ये रामलाल का डिमोशन नहीं तो और क्या है?

सियाराम पांडेय ‘शांत’

विजयवाड़ा की बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बड़े फैसले किए हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री के पद से रामलाल को हटा दिया गया है। उन्हें संघ में सह संपर्क प्रमुख बना दिया गया है। इसे लेकर राजनीतिक हल्कों में चर्चा का बाजार गर्म हो गया है। रामलाल की भाजपा में जो भूमिका थी, वैसा ही पद उन्हें संघ में मिलना चाहिए था। संघ में संपर्क प्रमुख का दायित्व अनिरुद्ध देशपांडे के पास है और उनके साथ दो सह संपर्क प्रमुख सुनील देशपांडे व रमेश पप्पा हैं। रामलाल तीसरे सह संपर्क प्रमुख बनाए गए हैं। सवाल उठता है कि क्या देर-सबेर अनिरुद्ध देशपांडे की भूमिका बदलेगी और अगर नहीं तो यह रामलाल का डिमोशन नहीं तो और क्या है?

भले ही उन्होंने इसके लिए 30 सितंबर 2017 को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को पद मुक्त करने संबंधी पत्र लिखने की बात कही हो लेकिन लोगों को यह बात आसानी से हजम नहीं हो पा रही है। जानकारों की मानें तो भाजपा के शलाका पुरुषों पं. दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी के परिजनों को भाजपा से जोड़े न रख पाने की उनकी विफलता भी इसके लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है।

पं. दीनदयाल उपाध्याय के पौत्र चंद्रशेखर उपाध्याय की उपेक्षा किसी से छिपी नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला का कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ना भी संघ को रास नहीं आया था। पूर्व संघ प्रमुख कुप्प सी सुदर्शन के परिजनों की भाजपा से दूरी और विपक्ष से नजदीकी को वे रोक नहीं पाए थे । पं. दीनदयाल उपाध्याय की जन्मस्थली धानक्या की बजाय नगला चंद्रभान बताए जाने से भी संघ परिवार हैरान था लेकिन वणिक लॉबी के दबाव में रामलाल एंड कंपनी पं दीनदयाल के परिजनों पर नगला चंद्रभान को ही उनकी जन्मस्थली बताने का दबाव बनाए रही।

इस खेल को संघ परिवार समझ भी रहा था। संभव है उनकी घरवापसी के मूल में यह भी एक कारण हो। भाजपा के शलाका पुरुषों के परिजनों का पार्टी से जोड़े रखने, उनके दुख-दर्द को जानने -समझने का दायित्व रामलाल का था जो उन्होंने बखूबी निभाया नहीं। उनके संगठन महासचिव रहते तेजस्वी और युवा ब्राह्मण प्रचारकों की भाजपा में उपेक्षा की खबरें भी संघ को मिल रही थीं लेकिन हर चीज का अपना उपयुक्त समय होता है।

भाजपा कार्यकर्ताओं की मानें तो रामलाल ने भाजपा कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने का काम भले न किया हो लेकिन भाजपा में बहुदलीय संस्कृति को घुसाने की कोशिश उन्होंने जरूर की। बहुदलीय परिक्रतार्थियों को भाजपा में उन्होंने खूब अहमियत दिलाई। उनका विशेष जोर कांग्रेस, बसपा, सपा और अन्य दलों के नेताओं को भाजपा से जोड़ने पर रहा। य

ही वजह थी कि भाजपा में संघ की नीतियों से विचलन जैसे हालात बन रहे थे। संघ और भाजपा के बीच तालमेल के अभाव जैसे हालात बने हुए थे। संघ की विजयवाड़ा बैठक से पहले ही इस बात के संदेश तो मिल रहे थे  कि इस बैठक में संघ और भाजपा के कामकाज की समीक्षा होगी। इस बैठक से जिस तरह रामलाल की घरवापसी की खबर आई है, उसके अपने राजनीतिक निहितार्थ है।

रामलाल 13 साल से भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री थे। इतने कद्दावर नेता को रामलाल को आरएसएस का सह संपर्क प्रमुख बनाया जाना सोचने को विवश तो करता ही है। कुछ लोग इस पूरे प्रकरण को रामलाल की भतीजी की शादी से जोड़कर भी देख रहे हैं। उस कार्यक्रम में मुस्लिम दामाद की हिंदू रीति-नीति से शादी का दावा किया गया था और रामलाल समेत भाजपा शासित कई राज्यों के मंत्रियों ने भी भाग लिया था। इस शादी की बड़ी आलोचना हुई थी।

समझा जा रहा था कि इससे भी संघ परिवार बेहद असहज था। वैसे कई भाजपा नेताओं की पुत्रियों ने मुस्लिम परिवारों में शादियां की है। चुनाव सिर पर होने की वजह से उस समय भले ही यह मामला दब गया हो लेकिन अंदरखाने टीस तो थी ही जो नासूर बन रही थी। इसमें संदेह नहीं कि भाजपा में राष्ट्रीय संगठन महामंत्री और प्रदेश संगठन मंत्री संघ से भेजे जाते हैं, जो पार्टी में संगठन और संघ व भाजपा के बीच समन्वय का दायित्व संभालते हैं।

