीच एक पोस्ट आदरणीय प्रोफेसर आदित्य नारायण पुरोहित (पद्मश्री) जी की देखी। जिसमें उन्होंने लिखा था कि उत्तराखंड को राज्य नहीं यूनियन टेरेटरी बनाया जाना था। इस पर अपने विचार रखेें।
प्रोफेसर पुरोहित साहब के साथ बहुत करीबी संबंध हैं। कई बार मेरे गांव के विकास के संबंधित विषयों पर उनसे बहुत मदद भी मिली। २००२ में वे मेरे गांव आ चुके हैं और हमारे ही घर में ठहरे थे। आज घेस क्षेत्र में जड़ी—बूटी की जो खेती हो रही है, उसके पीछे पुरोहित साहब के योगदान को भी हम नहीं भूल सकते। ऐसे में राज्य गठन के इतने साल बाद उनकी आेर से व्यक्त की गयी इस चिंता को हल्के में नहीं लिया जा सकता। हम कई बार झल्लाहट में लोगों को यह कहते हुए भी सुनते हैं कि ये राज्य गलत बन गया और इससे भले तो हम लखनऊ में ही थे। क्या वाकई यह बात सही है कि हम लखनऊ में ही सही थे।
फिर मुझे खयाल आया कि जरा यह तो देखूं कि मेरे आसपास इन वर्षों में कुछ हुआ कि नहीं। मैं पूरे उत्तराखंड की बात नहीं करता। सिर्फ अपने छोटे से उस क्षेत्र की बात करता हूं, जिसके विकास को लेकर मैं ही नहीं उस क्षेत्र के हम सभी लोग बहुत नाउम्मीद हो चुके थे। सीमांत विकास खंड देवाल के इस आखिरी इलाके घेस की स्थिति बहुत ही खराब थी। समय के साथ हम लोगों का दृष्टिकोण बदलने में कामयाब रहे हैं, लेकिन तब देवाल के लोग भी यहां के लोगों को हेय दृष्टि से देखते थे। मैं जब खुद देवाल पढऩे आया तो हमसे पहले वाले साथी बोलते थे कि दुकानदार पूछेगा कि कहां के हैं तो घेस मत बताना। फिर वो यह भी कहते थे कि सवाड़ या मुंदोली बता देना। कुछ एेसी थी हमारी स्थिति जब हम अस्सी के दशक में आठवीं पास करके देवाल आये थे।
देश की आजादी के समय ग्राम पंचायत घेस एक ही ग्राम सभा त्रिशूल हिमालय की गोद में थी। तब आजाद हिंद फौज के महान सेनानी मेजर देव सिंह दानू जी (पूर्व विधायक स्व. शेर सिंह दानू जी के पिता) इस गांव के पहले प्रधान बने। देव सिंह दानू जी आजाद हिंद फौज में जाने से पहले गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट सेंटर में सूबेदार मेजर थे और आजाद हिंद फौज में जाने के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें अपनी अंगरक्षक बटालियन का कमांडिंग अधिकारी यानि सीआे बनाया था। (दानू जी पर विस्तार से फिर कभी बाद में) समय के साथ—साथ यहां विस्तार हुआ इस एक पंचायत की अब चार पंचायतें घेस, हिमनी, बलाण व पिनाऊं के नाम से बन चुकी हैं।)
आप अंदाज नहीं लगा सकते हैं कि इस क्षेत्र को तिरस्कार की भावना से देखा जाता था,ऐसे में यहां का विकास होता भी कैसे, यह क्षेत्र पूरी तरह आदिवासी क्षेत्र की तरह समझा जाता था। अंग्रेजों के जमाने में यहां घेस में एक प्राइमरी स्कूल खुला था जो सत्तर के दशक तक तक अपग्रेड नहीं हो पाया। 1971 में मेरे पिता श्री बलवंत सिंह जी प्रधान बने तो वे पूर्व विधायक श्री शेर सिंह दानू जी के सहयोग से इस प्राइमरी स्कूल को किसी तरह क्रमोत्तर यानि आठवीं तक अपग्रेड करवाने में कामयाब रहे। उसी दौरान चार बेड का आयुर्वेदिक अस्पताल भी यहां हमारे ही एक पुराने मकान में महज 60 रुपये किराये में शुरू हुआ था। तब से लेकर वर्ष २००२ तक इस क्षेत्र में विकास की गाड़ी का पहिया एक तरह से जाम ही था। इन बीस सालों में त्रिशूल हिमालय की तलहटी में बसे घेस क्षेत्र ने विकास के वो तमाम चेहरे देखे, जो इस क्षेत्र के लिए एक दिवास्वप्न ही था।
विंदुवार स्थिति यह है।

