उत्तराखंड में अंगूठाछाप पत्रकारिता को बढ़ावा दे रही है सरकार की कमजोर नीति !

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बिना योग्यता वाले गैर पेशेवर लोग पत्रकार बन कर रहे धंधेबाज़ी

कुछ बन बैठे स्टिंग बाज़ तो कुछ बिना कलम घिसे ही बन बैठे हैं वरिष्ठ पत्रकार  

देवभूमि मीडिया ब्यूरो
देहरादून : उत्तराखंड में पत्रकारिता के क्षेत्र में एक अजीब सा दौर चल पड़ा है । इसके लिए राज्य सरकार के साथ ही सूचना विभाग व वास्तविक पत्रकार तक  काफी हद तक दोषी हैं जो ऐसे लोगों को प्रश्रय देकर वर्षों से पत्रकारिता करने वालों को ठेंगा दिखा रहे हैं। 
यह पहला राज्य होगा देश का जहां बिना योग्यता वाले गैर पेशेवर लोग पत्रकार बन रहे हैं । इतना ही नहीं सीधे सम्पादक तक बनकर घूम रहे हैं । अकेले देहरादून में सड़क के किनारे उबले अंडे बेचने वाला, पान का खोका चलाने वाला, दवाई बेचने वाला, जमीनों की दलाली करने वाला, दूल्हा दुल्हन की मेहंदी से लेकर जयमाला की वीडियोग्राफी करने वाला, बीड़ी गुटखा बेचने वाला, रेलवे स्टेशन पर टी स्टॉल चलाने वाला, सुबह सुबह साइकिल पर घर घर अखबार बेचने वाला आदि इत्यादि अयोग्य लोग इन दिनों सूचना विभाग में सूचीबद्ध होकर पत्रकारिता को मुंह चिढ़ा रहे हैं ।
अफ़सोसजनक बात यह कि बिना इनकी योग्यता को परखे ही राज्य सूचना विभाग ने इन गैर पत्रकारों के नाम के आगे बाकायदा संपादक लिखकर सूचना की डायरी में नाम तक प्रकाशित कर दिए हैं । इनकी जमात में 95 फीसदी ऐसे धुरंधर हैं जिन्हें पत्रकारिता का ‘प’ लिखना नहीं आता है । क्या इंट्रो क्या कन्क्लूजन इन्हें कुछ भी पता नहीं होता है । बेशर्मी देखिए इनकी ध्याड़ी देकर अपने नाम से एक्सक्लुसिव रिपोर्ट प्रकाशित कर रहे हैं । ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या सरकार अथवा सूचना विभाग के नुमाइंदों को ऐसे लोगों की पड़ताल करना जरूरी नहीं लगा । इन्हें डिजिटल मीडिया के रूप में सूचीबद्ध करने से पहले कुछ नियम व शर्तें अवश्य जोड़े जाने चाहिए थे ।
आज देहरादून राज्य सूचना विभाग की कमजोर नीति के कारण करीब 700 से ऊपर की वेबसाइट पोर्टल मीडिया उभर आया है । जिनके 95 फीसदी संचालक अयोग्य, दलाल, अनाड़ी व मंदबुद्धि के स्वामी हैं । जो स्वयं को पत्रकार नहीं बल्कि चीफ एडिटर कहलाना पसंद करते हैं । मजेदार बात यह भी कि इनमें से किसी को पत्रकारिता के सिद्धांतों का ही पता नहीं है । इन्हें पत्रकारिता , आश्रम, सशक्तिकरण, निर्वाचन, श्रीमद्भागवत, आशीर्वाद, परिश्रम, क्लिष्टता, क्लिष्ट, प्रतियोगिता जैसे कई ऐसे शब्द हैं या होंगे जो लिखने ही नहीं आते हैं । यह मैंने खुद एक दर्जन संपादक बने अनपढों के साथ करके देख लिया है । किसी खबर का इंट्रो या एंड कैसे करना ये तो बहुत दूर की बात है । फिर भी संपादक जी बन घूम रहे हैं साहब और इनकी ख्वाइशें हैं कि DM से लेकर CM तक सीधे उनसे बात करें ।
इस सबके पीछे वास्तविक पत्रकार भी कम दोषी नहीं हैं । उनकी निष्क्रियता ने इन्हें मौका दे दिया । साथ ही साथ राज्य सरकार व सूचना विभाग नीति जो कि राज्य में दलाल पत्रकारों की फौज खड़ी करने में वरदान साबित हो गई । मजेदार बात यह भी कि, इन अँगूठाछापों की जमात ने 5 से 10 हजार महीने की पगार में कुछ तथाकथित पत्रकारों को ठेका दिया है जो इनकी कलम व भोंपू बनकर गुलामी कर रहे हैं ।
काफी हद तक मूल / वास्तविक पत्रकार भी अपनी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं जिनकी उदासीनता के चलते दलालों ने इस क्षेत्र को कब्जा लिया है । वाकई देहरादून में तो गजब का ही ट्रेंड चल पड़ा है पत्रकारिता का। राज्य सरकार को चाहिए कि वक़्त रहते इन्हें किनारे कर लिया जाए । सूचना विभाग में वेब पोर्टल उन्हीं के सूचीबद्ध किए जाएं जिनके पास कम से कम 15 साल पत्रकारिता का अनुभव हो अथवा पत्रकारिता की डिग्री हो। अगर समय रहते ऐसा न हुआ तो अगले एक साल में यह जमात दो हजार की पार हो जाएगी जो कि प्रदेश के लिए सिर दर्द बनेंगे । राज्य में अराजकता व दलाली के नए-नए अड्डे विकसित होंगे ।