“भारतीय संस्कृति की आत्मा ‘उत्तराखण्ड‘ की जनांकांक्षाओं को साकार कराना तो रहा दूर समझ तक नहीं पाया संघ, सत्तासीन हुए स्वयंसेवकों से जनांकांक्षाओं को साकार करने का सीख कब सिखायेगा संघ”

देव सिंह रावत 

इसी सप्ताह भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक होने की हुंकार भरने वाले राष्ट्रीय  स्वयं सेवक संघ ने उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र के आवास में सरकार के अब तक के कार्यकाल की समीक्षा करते हुए अपनी सरकार कांवड यात्रा के लिए वैष्णो देवी प्रबंध न्याय की तरह बनाने आदि पर विशेष जोर दिया। परन्तु संघ के इन ध्वजवाहकों ने अपने स्वयं सेवक की सरकार से जिस प्रदेश में यह सरकार आसीन है उस उत्तराखण्ड की जनता की राज्य गठन प्रमुख जनांकांक्षाओं (राजधानी गैरसैंण, मुजफ्फरनगर काण्ड-94 के गुनाहगारों को सजा देना, हिमालयी राज्यों की तरह उत्तराखण्ड में भू कानूनों को लागू करना, देवभूमि को शराब, माफिया, भ्रष्टाचार व दुराचारियों से मुक्त कर हिमाचल की तरह विकासोनुमुख सुशासन ) स्थापित करने को अपनी सरकार से पूरा कराने को कहने का नैतिक बल तक नहीं रहा।

खासकर उस उत्तराखण्ड को संघ का राजनैतिक संगठन भाजपा सहित पूरा संघ परिवार के संगठन देवभूमि कह कर पुकारता है। उस उत्तराखण्ड को जो युगों से इस सृष्टि का समाधान खण्ड है। सदियों से देव, मुनि, मनीशियों की ही नहीं स्वयं साक्षात नारायण व शिव का जीवंत धाम है, जहां पतित पावनी गंगा यमुना का अवतरण धाम है। उस भारतीय संस्कृति की आत्मा के रूप में विख्यात उत्तराखण्ड में रहने वाले भारतीय संस्कृति के ध्वहवाहकों की जनांकांक्षाओं की उपेक्षा कर संघ व उसकी सरकारें प्रदेश के साथ भारत के कौन से हितों की रक्षा कर पायेगी?

संघ व उसके  राजनैतिक संगठन भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तराखण्ड भारतीय संस्कृति की आत्मा कही जाती है। शताब्दियों पहले आततायियों के दमन के बाद भारतीय संस्कृति की ही रक्षा करने के लिए देश के भारतीय संस्कृति के समर्पित ध्वजवाहक ही उत्तराखण्ड की विकट व दुर्गम घाटियों में तपोभूमि को में ही बस कर भारतीय संस्कृति को जीवंत बनाये रखा। जब उप्र की जातिवादी व लूख खसोट की सरकारों के दमन से अपने संम्मान, संस्कृति व सम्मान के साथ हक हकूकों की रक्षा के लिए ही अलग राज्य उत्तराखण्ड की स्थापना की आंदोलन छेड़ा गया। जिसके मर्म को भी समय पर संघ व उसका परिवार समझ नहीं पाया। जब समझा वह भी आधा अधूरा।

सदियों से भारतीय संस्कृति व अखण्डता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले उत्तराखण्डियों की देश भक्ति पर प्रश्न  उठाते हुए उत्तराखण्ड नाम को अलगाववाद का प्रतीक बताने की धृष्ठता करने से नहीं चूके। उसके बाद जब राज्य बना तो उसकी भौगोलिक सीमाओं का विस्तार कर, प्रदेश में जनसंख्या पर आधारित विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन करा कर, भ्रष्ट नौकरशाहों, नेताओं को संरक्षण देकर कांग्रेस की तरह ही देश के लिए हिमाचल की तरह विकास की कूचाल भर सकने वाला उत्तराखण्ड को पतन के गर्त में धकेल कर बांधों, बाघों व माफियाओं का अभ्याहरण बन गया है।

जनांकांक्षाओं को साकार करने में कांग्रेसी नेताओं की तर्ज पर ही संघ पोषित  भाजपा की सरकारें भी पूरी तरह असफल रही। यही नहीं जनता की नजरों में पहले से बेनकाब व अलोकतांत्रिक नेताओं को जबरन यहां का भाग्य विधाता बनाया गया। क्या संघ व उसकी भाजपा ऐसी ही लायेगी राम राज ? क्या ऐसी ही लहरायेगी भारतीय संस्कृति का परचम ? भारतीय संस्कृति के प्रतीक गौ व गंगा को बांधों व कत्लखानों से जमीदोज किया जा रहा है।

गौ पालक उत्तराखण्डियों को राजधानी गैरसैंण न बना कर बलात देहरादून में थोपने से सीमान्त जनपदों सहित पूरे पर्वतीय क्षेत्र को पलायन के लिए मजबूर कर लोकशाही व विकास का गला घोंटा जा रहा है परन्तु न संघ मुख्यमंत्री बने स्वयं सेवक को जनांकांक्षाओं को साकार करने का फरमान दे रहे है। सच्चाई यह है कि संघ के ध्वजवाहक ही अभी भारतीय संस्कृति की आत्मा समझी जाने वाले उत्तराखण्ड को ही नहीं समझ पाये तो उत्तराखण्डियों की जनांकांक्षाओं को क्या समझ पायेंगे।

क्या परिवर्तन आया कांग्रेस के बाद भाजपा की सरकार में? क्या संघ के पदाधिकारी बता सकते है? वही भ्रष्ट नौकरशाही व नेता प्रदेश के भाग्य विधाता बने है? मुख्यमंत्री भले समर्पित स्वयं सेवक रहे हैं परन्तु उन्हें लोकशाही में जनभावनाओं व जनांकांक्षाओं का सम्मान करने के सीख संघ कब देगा? उत्तराखण्ड की जनांकांक्षाओं को रौंदने के कारण ही आज उत्तराखण्ड बंग्लादेशी घुसपेटियों, अपराधियों, भ्रष्टाचारियों व भ्रष्ट नेता नोकरशाही का अभ्याहरण क्यों बन गया है? न दिशा बदली व दशा फिर परिवर्तन किसके लिए? चंद मठाधीशों व उनके प्यादों के लिए?”

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