अभिमंत्रण सिस्टम जब भी व्यवधातित किया गया तब तब इस क्षेत्र ने विप्लव देखे

बद्रीनाथ की व्यवस्था पर टेहरी की 16 वीं सदी के समय हस्तक्षेप किया तो हुआ था भारी जन विरोध

एक सिद्ध की भविष्यवाणी के रूप में आज भी ताजा है कि “गढ़ी मढ़ी रह जायेगी”

भारी जन और सरोला विरोध के  चलते,  न केवल राजशाही को देवलगढ़ और फिर श्रीनगर जाना पड़ा

देवभूमि मीडिया ब्यूरो

चारधाम के लिए श्राइन बोर्ड गठन कीबात की जा रही है। लेकिन समस्या यह है कि इन चार धामों में बद्रीनाथ और केदारनाथ का  धार्मिक विधान अन्य धामों से अलग है। उत्तराखंड में देश के चार धामों और बारह ज्योतिर्लिंगों में बद्रीनाथ और केदारनाथ ही आते हैं। ऋग्वेदिक बदरीवन और अति महत्वपूर्ण एकादश ज्योतिर्लिंग केदारनाथ इन दोनों धामों का इतिहास और आध्यत्मिक तीव्रता का तरीका अन्य धामों से अलग हैं।

एकादश ज्योतिर्लिंग केदारनाथ  के कारण इस समस्त क्षेत्र को केदारखंड और दीपावली के अक्तिरिक्त अनंत ब्रह्मांड के नियंत्रक कर्ता श्री हरि विष्णु बद्रीविशाल की प्रिय देवोत्थायनी एकादशी तिथि इगास की अनूठी परंपरा संकेत देती है कि यहाँ कुछ परंपराएं थोड़ा और अधिक जटिल और गूढ़ हैं। श्रीबद्रीनाथ और  केदारनाथ ,ये वो धाम हैं जहां आज भी वैदिक काल का अभिमंत्रण मॉडल, जिसमें खगोलीय विज्ञान के तंत्र आधार पर स्थानों को अभिमंत्रित किया गया था, का पूरी तरह अनुपालन करने का , जितना वर्तमान परम्परा वाहकों से संभव हो पाता है, प्रयास होता है।  और यह अभिमंत्रण सिस्टम जब भी व्यवधातित किया गया तब तब इस क्षेत्र ने विप्लव देखे हैं। 

विगत इतिहास में ही जब बद्रीनाथ की व्यवस्था पर टेहरी की 16 वीं सदी के समय की तत्कालीन नई नई स्थानीय साम्राज्य व्यवस्था ने, जो उस काल में, उस समय गुजरात से आई थी, हस्तक्षेप किया तो भारी जन विरोध हुआ। उसकी स्मृति जनमानस में एक सिद्ध की भविष्यवाणी के रूप में आज भी ताजा है कि”गढ़ी मढ़ी रह जायेगी”। उस भारी जन और सरोला विरोध के  चलते,  न केवल राजशाही को देवलगढ़ और फिर श्रीनगर जाना पड़ा अपितु गोरखनाथ परम्परा के गूढ़(occult )साइंस के विद्वानों के  देवलगढ़ के सिद्ध  सतीनाथ ( सत्यनाथ) की शरण जाकर उनका अनुसरण करना पड़ा। क्योंकि गुरु गोरखनाथ शंकराचार्य की गूढ़  विज्ञान, रहस्य , तंत्र के साथ वास्तविक वैदिक ज्ञान प्रणाली के अंतिम विशेषज्ञ थे।

शंकराचार्य के समय के कार्तिकेयपुरम शासक मात्र शासक ही नहीं थे बल्कि इसी गूढ़ ज्ञान परंपरा से आते थे। बौद्ध धर्म संबंधी  और हिमालय के पार से आने वाली चुनौतीयों के क्षीण पड़ जाने के बाद कार्तिकेयपुरम साम्राज्य बागेश्वर स्थानांतरित होने के पश्चात अवसान के बाद, उनकी पंचबद्री पंचकेदार में रह गयी शाखा ,पुनः अपनी गूढ़ साधनाओं और अपने आद्ध्यात्मिक जीवन के उन्नयन में लग गयी।

