• कम्प्यूटर विज्ञान को विषय के रूप में मिले मान्यता
  • कम्प्यूटर अध्यापकों के अभाव में स्कूलों में  धूल फांक रहे हैं कम्प्यूटर

डॉ. पुनीत चन्द्र वर्मा

जैसा कि सर्व विधित है कि आज का युग Computer युग है , कोई भी कार्य बगैर Computer के सोचना और करना असंभव है , भारत डिजिटल इंडिया की ओर अग्रसर है , करोडो रूपये इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के लिए डिजिटल इंडिया कार्यक्रम में पानी की तरह बहाए जा रहे हैं , भारत के अधिकतर वे राज्य जो विकसित राज्यों की कतार में आते हैं , वहां ना केवल Computer Infrastructure पर बल दिया गया है अपितु Computer एजुकेशन को भी सरकारी हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट स्तर से लेकर स्नातक और परास्नातक स्तर तक विस्तारित किया गया है. 

गुजरात , राजस्थान , मध्य प्रदेश , पंजाब, नई दिल्ली , महाराष्ट्र , तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश जैसे राज्य विकाशशील से विकसित ही इस कारण हो पाए क्यूंकि इन राज्यों ने Computer  को न केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर स्तर से प्रारंभ किया अपितु Computer को एक विषय के तौर पर सरकारी  हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट स्तर से लेकर स्नातक और परास्नातक स्तर तक लागू किया है. मेरा राज्य उत्तराखंड जिसको बनाये हुए 18 वर्ष से ज्यादा हो गया है , लेकिन अभी भी जो विकाशशील की श्रेणी में ही आता है , उत्तराखंड राज्य के विकाशशील की श्रेणी में रहने का एक प्रमुख कारण यह भी है कि उत्तराखंड में योग , उर्दू , संस्कृत , गृह विज्ञान , शारीरिक शिक्षा , पुस्तक कला आदि आदि कई विषयों को तो हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट स्तर से लेकर स्नातक और परास्नातक स्तर तक लागू किया गया है किन्तु आधुनिकता का ब्रह्मास्थ Computer विज्ञान को अभी तक भी एक विषय के तौर पर सरकारी प्राइमरी , जूनियर, सेकेंडरी , हाई स्कूल , इंटरमीडिएट , स्नातक , परास्नातक स्तर पर लागू नहीं किया गया है.

भारत के अधिकतर विकसित एवं विकासशील, केंद्र शाषित राज्यों लगभग २४ राज्यों (गुजरात / राजस्थान / मध्य प्रदेश / हरियाणा / आन्ध्र प्रदेश / केरल / उत्तर प्रदेश/ पणजी/ अंडमान निकोबार / चंडीगड़/ गोवा / नई दिल्ली / नार्थ ईस्ट के सभी 7  हिमालयी राज्य आदि ) में Computer Science अनिवार्य/नियमित विषय के रूप में स्थापित है किन्तु 18 वर्ष बीत जाने के उपरांत भी उत्तराखंड  में इस विषय को अनिवार्य/नियमित विषय के रूप में मान्यता नहीं दी गई है.ऐसा भेदभाव उत्तराखंड से क्यूँ हो रहा है ?

जब उत्तराखण्ड राज्य के सरकारी विद्यालयां में संस्कृत, उर्दू, योग, शारीरिक शिक्षा, गृह विज्ञान आदि विषयों को अनिवार्य विषय के रूप में मान्यता दी गयी है, वहीं अत्याधुनिक महत्वपूर्ण विषय कम्प्यूटर विज्ञान को कोई भी स्थान नहीं दिया गया है। ऐसा क्यों ? उत्तराखण्ड के सरकारी विद्यालयों  में हाईस्कूल-इण्टरमीडिएट स्तर में कम्प्यूटर विज्ञान को नियमित एवं अनिवार्य विषय के रूप में स्थापित किया जाए तो सरकारी विद्यालयां में  लगातार कम हो रही छात्र संख्या स्वतः ही बढ़ जायेगी, गरीब-मध्यम वर्ग के परिवारों के छात्र-छात्रएं भी सरकारी विद्यालयों  में निःशुल्क कम्प्यूटर शिक्षा के लिए अवश्य आयेगें। हाईस्कूल एंव इण्टरमीडिएट में कम्प्यूटर विज्ञान को विषय के रूप में मान्यता प्रदान की जाए तथा कम्प्यूटर विज्ञान विषय का पाठ्यक्रम निर्धारित किया जाए। उत्तराखण्ड के समस्त विकासखंडों में स्थित हाईस्कूल एंव इण्टरमीडिएट के विद्यालयों में कम्प्यूटर विज्ञान की सुसज्जित प्रयोगशाला अत्याधुनिक उपकरणों के साथ है किन्तु योग्य कम्प्यूटर स्नातक-परास्नातक अध्यापकों के अभाव के कारण समस्त कम्प्यूटर धूल फांक रहे हैं या खराब हो चुके हैं। कम्प्यूटर के स्नातक, कम्प्यूटर विज्ञान विषय के अलावा हाईस्कूल कक्षाओं को अंग्रेजी एवं गणित विषय पढ़ाने में सक्षम होते हैं, जिसमें कि उत्तराखण्ड के सुदूर स्थित विद्यालयां में उपरोक्त विषयों  के अध्यापकों की कमी की पूर्ति की जा सकती है।

