राजनैतिक अवहेलना और लापरवाही का खामियाजा भुगत रहा है पहाड़

भाग्यविधाता फौरी तौर पर संवेदना, शोक व्यक्त करके और चन्द सिक्कों की भीख रूपी मुआवजे का ऐलान करके अपनी जिम्मेदारी से पा लेते हैं मोक्ष

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जनमानस भी चन्द दिनों की चर्चा और दुख जताने के बाद फिर से पकड़ लेता है अपनी रफ्तार 

फिर नये हादसे के बाद वही प्रक्रिया दोहराई जाती है और फिर जैसे थे वैसे ही सब चलता रहता है

 

दिनेश ध्यानी

उत्तराखण्ड के पर्वतीय जिलों में आये दिन हो रहे सड़क हादसों की कतार लम्बी होती जा रही है। हमारे भाग्यविधाता फौरी तौर पर संवेदना, शोक व्यक्त करके और चन्द सिक्कों की भीख रूपी मुआवजे का ऐलान करके अपनी जिम्मेदारी से मोक्ष पा लेते हैं। जनमानस भी चन्द दिनों की चर्चा और दुख जताने के बाद फिर से अपनी रफ्तार पकड़ लेता है। फिर नये हादसे के बाद वही प्रक्रिया दोहराई जाती है और फिर जैसे थे वैसे ही सब चलता रहता है। यही सब तब भी जारी था जब हम उत्तर प्रदेश के हिस्सा थे और अब भी वही प्रक्रिया जारी है बल्कि सच कहें तो अब हालात और बदतर हो गये हैं। 

हाल ही में टिहरी गढ़वाल में स्कूल वैन हादसे के बाद भी कुछ नही बदला है। बदला है तो उन परिवारों का हाल जो कल तक खुशहाल थे अपनों के साथ लेकिन अब जिन्दगीभर के लिए दुखों का पहाड़ टूट गया है उन पर। कई परिवारों के तो इकलोते चिराग बुझ गये हैं। सोचकर भी कंपकपी छूट जाती है कि एक ही गांव के नौ-नौ बच्चे अचानक काल के गाल में समा गये हैं। सोचकर भी अजीब सा लगता है। लेकिन इस हादसे से भी किसी ने क्या सबक लिया होगा? हमें तो नहीं लगता। 

आप लोगों को जिला पौड़ी गढ़वाल के नैनीडांडा विकास खण्ड के धुमाकोट-भौन मोटर मार्ग पर एक साल पहले का हादसा याद होगा? जिसमें चार दर्जन से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई। परिवार के परिवार बर्वाद हो गये थे। हमारे प्रिय मुख्यमंत्री महोदय तब धुमाकोट गये थे। जिस परिवार के नौ सदस्य एक साथ काल के गाल में समा गये थे उनके परिवार की एक बेटी ने जब महोदय के समक्ष अपना रोष व्यक्त किया और उनको खरीखोटी सुनाई तो महोदय आदतन हालात को न समझते हुए तैश में आ गये और सुनने में तो यहां तक आया कि तब उन्हौंने उस बेटी को पकड़ने के लिए पुलिस को फरमान जारी कर दिया था। स्थानीय जनता में तब काफी गुस्सा था। इस बावत मुस्याखांद में बैठक भी हुई थी। धुमाकोट-भौन मोटर मार्ग आज भी जस का तस है। अगर किसी को विश्वास नही तो जाकर देख लो। हां हाल ही में जेसीबी मशीन से कहीं-कहीं पर सड़क को चैड़ा किया जा रहा है लेकिन जिस प्रकार से सड़क पर काम होना था ताकि आने वाले कल में हादसे न हों तो वह कहीं दिख नही रहा है। तो पहाड़ के अन्य क्षेत्रों की भी हालात कमोवेश ऐसे ही होंगे।

