• नए जिलों के गठन पर सूबे में एक बार फिर राजनीति गर्मायी!

देहरादून: त्रिवेंद्र सरकार ने एक साल पूरा होने पर जिस तरह चार नए जिलों  के गठन की बात कही है, उसके बाद अब इस बात की संभावना अब बलवती हो गयी है कि वर्तमान में 13  जिलों वाले राज्य में 17 जिले हो जायेंगे । वहीँ  विधानसभा सत्र के दौरान आखिरी दिन जिस तरह से प्रदेश सरकार द्वारा चार नए जिलों के गठन की मंशा स्पष्ट किए जाने के बाद चार नए जिलों का मसला एक बार फिर गर्माने के आसार बन गए हैं। हालांकि, पिछले दो विधानसभा चुनावों के दौरान नए जिलों की घोषणाओं को केवल मतदाताओं को लुभाने  के मुद्दे के तौर पर ही देखा गया था।  

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड के अस्तित्व में आने के बाद से ही नए जिलों के गठन की मांग उठती रही है, लेकिन इस मांग ने वर्ष 2011 में तत्कालीन भाजपा सरकार के दौरान जोर पकड़ा था।  उस समय सूबे के मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने स्वतंत्रता दिवस पर राज्य में चार नए जिलों के गठन की सार्वजनिक घोषणा की थी।उस दौरान घोषित किये गए जिलों में कोटद्वार (पौड़ी गढ़वाल), यमुनोत्री (उत्तरकाशी), रानीखेत (अल्मोड़ा) और डीडीहाट (पिथौरागढ़) थे । वहीँ ”निशंक” शासन काल में नए जिलों के गठन का शासनादेश जारी होने से पहले ही मुख्यमंत्री पद से निशंक की विदाई हो गई थी और उनकी स्थान पर भुवन चंद्र खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बनाया गया था । हालाँकि भुवन चन्द्र खंडूड़ी सरकार ने आठ दिसंबर 2011 को जिलों संबधी शासनादेश जारी तो किया लेकिन विधानसभा चुनाव के कारण जिलों का यह मामला एक बार फिर ठन्डे बस्ते में चला गया ।

वहीँ वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सत्ता से बेदखल होते ही कांग्रेस ने इन नए जिलों का मसला राजनीतिक नफ़ा-नुकसान देखते हुए एक बार फिर छोड़ दिया। कांग्रेस को ख़तरा था कि यदि उसने यह मांग मान ली तो इसका फायदा भाजपा हो सकता है। वहीँ कांग्रेस ने नए जिलों समेत तमाम नई प्रशासनिक इकाइयों के गठन के उद्देश्य को अध्यक्ष राजस्व परिषद की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पुनर्गठन आयोग बनाकर यह मसला उसके सुपुर्द कर दिया गया। हालाँकि उस समय कांग्रेस द्वारा यह प्रचारित किया गया कि नए जिलों के मुख्यालय, सीमाओं के चिह्नांकन और जिलों में सम्मिलित किए जाने वाले क्षेत्रों को लेकर विवाद को देखते हुए यह कदम उठाया गया है।

वहीँ जब पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान जब वर्ष 2014 में नेतृत्व परिवर्तन के बाद हरीश रावत ने मुख्यमंत्री का पद संभाला तो उन्होंने नए जिलों के गठन में खासी रुचि प्रदर्शित की। रावत ने तो चार नए जिलों के स्थान पर आठ नए जिलों के गठन तक की बात कही। यह बात दीगर है कि रावत के मुख्यमंत्रित्वकाल में भी नए जिले धरातल पर नहीं उतर पाए। महत्वपूर्ण बात यह कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों ने ही विधानसभा चुनाव में नए जिलों के गठन को मुद्दा बनाकर इस्तेमाल किया लेकिन दोनों पार्टियों की सरकारों के दौरान पिछले सात सालों से नए जिले जमीन पर उतरने की बजाए फाइलों में ही कैद होकर रह गए।

वहीँ अब मौजूदा त्रिवेन्द्र सरकार ने संकेत दिए हैं कि जल्द ही चार नए जिले कोटद्वार, यमुनोत्री, रानीखेत और डीडीहाट अस्तित्व में आएंगे। मुख्यमंत्री ने गैरसैंण में बजट सत्र के अंतिम दिन एक सवाल के जवाब में यह जानकारी दी। सरकार ने कहा कि नए जिलों के गठन के संबंध में पुनर्गठन को प्राथमिकता प्रदान करते हुए पिछले साल चार जनवरी को राज्य सरकार ने एक हजार करोड़ की धनराशि का कार्पस फंड स्थापित किया। सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि चारों जिलों पर फैसला पुनर्गठन आयोग की संस्तुति मिलने पर लिया जाएगा। यानि कोटद्वार, यमुनोत्री, रानीखेत और डीडीहाट को सूबे के नए जिलों में जल्द ही स्थान  मिल सकता है। 

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