गैरसैंण को लेकर जनता के भाग नहीं जगे….

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गैरसैंण में राजधानी की नींव का पत्थर 24 अप्रैल 1992 को ही गाढ़ दिया गया था

गैरसैंण राज्यों के पुनर्गठन के अवसरों की संभवतः इकलौती नजीर है जिसे जनता ने राज्य निर्माण से बहुत पहले ही कर दिया था राजधानी घोषित

व्योमेश जुगरान 
कहते हैं, उत्तराखंड के नक्शे पर मौजूद सीमान्त जिला चमोली की तहसील गैरसैंण उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी है। राज्यपाल बेबीरानी मौर्य ने 8 जून 2020 को इस आशय के विधेयक पर मुहर लगाई। उससे पहले 4 मार्च को गैरसैंण में विशेष ग्रीष्मकालीन सत्र के दौरान इस विधेयक को बाकायदा पारित किया गया। तब मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा था कि प्रदेश की जनभावना से जुड़ा इससे बड़ा कोई मसला नहीं है। बकौल रावत, ‘यह फैसला करते वक्त वह इतने भावुक थे कि रातभर सो नहीं सके और आंसू बहाते रहे…। सीएम का कहना था कि उन्होंने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाकर इसे राज्य आंदोलनकारियों और प्रदेश की माताओं व बहनों को समर्पित किया है।
सीएम जो कहा, उसका विश्लेषण राजनीतिक पैंतरेबाजी भी हो सकता है, मगर लोगों को जानना चाहिए कि गैरसैंण राज्यों के पुनर्गठन के अवसरों की संभवतः इकलौती नजीर है जिसे जनता ने राज्य निर्माण से बहुत पहले ही राजधानी घोषित कर दिया था। उत्तराखंड राज्य का गठन 8-9 नवम्बर 2000 को हुआ जबकि गैरसैंण में राजधानी की नींव का पत्थर 24 अप्रैल 1992 को ही गाढ़ दिया गया था। पर राज्य बनने के बाद अंतरिम सरकार खुद देहरादून में बैठी और स्थायी राजधानी के लिए आयोग बैठा दिया। फिर तो मसला इस कदर उलझा कि गैरसैंण का सपना पूरी तरह सरकारी कृपा पर आश्रित हो गया। जनदबाव के तोड़ के रूप में नेताओं और नौकरशाहों की यह चतुराई रही कि गैरसैंण की पतंग को उड़ते और कटते दिखाई देते रहो।
आज करीब 20 साल बाद भी गैरसैंण को लेकर जनता के भाग नहीं जगे। समय ने सिद्ध किया है कि त्रिवेन्द्र सरकार का निर्णय देहरादून को ही पूर्णकालीन राजधानी बनाने के इंतजाम के रूप में सामने है और राजधानी चयन के लिए 2001 में गठित दीक्षित आयोग का ही नया संस्करण है। वह आयोग आठ साल तक सरकारी खर्च पर सिर्फ मजे मारता रहा और अदालती हस्तक्षेप के बाद जब रिपोर्ट देने की बारी आई तो आनन-फानन में गैरसैंण पर नजला झाड़कर चलता बना। यह रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की जा सकी।
आन्दोलनकारी ताकतें मांग करती आई हैं कि सरकार गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित करे और एक तयशुदा समय-सीमा के साथ वहां इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हो। लेकिन ऐसा न कर सरकार का पूरा जोर ‘पूर्णकालीन देहरादून’ के ही प्रबंध में लगा हुआ है। सरकार ग्रीष्मकालीन राजधानी के किसी ठोस ब्लूप्रिंट के साथ सामने नहीं आ पाई है। उसके पास अभी तक भराड़ीसैंण में 36 एकड़ भूमि है। यहां करीब सवा सौ करोड़ की लागत से खड़े किए गए विधानभवन, विधायक आवास और आफिसर्स कॉलोनी के दरकते ढाचे हैं जिनका दम भरा जा रहा है। वहां मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर इस लायक नहीं है कि आवासीय सुविधा के लिहाज से उसका उपयोग किया जा सके। करीब 7000 फीट की ऊंचाई पर ‌स्थित भराड़ीसैंण में अब तक हुए नुमाइशी सत्रों के लिए हमेशा टेंट कॉलोनी खड़ी करनी पड़ी हैं।
जनता इन सत्रों को फिजूलखर्ची और माननीयों की ग्रीष्मकालीन पिकनिक मानती आई है। तो क्या कथित ग्रीष्मकालीन राजधानी की यही फजीहत होनी है! गर्मियों में अंग्रेज बहादुर की शिमला जिस प्रकार ‘छोटी बिलायत’ में बदल जाती थी, लगभग उसी तर्ज पर हमारे ‘काले साहब बहादुर’ गर्मियों में दो-चार दिन सैर-सपाटे के लिए गैरसैंण में जुट रहे हैं, सत्र-स़त्र खेल रहे हैं और जनता की गाढ़ी कमाई को हजम कर वापस अपने स्थायी ठिकानों में देहरादून लौटने वाले हैं।
गैरसैंण में कैबिनेट की नुमाइशी सत्र के क्या मायने हैं। क्या जनता में कोई जोश है? क्या सरकार यह भरोसा दे सकी है कि राजधानी के प्रश्न पर वह गंभीर है? गैरसैंण को गर्मियों की राजधानी कहकर महज राजनीतिक उल्लू साधा जा रहा है। राजनीतिक दलों के लिए गैरसैंण सियासी मसला बेशक हो, पर भावुक जनता के लिए यह राज्य के वजूद से जुड़े संघर्ष का महत्वपूर्ण मुकाम है। 9 नवंबर सन 2000 को अलग राज्य का सपना पूरा अवश्य हुआ लेकिन जनआंदोलन से राज्य हासिल करने के बाद जनता का सबसे गहरा और जज्बाती रिश्ता गैरसैंण को राजधानी बनाने की इच्छा से जुड़ा था।
गैरसैंण लोगों के लिए जमीन का टुकड़ा भर नहीं है। यहां की माटी में उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों के रक्त से लिखी इबारतें हैं। यह एक तासीर है जो इस राज्य की सांस्कृतिक और भावात्मक एकता को सेकती है। गैरसैंण का मुद्दा राज्य के सर्वांगीण विकास के सपने को एक आकार देता है और सबसे बढक़र यही वह धुरी है जहां से विकास की रोशनी राज्य के हर कोने तक फैलाई जा सकती है।
स्वप्रद्रष्टा वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली ने गैरसैंण को यूं ही नहीं अपनाया था। मगर देहरादून में बैठे उत्तराखंड के नीति नियंता गैरसैंण की अवधारणा और जनाकांक्षा के अंतरसंबंध को समझने में नाकाम रहे हैं। सरकार के निर्णय पर ताली पीटने वाले यह जरूर सोचें कि यह राज्य शहादती जनांदोलन से हासिल हुआ है। गैरसैंण को पूर्णकालीन राजधानी बनाने का जनमत कभी का जुटाया जा चुका है। सरकार जितना जल्द हो, इस पर मुहर लगाए।