अब आते हैं सड़कों के फैलते हुए जाल की तरफ।जब किसी भी क्षेत्र या गांव में सड़क जाती है तो पहले तो गांव वाले सीधे अपने खेत देने से मना कर देते हैं। उसके बाद सरकारी इन्जीनियर और कुछ स्थानीय नेता, दुकानदार इस विरोध की आड़ लेकर सड़क की पैमाईश में ही काफी झोळ कर देते हैं। मसलन जिस प्रकार से सड़क बननी चाहिए थी कितने बैंड़ हों ताकि आने वाले कल में हादसे न हों और सड़क कहां-कहां से जायेगी इसमें स्थानीय चकडै़त अधिकांश अपना फायदा देखते हैं। जैसे मेरे खेत कम से कम कटें, हमारे दुकान और घर के पास सड़क आये। दूसरे गांव वालों को इस सड़क का फायदा न हो नहीं वहां भी बाजार बन जायेगा और हमारी दुकानदारी बंद हो जायेगी। ये सब बाते हवा हवाई नही की जा रही है। अगर सच न लगे तो हम मौकाए वारदात भी दिखा सकते हैं कि कहां-कहां ऐसा हुआ है। लेकिन सड़क बन भी जाती है और पास भी हो जाती है। सड़क की चैड़ाई कितनी होनी चाहिए इसमें भी झोळ होते हैं और सड़क के पुस्ते और दीवार कैसी हो और कितनी बड़ी हो इन सब में भी बहुत ही लापरवाही बरती जाती है। क्यों कि सड़क टूटती भी है और कटाव भी होता है इस सबका फायदा ठेकेदार और गलादार सब उठाते हैं। इस सबका किसी न किसी रूप में नुकसान लोगों को उठाना पड़ता है। क्योंकि पहाड़ को कोई माई बाप नही है इसलिए जो चल रहा है चलने दो हमारा क्या जाता है ऐसी सोच ने राज्य बनने के बाद पहाड़ और मैदान की दूरी बढ़ा दी और पहाड़ को और बेगाना बना दिया।

अब आते हैं पहाड़ में चल रहे वाहनों की दशा और दिशा पर। रामनगर से गढ़वाल मोटर यूजर्स और कुमायूं मोटर यूजर्स की बसे चलती हैं। कभी फुरसत मिले तो इन बसों की हालात देखना। इनके कार्यालय देखना किस हालात में ये लोग बसों को आॅपरेट करते हैं। न चालक उप चालाक के लिए रहने की व्यवस्था न खाने पीने की व्यवस्था। बसों की हालत ये कि अधिसंख्य बसों को धकिया-धकियाकर चलाना पड़ता है। क्या सरकार और हमारे नीतिनियंता ये सब नही देखते? क्या इन संस्थानों को चलाने के लिए सरकार को कुछ उपाय नही करने चाहिए? क्या बस चालक और सवारियों को उचित परिवहन व्यवस्था नहीं मिलनी चाहिए? अगर हां तो फिर क्यों नही उचित परिचालन होता। रामनगर हो या कोटद्वार या ऋर्षिकेश कहीं से भी पहाड़ के उचित बसें नही हैं और यात्रा सीजन में ये बसें भी चारधाम यात्रा में लगा दी जाती हैं जिससे यात्रियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

प्राइवेट टैक्सी चालक और मालिक कम समय में अधिक मुनाफे के चक्कर में अधिक सवारियां उठाते हैं। अधिक चक्कर के चक्कर में तेजी से और नियम के खिलाफ अपनी गाड़ियों को दौड़ाते हैं। क्या ये सब बातें हमारे प्रशासन को पता नही हैं? सबको पता है लेकिन कोई भी जेहमत नही उठाना चाहता और इस सबका ही खामियाजा है कि एक पल में टिहरी में एक ही गांव के नौ-नौ बच्चे काल के गाल में समा जाते हैं लेकिन किसी को भी इस सड़ी-गली व्यवस्था को बदलने का अहसास नही होता।

