श्वास नली में गांठ बनने के कारण बुजुर्ग की आ गई थी सांसे थमने की स्थिति 

पल्मोनरी मेडिसिन विभाग को कराए जाएंगे हाईटेक मशीनें व अन्य जरुरी संसाधन  उपलब्ध : निदेशक 

देवभूमि मीडिया ब्यूरो 

ऋषिकेश : AIIMS अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश में पल्मोनरी विभाग के चिकित्सकों ने एक बुजुर्ग की सांस नली में बनी गांठ का सफल उपचार किया है। श्वास नली में गांठ बनने के कारण जिस बुजुर्ग की सांसे थमने की स्थिति में आ गई थी, चिकित्सकों के अथक प्रयास से उसे नया जीवन मिल गया है। उन्होंने मरीज का जीवन बचाने के लिए रिजिड ब्रोंकोस्कोपी तकनीक के इस्तेमाल से जटिल और असाध्य स्थिति के रोग को साध्य कर दिखाया है। 

लगभग छह-सात महीने से कफ में खून आने की तकलीफ से परेशान 63 वर्षीय बुजुर्ग अपनी अपनी बीमारी से काफी परेशान थे। मगर विभिन्न स्थानों में उपचार कराने से भी उन्हें कोई लाभ नहीं मिला। देहरादून निवासी इस बुजुर्ग की श्वास नली में गांठ बन गई थी, जिसने घाव का रूप ले लिया था। थक हारकर एम्स में उपचार कराने पहुंचे मरीज का चिकित्सकों ने छाती का सीटी स्कैन कराया, तो पता चला कि उनकी श्वास नली में लगभग 6 वर्ग सेमी की एक गांठ बन चुकी है।                         

बायोप्सी रिपोर्ट में गांठ का साइज बड़ा होने की वजह से देहरादून के सभी अस्पतालों ने मरीज की गंभीर और जटिल स्थिति को देखकर उनका उपचार करने से इनकार कर दिया। अंतिम उम्मीद लेकर एम्स ऋषिकेश पहुंचे मरीज के उपचार के लिए चिकित्सकों ने जोखिम उठाया। चूंकि मुख्य श्वास नली में इस तरह की गांठ को निकालने या बायोप्सी लेने से गांठ से खून बहने का बहुत अधिक खतरा रहता है। यहां तक कि जरा सी लापरवाही होने पर मरीज की जान भी जा सकती है। 

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर रवि कांत जी ने बताया कि पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञ चिकित्सकों डा. गिरीश सिंधवानी व डा. मयंक मिश्रा ने फ्लैक्सीबल ब्रोंकोस्कोपी तकनीक का उपयोग कर मरीज की श्वांस नली में बनी गांठ को सफलता पूर्वक निकाल लिया, जिसके बाद से मरीज को कफ में खून आने की तकलीफ से आराम है। अब गांठ की जांच की रिपोर्ट के अनुसार मरीज का आगे का इलाज किया जा सकेगा। उन्होंने बताया कि लगभग सभी तरह के जटिल रोगों के निदान के लिए एम्स में संस्थान में सभी तरह की अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।   

निदेशक एम्स पद्मश्री प्रो. रवि कांत जी ने बताया कि पल्मोनरी मेडिसिन विभाग को निकट भविष्य में और हाईटेक मशीनें व अन्य जरुरी संसाधन  उपलब्ध कराए जाएंगे। जिससे राज्य के श्वांस रोग से ग्रसित मरीजों को किसी भी तरह की जांच व उपचार के लिए उत्तराखंड से बाहर के अस्पतालों में नहीं जाना पड़े। 

विभागाध्यक्ष डा. गिरीश सिंधवानी ने बताया की पल्मोनरी मेडिसिन विभाग में हररोज दूसरे अस्पतालों से सांस संंबंधी रोगों से ग्रसित मरीज रेफर होकर आ रहे हैं। जिनकी जांच व उपचार की सुविधा कहीं और उपलब्ध नहीं है। उन्होंने बताया कि संस्थान के निदेशक पद्मश्री प्रो. रवि कांत जी के प्रयासों से एम्स ऋषिकेश में एंडोब्रोन्कियल अल्ट्रासाउंड, रिजिड ब्रोंकोस्कोपी, एलेक्ट्रोकॉटरी, आर्गन प्लाज्मा कोएगुलशन, स्टेंटिंग एवं क्रायोथेरेपी जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से ऐसे जटिल मरीजों का उपचार संभव है।