उनके चयन में भाजपा कोई हस्तक्षेप भी नहीं करती क्योंकि उसे पता होता है कि घी का लड्डू टेढ़ा हो या सीधा, उससे उसकी प्रकृति पर कोई असर नहीं पड़ता। भाजपा में अध्यक्ष के बाद संगठन महासचिव का पद सबसे महत्वपूर्ण होता है। 2005 में बीजेपी के संगठन महासचिव संजय जोशी के विवादों में आने के बाद उन्हें भाजपा से पद मुक्त किया गया था। 2006 में राम लाल को भाजपा में संगठन महासचिव बनाया गया था। रामलाल के इस तर्क में दम हो सकता है कि उनके आग्रह के बाद भी उन्हें लोकसभा चुनाव की तैयारियों की वजह से इस दायित्व से मुक्त नहीं किया गया था ।

सच तो यह है कि संघ नए चेहरों को खासकर अपनी परंपरा में दीक्षित युवाओं को मौका देना चाहता है। विजयवाड़ा की बैठक से इस बात के संकेत तो मिल ही रहे हैं। भाजपा में जिस तरह सर्वदलीय परिक्रमार्थियों की भीड़ जुूट रही है, वह भी कहीं न कहीं संघ को अपनी रीति-नीति के अनुरूप नजर नहीं आ रही थी। टिकटों के बंटवारे में खेल के भी रामलाल पर आरोप लग रहे थे। उद्योगपतियों की भाजपा में बढ़ती खेप भी संघ की चिंता का सबब बन रही थी। रामलाल की जगह पर संघ वी सतीश महाना का नाम चल रहा था लेकिन उनकी जगह दलित चेहरे वीएल संतोष को मौका दिया जा रहा है।

चर्चा तो यह भी थी कि उत्तर प्रदेश में संघ और भाजपा के बीच सेतु की भूमिका निभा रहे सुनील बंसल को भी संघ परिवार उनकी जगह मौका मिल सकता है। बीच में चर्चा इस बात की भी थी कि सुनील बंसल पर कुछ और राज्यों का दायित्व डाला जाए लेकिन सुनील बंसल का भी कई कारणों से अंदरखाने काफी विरोध है। ऐसे में उनके नाम पर भाजपा की हिचकिचाहट भी रही है। भाजपा की कोशिश थी कि रामलाल की जगह किसी दलित चेहरे को प्रमोट किया जाए जिससे कि भविष्य के चुनाव में पार्टी को लाभ मिल सके।

गौरतलब है कि रामलाल चार भाजपा अध्यक्षों राजनाथ सिह, नितिन गडकरी, अमित शाह, और अब कार्यकारी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा तक के साथ काम कर चुके हैं। इतने सालों से सिस्टम में रहे रामलाल जी की संघ में वापसी क्यों हुई , इस पर ज्यादा अटकलें लगा नहीं सकते लेकिन संघ की कार्यशैली समझने वाले जानते हैं कि ऐसा फैसला पहले लिया जा चुका था लेकिन उसे अमली जामा पहनाने में थोड़ा वक्त जरूर लगा।

सूत्रों की मानें तो संघ चाहता था कि ऐसा व्यक्ति संगठन महामंत्री बने जो बेहतर समन्वय करे और संघ और भाजपा के बीच सेतु भी बना रहे। अमित शाह साफ कह चुके हैं कि अभी पार्टी का पूरा विस्तार नहीं हुआ है। वी. सतीश पश्चिम क्षेत्र यानी राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र और साथ ही आंध्र प्रदेश का काम संभाल रहे थे। प्रचारक के तौर पर पूर्वोत्तर के राज्यों में बहुत काम किया है। रामलाल से पहले संजय जोशी, गोविदाचार्य और नरेंद्र मोदी तक संगठन महासचिव रह चुके हैं।

भाजपा के गठन के बाद से संघ से आए सुंदर सिह भंडारी, कुशाभाऊ ठाकरे, प्यारेलाल खंडेलवाल संगठन महामंत्री का दायित्व संभालते रहे थे। हालांकि सबसे लंबे समय तक महामंत्री रहने वाले रामलाल ही रहे हैं। रामलाल को संगठन से वापस संघ में बुलाने का क्या विशेष कारण है, इस पर सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्षी खेमों में भी कानाफूसी हो रही है।

संघ अपने आनुषांगिक संगठनों से समन्वय के लिए उनमें अपने प्रचारकों को भेजता है लेकिन किसी इतने अनुभवी पदाधिकारी को वापस बुलाकर इस तरह हाशिये पर डालने के पीछे के कारण अभी किसी को भले ही ज्ञात न हो लेकिन यह जरूर माना जा रहा है कि रामलाल को संगठन से संघ में वापसी से पहले अमित शाह और मोदी से संघ प्रमुख की चर्चा जरूर हुई होगी।

वैसे उनकी संघ और भाजपा से छुट्टी के कयास तो पहले से ही लगाए जा रहे थे लेकिन संघ वापसी को अभयदान जैसा ही माना जा रहा है। उन्होंने अपनी उम्र का वास्ता दिया था। उम्र का तकाजा तो यही कहता है कि अब उन्हें आराम करना चाहिए।

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