हमारी सरकार चारधाम यात्रा को पूरे साल संचालित करने के लिए आॅलवेदर रोड़ को निर्माण करवा रही है। सुना है सड़के चैड़ी हो रही हैं। अपने केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्री रहते हुए मेजर जनरल श्री भुवनचन्द खण्डूडी जी ने उत्तराखण्ड में सड़कों को चैडा करने का अभूतपूर्व कार्य किया था लेकिन वह चन्द क्षेत्रों में ही हो पाया। श्री खण्डूडी जी ने अवैध और गलत परिचालन को नियंत्रित करने के लिए अपने मुख्यमंत्रीत्व काल में काफी प्रयास किया था लेकिन उनके हटते ही फिर जस का तस हो गया । 

यही बात उत्तराखण्ड में बढ़ रहे अपराध एवं अन्य अनैतिक गतिविधियों का भी है। सुदूर गांवों में भी अब महिलाओें और बच्चों के प्रति योनशोषण के अपराध बढ़ रहे हैं। उत्तरकाशी की एक बिटिया की यौन हिसां के बाद नृसंश हत्या हो या कल परसों की कोटद्वार में एक दस वर्षीय बच्ची को अगवा करके उसके साथ जघन्य यौन अपराध के बाद उसके टुकड़े-टुकड़े करने का सनसनीखेज मामला हो सब इंसानियत को शर्मसार कर रहे हैं। सुदूर पहाड़ से बहला फुसलाकर बच्चियों एवं महिलाओं को भगाने का प्रचलन को दशकों पुराना है। लेकिर न जनता जागरूक हो पाई न सरकार और प्रशासन ने इस बावत कोई ठोस कदम उठाये। बल्कि अपने वोट बैंक के लिए कुछ नेताओं से पहाड़ के आबौहवा को खराब करने का काम किया है। देश में कोई भी कहीं जा सकता है रह सकता है लेकिन जब कोई व्यक्ति शाजिसन अपराध के लिए कहीं घुसपैठ करते हैं और सामुहिक रूप से अपरध करते हैं तो यह समाज के लिए अधिक हानिकारक है।

पहाड़ से बढ़ता पलायन और सामाजिक असन्तुलन के कारण यहां का सामाजिक परिवेश और सांस्कृतिक वातावरण काफी खराब हो रहा है। लेकिन जनता से लेकर शासन प्रशासन सब अपने में मस्त हैं। न कोई पूछने वाला न कोई टोकने वाला। सामाजिक संगठनों के हाल ये हैं कि दिल्ली वाले दिल्ली में सेमिनार करके गांव बचाने की बात करते हैं, पलायन रोकने की बात करते हैं लेकिन इनमें से अधिसंख्य जो सेवा से रिटायर हो चुके हैं वे भी अपने गांव नही आना चाहते लेकिन भाषण सुनो तो लगता है पहाड़ के पलायन रोकने के लिए इनके प्रयास ही फलीभूत होंगे। और सरकार की योजनाओं को लाभ भी वही लोग उठा रहे हैं जिनके पहुंच या तो सत्ता के गलियारों में है या वे किसी भी योजना के लिए अनैतिक धनखर्च कर सकते हैं। लेकिन आम आदमी तब भी ठगा और आज भी ठगा हुआ ही है।

अपने नीतिनियंताओं और भाग्य विधाताओं से अनुरोध है कि अब तो कम से कम पहाड़ की सड़कों का और वहां की लचर परिवहन व्यवस्था को सुधारने के लिए कुछ सार्थक और नीतिगत प्रयास कीजिए। आखिर कब तक आप लोग आंखे  मूंदे रहोगे और कब तक पहाड़ की जनता यों ही अपने प्राणों की आहुति देती रहेगी? कम से कम अब तो कुछ कीजिए। माना कि आप लोग और आपके परिजन सभी शहरो में निवास करते हैं लेकिन आपकी कुर्सी और सत्ता को कायम रखने के लिए पहाड़ के निरीह जनता ने भी वोट दिया है। इसलिए कम से कम अब तो इस दिशा में कुछ नीतिगत प्रयास हों ताकि कल किसी गांव के अबोध बच्चों को, निर्दाेष लोगों को अपनी जान न गंवानी पड़े।