कुछ  शताब्दियों के बाद जब गोरखनाथ का उत्तराखंड आगमन हुआ तोकार्तिकेयपुरम साम्राज्य की गूढ़ विद्याओं का गुरु गोरखनाथ की क्रियाओं के साथ समन्वय हुआ और प्राचीन जागरों के समन्वय से नए साबर मंत्रों  ने  और नई तरह की जागरों ने जन्म लिया। जिसे उत्तराखंड में सिद्ध परम्परा के मंत्रों के रूप में जाना जाता है।

जोशीमठ, नंदप्रयाग, पिंडर घाटी , नागपुर पट्टी इनके प्राचीन गढ़ रहे हैं और  देवलगढ़ उन्ही सिद्धों का उत्तरकालीन केंद्र बना जो इनके अलावा शिवालिक श्रेणियों व भाभर के क्षेत्रों में भी कई स्थानों को सिद्ध कर गए। लेकिन उत्तर मध्ययुग में उत्तराखंड आये शासकों ने, जब गढ़वाल में साम्राज्य विस्तार किया और फिर जब  बोलांदा बद्री का विरुद लेकर कार्तिकेयपुरम साम्राज्य की परंपराओं पर हस्तक्षेप किया अथवा दावा करने का प्रयास  किया तो फिर कार्तिकेयपुरम परंपराओं के सरोलाओं द्वारा विरोध हुआ।

इस विरोध के चलते राजा द्वारा प्राचीन काल से चले आ रहे हक हकूक को,जो आज भी शंकराचार्य गद्दी जोशीमठ और नरसिंह मंदिर व ब्रह्मकपाल पर अवशेष के रूप में हैं ,उन सतियों को हटाकर,  बाद में अपने चहेते नए लोगों ,जो उस समय सरोले यानी प्राचीन कार्तिकेयपुरम परम्परा के कुलीन ब्राह्मण न थे,को हक़ हूकूक व मंदिर के अंदर आधिपत्य दिया गया तो गढ़वाल ने ऐतिहासिक भूकंप, अवर्णनीय अकाल और बाद में गोरखे हमले और दून घाटी अनवरत हमलों और लूटपाट मे का दौर झेला और टेहरी रियासत की राजधानियों को बार बार उजड़ते और डूबते देखा।

जब भी कोई राजसत्ता इन्हें मात्र आय का जरिया समझ कर इनकी स्थापित व्यवस्थाओं से चीजो को  ठीक से समझे बिना नई व्यवस्था के नाम पर छेड़खानी करती है, तो उसके परिणाम अच्छे तो नहीं रहे। केदारनाथ आपदा के समय भी  अपनी लाल बत्ती की खनक में कुछ लोगों द्वारा मन्दिर के कपाट खुलने और भैरों बाबा के पूजन के मामले में, वी आई पी लोगों के समयाभाव का हवाला देकर, चलता फिरता काम करने का मामला जन चर्चाओं में था।  उस समय तत्कालीन बत्तीधारी के गांव के आसपास भी आसमानी बिजली ने अपना इशारा दिखाया था।

कहने का तात्पर्य यही है कि ये दोनों धाम बहुत वैदिक ज्ञान विधि से पहले वैदिक ऋषियों और फिर बाद में शंकराचार्य जैसे अलौकिक व्यक्तित्व द्वारा हाई प्रोफाइल तरीके से अभिमंत्रित हैं। बद्रीनाथ के धार्मिक और अन्य महत्व के कारण वहां के प्राचीन हक हूकूक धारियों को हाशिये पर रख कर वहां नईं बसावट के लोग मंदिर में अपनी अपनी पैठ बैठाने की जुगत में एक दो शताब्दियों से लगे रहे हैं।

केदारनाथ में भी टेहरी रियासत ने किस तरह रविग्राम के जमलोकियों के पराम्परागत हक हकूक को, किस तरह , गंगा यमुना मैदान के मुस्लिम आक्रांताओं के हमलों से खदेड़े गए लोगों को , जो कुमायूं होते हुए कालांतर में मंदाकिनी घाटी में बस गए लोगों को दिया गया। दरबार के तथाकथित न्यायालय ने रविग्राम के पुराने परंपरागत हूकूक धारियों के अधिकारों को, बाद में आये ऐसे लोगों को जिन्हें इन तीर्थों की गूढ़ता का पर्याप्त अनुमान नहीं था , न जो मंदिर परंपरा के सरोले ( प्राचीन कुलीन)थे,को हस्तांतरित कर मंदिर परंपराओं को और गरिमा को जाने अनजाने में अवनयन किया।अब मंदिर में राजनैतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप बढ़ने के बाद कुछ ईमानदारी से प्रयास तो जो हो सकते थे वो हुए नहीं।

