• ऐसी राजनीति को शिकस्त देना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत

इन्द्रेश मैखुरी

दोपहर  की धूप अपने चरम पर है। लालकुआं का बाजार इस दुपहरी में ऊंघता हुआ सा मालूम पड़ता है। यह बाजार नैनीताल जिले के प्रमुख केंद्र हल्द्वानी से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर है। यही वो जगह है,जहां बिड़ला की सेंचुरी पल्प एंड पेपर नाम की कागज़ की मिल है। देश भर में लोकप्रिय है सेंचुरी का काग़ज,पर इस इलाके के लिए प्रदूषण का बड़ा सबब है। खैर इस बारे में फिर कभी…. उत्तराखंड में 11 अप्रैल को लोकसभा के लिए चुनाव होने हैं।

आज (9 अप्रैल)  प्रचार का अंतिम दिन है।इसलिए कड़ी धूप में नैनीताल-उधमसिंह नगर लोकसभा क्षेत्र से संयुक्त वामपंथ द्वारा समर्थित भाकपा(माले) प्रत्याशी कॉमरेड डॉक्टर कैलाश पांडेय के समर्थन में हम दुकानों में जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं। दुकान-दुकान घूमते एक छोटे सी खोमचेनुमा दुकान पर हम पहुंचते हैं। दुकान पर रखी सामग्री और दुकानदार को देख कर मेरे साथ चल रहे साथी देवेंद्र रौतेला,इस ओर मेरा ध्यान आकर्षित करवाते हैं। इस छोटी सी खोमचेनुमा दुकान पर बिकने को जो सामग्री रखी है, वो है-जय माता दी-लिखी हुई चुनरियाँ और श्रीफल।

जिन सज्जन की ये दुकान हैं, वे छूटे कद के कुर्ता-पायजामा और दाढ़ी वाले सज्जन हैं। पूछने पर बताया कि उनका नाम मतलूब अहमद सिद्दीकी है। उम्र 60 साल है और बीते 40 सालों से कारोबार कर रहे हैं। मतलूब भाई बताते हैं कि नवरात्रे के दौरान इस चुनरी की मांग होती है।यह बड़ा रोचक दृश्य है कि एक मुस्लिम बिना उज्र के जय माता दी-लिखी चुनरी और श्रीफल बेच रहा है। ये देश ऐसा ही है,जिसमें-जय माता दी-लिखी चुनरी कोई मतलूब अहमद बेच कर अपना घर चलाता है।इससे न बेचने वाले का मज़हब खतरे में आता है, न खरीदने वालों के धर्म पर कोई आंच आती है।

लेकिन इसमें धार्मिक उन्माद की राजनीति घुस आए तो नाटा सा मतलूब अहमद अचानक सबसे बड़े शत्रु की तरह पेश कर दिया जाएगा। दरअसल धार्मिक उन्माद और फिरकापरस्ती की ऐसी राजनीति को शिकस्त देना,इस समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है। वोट देने के हमारे आग्रह पर मतलूब भाई कुमाऊंनी लहजे में कहते हैं- “हम तो पाल दाज्यू के साथी हुए”।बात करते हुए मतलूब भाई, कई बार बड़े स्नेह से “पाल दाज्यू” का जिक्र करते हैं। पाल दाज्यू यानि कॉमरेड मान सिंह पाल।

कॉमरेड मान सिंह पाल बिन्दुखत्ता के भूमि संघर्ष की अगुवाई करने वाले भाकपा(माले) के प्रमुख नेताओं में से एक थे।2015 में 9 मार्च को वे इस दुनिया से रुख़सत हो गए।धर्म और उन्माद की राजनीति के उफ़ान के दौर में इस सिलसिले को कायम रखना बहुत जरूरी है, जिसमें कोई मतलूब भाईजान,अंदर तक भिगो देने वाली स्नेहिलता के साथ किसी पाल दाज्यू को याद कर सकें,याद करते रहें।

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