देवभूमि मीडिया ब्यूरो 

देहरादून। पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल महाराज और मुख्यमंत्री पद के बीच उनके अपने पुराने साथी ही रोड़ा बने। यही नहीं, सूबे के कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों ने भी उन्हें भाजपा में नया बताते हुए उनके नाम का विरोध किया। यही कारण भी रहा कि मुख्यमंत्री पद की दौड़ में अच्छी शुरुआत के बावजूद वे अंतिम समय में पिछड़ गए।

विधानसभा चुनाव में चौबट्टाखाल से चुनाव जीतने वाले सतपाल महाराज को मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदारों में से एक माना जा रहा था। यही कारण भी था कि वे चुनाव जीतने के बाद तुरंत दिल्ली पहुंच गए थे। शुरुआती दौर में उनका नाम काफी तेजी से उछला भी था। बावजूद इसके वे मुख्यमंत्री पद की दौड़ में पिछड़ते चले गए। इसका मुख्य कारण उनका भाजपा में नया होना बताया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी, भुवन चंद्र खंडूड़ी और रमेश पोखरियाल निशंक में से दो ने यही कारण गिनाते हुए उनके नाम पर आपत्ति जताई। साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के नेतृत्व में भाजपा में शामिल होने वाले पूर्व कांग्रेसियों ने तो उनके खिलाफ मोर्चा तक खोल दिया था। माना यह भी जा रहा है कि मोदी मैजिक के दौरान जहां अधिकांश विधायक बंपर मतों से जीते वहीं महाराज की जीत का अंतर बहुत अधिक नहीं था। इसके अलावा चौबट्टाखाल जैसी सुरक्षित सीट पर दांव खेलना भी उनके पक्ष में नहीं गया।

पहले भाजपा उन्हें बदरीनाथ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाने के पक्ष में थी लेकिन महाराज ने चौबट्टाखाल की सुरक्षित सीट चुनीं। बदरीनाथ से चुनाव लडऩा मोदी की आक्रमक नीति का हिस्सा होती लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। माना जा रहा है कि यही तमाम कारण सतपाल महाराज के खिलाफ गए। मुख्यमंत्री का दावेदार होने के बावजूद रेस में पिछडऩा इस बात को भी साबित करता है कि महाराज को अभी खुद को भाजपा में साबित करने की चुनौती है।

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