राज्य के विभिन्न विभागों में कार्यरत कर्मचारियां/अधिकारियां को समय-समय पर कम्प्यूटर प्रशिक्षण देने में वाह्य एजेसिंयां को सरकारी व्यय पर हायर (Hire) किया जाता है, जबकि यही कार्य स्थायी कम्प्यूटर अध्यापकों  से निःशुल्क लिया जा सकेगा। वर्तमान समय में Physics/ Chemistry/ Mathematics वाले अध्यापकों को एक आध माह का कम्प्यूटर प्रशिक्षण देकर सरकारी धन का दुरपयोग किया जा रहा है, जिससे कि न तो वह अध्यापक अपने मूल विषय को ही पढ़ा पा रहा है तथा न ही कम्प्यूटर पढ़ाने की उसमें योग्यता आ पाती है, जिससे विद्यार्थियां का नुकसान हो रहा है, जबकि उत्तराखण्ड में लाखों कम्प्यूटर स्नातक-परास्नातक आदि नवयुवक बेरोजगार घूम रहे हैं। योग्य प्रशिक्षण कम्प्यूटर अध्यापकों की स्थायी नियुक्ति न होने के कारण वर्ष 2015 के मूल्यांकन में देखा गया कि इन्फारमेशन टेक्नोलाजी की 3000 कापियां को भौतिक विज्ञान के अध्यापकों  के द्वारा मूल्यांकित कराया गया, जबकि Education manual के नियमानुसार हाईस्कूल-इण्टरमीडिण्ट की कापियां को उसी विषय का स्नातक-परास्नातक स्थायी अध्यापक ही जांचने के लिए सक्षम माना जाता है। हम समस्त नवयुवकों की समझ में यह नहीं आ रही है कि सरकारी अध्यापकों की सेवानिवृत्त की उम्र 58 से 60 एंव 60 से 65 तथा यहां तक कि 70 वर्ष तक काम करने की छूट दी जा रही है, दूसरी तरफ हम नवयुवकों ने लाखों रूपये कर्ज लेकर कम्प्यूटर की डिग्रीयां प्राप्त की है और हमारे लिए सरकारी स्तर पर खासकर विद्यालयां में कम्प्यूटर के पद सृजित नहीं किये जा रहे हैं, फलतः हम बेरोजगार हैं तथा हमारे अभिभावक भी इससे असन्तुष्ट हो रहे हैं। एक तरफ उत्तराखण्ड सरकार पिछले 18 वर्षां से कह रही है कि ”उत्तराखण्ड का पानी तथा उत्तराखण्ड की जवानी” उत्तराखण्ड के काम नहीं आ रहा है तथा उत्तराखण्ड में पलायन लगातार जारी है तथा दूसरी तरफ योग्य कम्प्यूटर प्रशिक्षित बेरोजगार नवयुवकों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं कर रही है।

 अगर कंप्यूटर विज्ञान विषय को हाई स्कूल एवं इंटरमीडिएट स्तर पर अनिवार्य विषय के रूप में मान्यता दी जाती है तो, भारत के यशस्वी प्रधानमन्त्री माननीय श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी के ड्रीम प्रोजेक्ट “डिजिटल इंडिया” को भी बहुत ज्यादा गहराई से मजबूती मिलेगी. आप इस गम्भीर विषय को संज्ञान में लेते हुए द्रुत गति से उत्तराखंड के सरकारी हाईस्कूल/इंटरमीडिएट कॉलेजों में Computer Science विषय को अनिवार्य/नियमित विषय के रूप में स्थापित करेंगें एवं स्थाई पदों के पद सृजित करेंगें, जिससे उत्तराखंड में लगातार बढ़ रहा पलायन रुकेगा और उत्तराखंड के पानी के साथ-साथ  उत्तराखंड की जवानी भी उत्तराखंड के विकास में उत्तराखंड को सहयोग कर सके, तभी सच्चे शब्दों में हो पायेगा सबका साथ, सबका विकास।

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