लेकिन मंदिर की प्राचीन व्यवस्थाओं को पलीता लगाने वाले नए नए प्रबंधन प्रयोग और विचार प्रस्तुत होते रहें हैं। स्थानीय हक हूकूक धारियों  को प्रशिक्षण और वर्तमान व्यवस्था में प्रबंधन कौशल की निपुणता की असफलता के लिए अब श्राइन बोर्ड का झुनझुना बजाया जाने लगाया है। उत्तराखंड में मलाई खा रही नौकरशाही को समर्पण और आत्मीयता से काम तो करना है नहीं। तो टपाए सेकंड हैंड हुए आईडिया पेश कर देते हैं।

केदारनाथ आपदा के नाम से आयी धनराशि का क्या हश्र हुआ? इतनी बड़ी विपदा में भी जिन लोगोँ की घोटाले की प्रवृत्ति नहीं पसीजी। जितना धन केदारनाथ आपदा के समय आया उतने में क्या एक रोपवे नहीं बन सकती थी? लेकिन गंगा यमुना के मैदानों से मंदाकिनी घाटी में आयी जिस बसावट को टेहरी राजा के दरबार ने हक हकूक दिए वे आज भी केदारनाथ को आय का जरिया समझते हैं और रोपवे का न बनना अपने लिए हितकारी समझतें हैं। होटल वालों और खच्चर वालों को यात्रियों को घेरने को लूटने से ज्यादा कुछ नहीं सूझता। यात्रा यानी आय का माध्यम मात्र।अगर ये लोग मंदिर की मूल परंपरा से जुड़े होते तो इतनी अराजकता नहीं होती।

क्योकि श्री  बद्रीनाथ में इस तरह की घुसपैठ केदारनाथ की तुलना में कम हुई हैं इसलिए वहां अव्यवस्थाएं भी कम हैं।अगर केदारनाथ अलकनंदा घाटी में होता तो औली से पहले रोपवे केदारनाथ  पहुंच जाती। लेकिन गंगा यमुना के मैदानों से भागकर आये लोगों ने सारी विरासत, परंपरा और इतिहास को छुपाकर अपनी तरह सभी को भगोड़ा घोषित कर दिया तो शंकरचार्य और कार्तिकेयपुरम साम्राज्य कालीन गरिमा और देवत्व किनमें ढूंढेंगे? केदारनाथ और हेमकुंड में जहां ,रोप वे बन जाने से पर्यावरण , समय की बचत के साथ सरकारी एजेंसी कुछ कमा लेती,वहीं जबरदस्ती रोड खोदकर पहाड़ दरकाने में व्यस्त, नौकरशाहों की टीम, उत्तराखंड में जिस तरह के उजूलजुलूल विचार लाती है, उसे देख कर उत्तराखंड बनने के बाद से लगता रहा कि आखिर ये हो क्या रहा है? व्याधि को कोई समझ नहीं पा रहा। बस उपचार पर उपचार।फिर भी बीमार लाचार।फिर पलायन की दुहाई देते रहो।  यह तो हुई कुछ बद्री केदार क्षेत्र की कुछ अनछुए और थोड़ा हज़म करने में गरिष्ठ तथ्यों की। अब आते हैं श्राइन बोर्ड पर।

 