1— आज घेस की वह जूनियर हाईस्कूल इंटर कालेज का बड़ा आकार ले चुकी है। पहले २००४ में हाईस्कूल करने में पूर्व सीएम भगत दा व तत्कालीन कमिश्नर गढ़वाल सुभाष कुमार साहब का बड़ा योगदान रहा। उसके बाद 2005 में इंटर कालेज के रूप में अपग्रेड करने में तत्कालीन सीएम हरीश रावत जी का बहुत योगदान रहा। यही नहीं बलाण गांव में भी रमसा की हाईस्कूल खुल चुकी है। हिमनी गांव में भी जूनियर हाईस्कूल वर्षों पहले खुल गया है।

2—देवाल से 25 किलोमीटर पैदल चलकर हम घेस पहुंचते थे। २००५-०६ में पहले कुनार बैंड टू घेस 27 किलोमीटर सडक़ स्वीकृत हुई और उसके बाद घेस टू बलाण 12 किलोमीटर और सडक़ स्वीकृत होने बाद कट भी गयी। सडक़ अब आली बेदिनी बुग्याल से कुछ घंटों की दूरी पर स्थित बलाण गांव से महज दो किलोमीटर की दूरी पर पहुंच चुकी है। पूर्व सीएम मे. जन. बीसी खंडूड़ी जी ने 7 दिसंबर 2011 में घेस रोड का लोकार्पण भी कर दिया। घेस रोड की स्वीकृति में जनरल साहब की भूमिका हमारे लिये अविस्मरणीय रहेगी।

3— क्षेत्र की तीसरी बड़ी जरूरत, ग्रिड की बजली की रोशनी से इस सीमांत घाटी का अंधकार दूर हो चुका है। पर्यावरणीय कठिनाइयों के बावजूद वर्तमान सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत जी ने इस क्षेत्र के विद्युतीकरण के लिए जो सहयोग किया उसे लोग हमेशा याद रखेंगे। उन्होंने 25 नबंवर 2018 को घेस पहुंचकर बिजली का स्विच आन करके नयी रोशनी दिखायी। त्रिवेंद्र जी ने यहां मटर की खेती व जड़ी बूटी की खेती के प्रोत्साहन के लिए भी किसानों को प्रोत्साहित किया।

4— घेस में ब्रिटिश टाइम का एक फारेस्ट रेस्ट हाउस था। बीते बर्षों में वह पूरी तरह जर्जर हो चुका था। महाराष्ट्र के गवर्नर व पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी जी ने इस रेस्ट हाउस के नवीनीकरण के साथ ही अन्य समस्याआें के निराकरण के लिए हमेशा अपना सहयोग दिया। भगत दा का इस क्षेत्र के प्रति लगाव यहां के लोग नहीं भूल सकते, उन्हें २००२ में पैदल ही घेस का दौरा किया था तब यहां कुछ भी नहीं था।

बिना स्कूल के छठी से आगे की पढ़ाई कैसे होती होगी इसको सहज ही समझा जा सकता है। शायद यही कारण रहा कि यहां की शैक्षिक दर २००o से पहले काफी कम रही।
बीस वर्ष के सफर में ये कुछ वानगी हैं, जो मेरे इस सीमांत क्षेत्र को मिली हैं। मैं समझता हूं विकास का पहिया एेसे ही दूसरे क्षेत्रों में भी घूमा होगा। बस इस बीसवीं वर्षगांठ में हम सब एक बार बीस बरस के विकास की गाथा को सामने रखने के बाद यह चिंतन करें कि क्या हम लखनऊ में ही ठीक थे या फिर अपना राज्य पाकर आगे बढ़ रहे हैं। घेस क्षेत्र आज विकास के इस मुकाम तक पहुंचा है तो क्षेत्र के कुछ दिवंगत प्रतिनिधियों को याद करना चाहूंगा। इनमें हिमनी के पूर्व प्रधान अब दिवंगत स्व. उदय सिंह दानू जी, बलाण के पूर्व प्रधान स्व. पुष्कर सिंह दानू जी, पिनाऊं के पूर्व प्रधान स्व. केशर सिंह दानू जी, घेस के पूर्व प्रधान स्व. पदम सिंह बिष्ट पधान जी वो नाम हैं, जिन्होंने रामसेतु के निर्माण में गिलहरी जैसे प्रयास निरंतर किये थे।

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मुझे याद है पूर्व विधायक स्व. शेर सिंह दानू जी मेरे ताउ स्व. देव सिंह बिष्ट जी (पोस्टमास्टर) से कह रहे थे कि देव सिंह जिस दिन मैं चौंराधार में गाड़ी से उतर जाऊंगा तो अपने प्राण भी छोड़ दूंगा और कोई इच्छा नहीं है। दानू जी के इस दर्द से समझा जा सकता है कि यह क्षेत्र विकास से कितना दूर था।