गैरसैंण पर सियासत,लेकिन राजधानी मानने को कोई नहीं तैयार !

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गैरसैंण पर सियासत जारी, राजधानी कैसी हो भाजपा तय करेगी

देवभूमि मीडिया ब्यूरो 

देहरादून। यह बात दीगर है कि उत्तराखंड की लड़ाई का केंद्र बिंदु गैरसैंण ही था और राज्य आंदोलन के शहीदों और आंदोलनकारियों के सपनों की राजधानी भी गैरसैण ही थी। लेकिन राज्य स्थापना के 19 साल बाद भी भले ही सूबे के नेता और सरकारों द्वारा सूबे की राजधानी पर कोई फैसला न लिया गया हो लेकिन राजधानी के मुद्दे पर सियासी घमासान कभी खत्म नहीं हुई । कांग्रेस ने गैरसैंण में राजधानी की नींव तो रख दी लेकिन गैरसैंण की राजधानी का स्वरूप क्या होगा इस पर तकरार जारी है। भाजपा का कहना है कि हम ही तय करेंगे कि गैरसैंण में स्थायी राजधानी हो या अस्थायी।लेकिन किसी भी दल में यह हिम्मत नहीं दिखाई देती कि वह गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित कर राजधानी को लेकर चल रही राजनीतिक खींचातानी को समाप्त कर राज्य आंदोलनकारियों को उनका हक़ दे और पर्वतीय प्रदेश की राजधानी पर्वतीय इलाके में घोषित करे। 

गौरतलब हो कि पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कांग्रेसी सत्ता के दौरान गैरसैंण में राजधानी की नींव रखी थी लेकिन सत्ताके लालच में वे बाद में भाजपा में चले गये और वर्तमान में सूबे में भाजपा की ही सरकार है। विपक्ष कांग्रेस का आरोप है कि यहां कांग्रेस के कार्यकाल में जो कुछ  काम हुए थे वही काम हुए है, उसके बाद कोई काम नहीं हुआ है।

पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अभी कहा कि राजधानी के ढांचागत विकास के लिए 50कृ60 करोड़ रूपये चाहिए जो सरकार के पास नहीं है। जिसकी वजह से काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है। बहुगुणा ने गैरसैंण राजधानी को पहाड़ के सम्मान व स्वाभिमान से जुड़ा हुआ सवाल बताते हुए कहा कि गैरसैंण से राज्य आंदोलन की जड़े जुड़ी है इसलिए इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

वहीं विजय बहुगुणा के बयान पर पलट वार करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि गैरसैंण में जो  काम कराये गये वह हमने अपने बूते पर कराये है अब भाजपा की सरकार है तब वह यह क्यों कह रहे है कि संसाधन नहीं है सरकार वहां काम करवाये।

स्थायी व अस्थायी राजधानी के मुद्दे पर भाजपा नेता व विधायक खजानदास का कहना है कि कांग्रेस को इसका क्या हक है कि वह राजधानी पर बात करे। जब उनकी सरकार थी तब उन्होने निर्णय क्यों नहीं लिया था कि गैरसैंण में स्थायी राजधानी हो या अस्थायी। उनका कहना है कि इसका फैसला भाजपा ही करेगी।

खैर फैसला होते होते 19 साल बीत चुके है लेकिन फैसला नहीं हो सका है। इसकी भी तिथि तय नहीं है कि राजधानी पर फैसला कब होगा, यह मुद्दा भी रामजन्म भूमि मुद्दे की तरह हो चुका है और सियासत का शिकार भी हो चुका है लेकिन सबसे दुःख की बात यह है कि इस मुद्दे पर सियासत जरूर होती रही है और आगे भी होती रहेगी।