रुला देगी आपको हंसी की कहानी !

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हरिद्वार में भीख मांग रही है कुमाऊं यूनिवर्सिटी में वाइस प्रेसीडेंट रह चुकी डबल एमए पास हंसी प्रहरी 

देवभूमि मीडिया ब्यूरो
जिसे शिक्षा का प्रहरी बनना था जिसके सपनों में उड़ान थी जिसने हज़ारों सपने अच्छी जिंदगी के देखे थे वही हंसी प्रहरी आज हरिद्वार की गलियों, घाटों और सड़कों पर भीख मांगकर अपने और अपने छह साल के बेटे की पेट की भूख को शांत करती नज़र आती है। यह वही लड़की है जिसकी हंसी और जिसके नाम के नारों से कुमाऊं यूनिवर्सिटी का कैंपस गूंजा करता था। उसमें इतनी प्रतिभा थी और वह इतनी विलक्षण थी कि वह वर्ष 1999 -2000 में छात्र संघ की उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ी और जीत भी गई थी। उसने राजनीति और इंग्लिश जैसे विषयों में एक बार नहीं दो बार एमए किया।
वह दौर था जब तब कैंपस में छात्र -छात्राओं के बीच होने वाली बहसें हंसी के बिना अधूरी होती थीं। हर किसी को इस बात का यकीन था कि हंसी जीवन में कुछ बड़ा करेगी। पर समय का पहिया किस तरफ घूमता है ये किसी को पता नहीं। जो लड़की कभी विवि की पहचान हुआ करती थी वह आज भीख मांगने के लिए मजबूर है। हरिद्वार की सड़कों, रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और गंगा के घाटों पर उसे भीख मांगते हुए देखने पर शायद ही कोई यकीन करे कि उसका अतीत कितना सुनहरा रहा होगा।
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के सोमेश्वर क्षेत्र के हवालबाग ब्लॉक के अंतर्गत गोविंन्दपुर के पास रणखिला गांव पड़ता है। इसी गांव में पली-बढ़ीं हंसी पांच भाई-बहनों में से सबसे बड़ी बेटी है। वह पूरे गांव में अपनी पढ़ाई को लेकर चर्चा में रहती थी। पिता छोटा-मोटा रोजगार करते थे। उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए दिन रात एक कर दिया था। गांव से छोटे से स्कूल से पास होकर हंसी कुमाऊं विश्वविद्यालय में एडमिशन लेने पहुंची तो परिजनों की उम्मीदें बढ़ गईं। हंसी पढ़ाई-लिखाई के साथ ही दूसरी एक्टिविटीज में बढ़-चढ़ कर भाग लेती थी। साल 1998-99 वह तब चर्चा में आई जब कुमाऊं विश्वविद्यालय में छात्र यूनियन की वाइस प्रेसिडेंट बनी।
हंसी के मुताबिक उन्होंने करीब चार साल विश्वविद्यालय में नौकरी की। उन्हें नौकरी इसलिए मिली क्योंकि वह विश्वविद्यालय में होने वाली तमाम एजुकेशन से संबंधित प्रतियोगिताओं में भाग लेती थी। चाहे वह डिबेट हो या कल्चर प्रोग्राम या दूसरे अन्य कार्यक्रम, वह सभी में प्रथम आया करती थी। इसके बाद उन्होंने 2008 तक कई प्राइवेट जॉब भी की। 2011 के बाद हंसी की जिंदगी अचानक से बदल गई। उन्होंने साफ-साफ कुछ भी बताने से तो इन्कार कर दिया। क्योंकि वह नहीं चाहती कि उनकी वजह से दो भाई और बाकी परिवार के सदस्यों पर किसी तरह का भी फर्क पड़े। हंसी ने बताया कि वह इस वक्त जिस तरह की जिंदगी जी रही हैं, वह शादी के बाद हुई आपसी विवाद का नतीजा है।
शादीशुदा जिंदगी में हुई उथल-पुथल के बाद हंसी कुछ समय तक अवसाद में रहीं और इसी बीच उनका धर्म की ओर झुकाव भी हो गया। परिवार से अलग होकर धर्मनगरी में बसने की सोची और हरिद्वार पहुंच गईं। तब से ही वो अपने परिवार से अलग हैं। वो बताती हैं कि इस दौरान उनकी शारीरिक स्थिति भी गड़बड़ रहने लगी और वह सक्षम नहीं रहीं कि कहीं नौकरी कर सकें। हालांकि अब उन्हें लगता है कि यदि उनका इलाज हो तो उनकी जिंदगी पटरी पर आ सकती है। वह दोबार से अपनी जिंदगी की शुरुआत कर सकती हैं।
हंसी ने बताया कि वह 2012 के बाद से ही हरिद्वार में भिक्षा मांग कर अपना और अपने छह साल के बच्चे का पालन-पोषण कर रही हैं। बेटी नानी के साथ रहती है और बेटा उनके साथ ही फुटपाथ पर जीवन बिता रहा है। फर्राटेदार इंग्लिश बोलने वाली हंसी जब भी समय होता है तो अपने बेटे को फुटपाथ पर ही बैठकर अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत और तमाम भाषाएं सिखाती हैं। इच्छा यही है कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर बेहतर जीवन जीएं। इतना ही नहीं, वह खुद कई बार मुख्यमंत्री को पत्र लिख चुकी हैं कि उनकी सहायता की जाए। कई बार सचिवालय विधानसभा में भी चक्कर काट चुकी हैं। इस बात के दस्तावेज भी हंसी के पास मौजूद हैं। वह कहती हैं कि अगर सरकार उनकी सहायता करती है तो आज भी वह बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकती हैं।
इनपुट हिमालयन न्यूज़ से भी साभार