क्या श्राइन बोर्ड अलादीन का चिराग है जिसके बनते ही यात्रा व्यवस्थाएं अपने आप ठीक हों जाएंगी? भैया कश्मीर में तो जगमोहन थे।उन्होंने तो भारत के संस्कृति मंत्रालय को भी चमका दिया था। कश्मीर को तभी ठीक पटरी पर ले आये थे।उसके बाद वालों से तो कश्मीर नहीं संभला था न?  अगर स्थानीय देवभूमि के हक हूकूक धारियों को इन  धामों की महान गरिमा और इतिहास ,जो अभी अच्छे खासे जानकर को भी नही मालूम है, को  पुनः विधिवत रूबरू कराकर उनको, उच्च स्तरीय होटलिंग, ट्रांसपोर्ट, टूरिस्ट गाइडिंग, हेंडीक्राफ्ट, पशुपालन, हार्टीकल्चर, होम स्टे जैसे क्षेत्रों पर उच्च स्तर पर प्रशिक्षित किया जाय तो वे स्थानीय लोग ही वर्तमान व्यवस्था में ही शानदार परफॉरमेंस दे देंगे। और यात्रा में सहयोग देंगे। यात्रियों को जो कष्ट है वो ट्रैफिक जाम और खाद्य पदार्थों की घटिया गुणवत्ता और महंगी कीमतों से है। स्थानीय गुणवत्ता के उत्पादों के उत्पादन और विपणन की लचर व्यवस्था से है ।

अब क्या श्राइन बोर्ड नजीबाबाद की सडी सब्ज़ियों के स्थान पर स्थानीय सब्ज़ी और दूध उपलब्ध करवाएगा?   ऐसी कई बातें प्रशासन स्तर की हैं। रही बात मंदिर की तो मंदिरों में दर्शन,पूजा और प्रसाद व्यवस्था तो  वैसे ही ठीक की जा सकती हैं। धामों की पावनता को मुंह चिढ़ाती कई शरारती तर्कों के साथ तामसिक पदार्थों की सहज उपलब्धता , ये सब प्रशासनिक और कानून व्यवस्था के विषय हैं। वैसे यह श्राइन बोर्ड का शिगूफा अब तक की यात्रा व्यवस्था प्रबंधन में अयोग्य कार्मिकों के जमावड़े, नकारात्मक राजनैतिक हस्तक्षेप, यात्रा को मात्र एक आय का उपक्रम मानने से और अनमने ढंग से यात्रा व्यवस्थाओं के निर्माण और सबसे ज्यादा इन धामों की समझ न रखने वाले और अदूरदर्शी खेवनहारों के कारण वर्ष दर वर्ष उपजी अव्यवस्थाओं के चलते हुई असफलता को छुपाने के लिए एक श्राइन बोर्ड के गठन का फंदा प्रदेश की उसी नौकरशाही ने फेंका  है।

अब एक तो नीम कड़ा और ऊपर से उस पर करेला चढ़ा। और कुछ नहीं करना, बस एक श्राइन बोर्ड बना दो और इति सिद्धम। बाकी सब अपने आप ठीक ही जायेगा। प्रशासकों को देखों न ,भराड़ीसैण जाने की खुद की हिम्मत तो हो नहीं रही तो सलाहकार तो नौकरशाह ही ठहरे। तो वो  मंत्री साहब लोगों भी सलाह दे रहे हैं कि साहब वहाँ क्या रखा है? देखा न पिछली बार कितनी परेशानी हुई थी।

आराम से देहरादून में श्राइन बोर्ड के शिगूफे छोड़ो। बद्री केदार धाम की परंपराओं में जो छेड़खानी करनी बाकी बची हो, वो भी पूरी कर दो।  पंच बद्री और पंच केदार क्षेत्र के महत्व पर इतना ही कहना है कि चमोली रुद्रप्रयाग जिले के विभाजन से पहले और उसके बाद रुद्रप्रयाग अलग जिला बनने के बाद रुद्रप्रयाग जिले में आपदाओं के रिकार्ड चैक कर ले। आखिर विश्व के सबसे गूढ़ धाम हैं बद्री केदार।

अगर मामला आस्था और श्रद्धा का है और वो भी बैकुंठ धाम बद्रीविशाल और केदारनाथ का तो थोड़ा सा आस्था वाले दृष्टिकोण से भी सोच लो। ये मार्केटिंग से तैयार तीर्थ नहीं हैं ये ज्ञात भारतीय सभ्यता के प्राचीनतम एवम प्रभावी तीर्थ हैं। किसी और से इनकी तुलना करना भी मत। निष्ठा से काम कर लो इसी वर्तमान व्यवस्था में ही शिकायतें दूर हो सकती हैं।

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