दो खरीद में किया 15 करोड़ का वारा न्यारा, टेडर प्रक्रिया को बताया धत्ता  

शंकर सिंह भाटिया

देहरादून। उत्तराखंड में ऊर्जा महकमा घोटालों की खान है। हर खरीद के नीचे कोई न कोई घोटाला छिपा दिखाई देता है। ऐसा ही एक घोटाला पिटकुल में ट्रांसफार्मरों की खरीद में सामने आया है। पिटकुल प्रबंधन द्वारा ट्रासफार्मरों की दो खरीद सवालों के घेरे में है। यह दोनों खरीद करीब पंद्रह करोड़ की है।

पहला टेंडर के जरिये मै.आईएमपी मुंबई से पांच ट्रांसफार्मर खरीदे गए हैं। खरीद की गहराई तक जाएं तो पता चलता है कि प्रबंधन ने खुद टेंडर प्रक्रिया को मजाक बनाकर रख दिया है। इसके अतिरिक्त इसी कंपनी का 80 एमवीए का एक और ट्रांसफार्मर भी खरीदा गया था, जो गारंटी पीरियड में फुंकने के बाद मरम्मत होकर आया और फिर से फुंक गया, जबकि झाझरा में लगे इस ट्रांसफार्मर को कभी भी 70 प्रतिशत कैपेसिटी से अधिक नहीं चलाया गया। मै.आईएमपी के ट्रांसफार्मर की खामियां बताने पर श्रीनगर में कार्यरत एक अधिशासी अभियंता को निलंबित कर दिया गया। हालांकि इस पूरे खेल का बड़ा खिलाड़ी सुमेर सिंह यादव एमडी ऊर्जा निगम और पिटकुल अब उत्तराखंड से रुखसत हो गए हैं, लेकिन इस खेल में शामिल कई खिलाड़ी अभी भी पिटकुल में मौज कर रहे हैं।

ट्रांसफार्मर आपूर्ति के लिए 25 मार्च 2014 को मै.आईएमपी पावर लि. को 10.45 करोड़ का क्रयादेश जारी किया गया, जबकि मै. आईएमपी द्वारा 07 अप्रैल 2014 को अनुबंध किया गया। डिस्पैच इंस्टेªक्शन लेटर दिनांक 01 अप्रैल 2014 के रिफरेंस नंबर-5 के अनुसार एमडी पिटकुल द्वारा 25 मार्च 2014 को ही स्टेज इंस्पेक्शन वीभर एप्रूवल दे दी गई। 25 मार्च 2014 को ही फाइनल इंस्पेक्शन डेट दे दी गई।

अधिशासी अभियंता श्रीनगर के दिनांक 10 जुलाई 2014 की निरीक्षण टिप्पणी के अनुसार ट्रांसफार्मर निरीक्षण के दौरान निर्धारित मानकों में कई तरह की खामियां पाई गई। जैसे मै.आईएमपी द्वारा ट्रांसफर्मरों की मैन्युफैक्चरिंग पूर्व में ही की जा चुकी थी। जो पिटकुल की ई-निविदा प्रणाली के खिलाफ है। पावर ट्रांसफार्मरों का स्टेज इंस्पैक्शन वीभर आफ करना दर्शाता है कि मै.आइएमपी आश्वस्त था कि आर्डर उसे ही मिलना है। ट्रांसफार्मरों के अंतिम निरीक्षण में भी ट्रांसफार्मर सब स्टेंडर्ड पाए गए, फिर भी डीआई (डिस्पैच इंस्ट्रक्शन) कर दी गई। ट्रांसफार्मरों के सब स्टेंडर्ड होने का एक बड़ा प्रमाण यह है कि ट्रांसफार्मरों के आयल टेंकर में तेल की मात्रा क्षमता से अधिक पाई गई।

निरीक्षण के बाद पिटकुल के अधिशासी अभियंता श्रीनगर ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि मानकों के अनुसार ट्रांसफार्मर के मुख्य टैंक की क्षमता 13714 लीटर होनी चाहिए। लेकिन मै.आइएमपी के ट्रांसफार्मर 16571 लीटर से भर पाए। ऐसा ट्रांसफार्मर में कापर की बाइंडिंग के दौरान कम कापर लगाने की वजह से हुआ। जिससे ट्रांसफार्मर की क्षमता कम हो गई और इसी कारण अक्सर ट्रांसफार्मर फुंकने की घटनाएं होती हैं।

जानकारों का कहना है कि मै.आईएमपी के ट्रांसफार्मरों को जानबूझकर ऐसे स्थानों पर लगाया गया जहां अधिक लोड नहीं है। जब ये ट्रांसफार्मर 70 प्रतिशत से कम लोड पर ही फुंक जाते हैं तो अधिक लोड पर क्या स्थिति होगी समझा जा सकता है। अधिशासी अभियंता श्रीनगर ने आपूर्ति बीजक में भी कई खामियां पाई। अधिशासी अभियंता जब इस तरह की कई खामियां सामने लाए तो उन्हें रेलवे लाइन के सर्वे में गड़बड़ी का बहाना बनाकर 04 फरवरी 2015 को निलंबित कर दिया गया।

गौर करने की बात यह है कि फर्म को 25 मार्च 2014 को आपूर्ति आदेश जारी किया गया। इसी तारीख को आपूर्ति की स्वीकृति भेज दी गई। इसी तिथि को ट्रांसफार्मर की गारंटीड टेक्निकल पैरामीटर व डाइंग पिटकुल द्वारा एपु्रव किया गया। इसी तारीख को फर्म का एमक्यूपी जमा किया गया। इसी तिथि को एमडी पिटकुल द्वारा फर्म को सामग्री निर्माण के दौरान निरीक्षण की छूट प्रदान की गई। इसी तिथि को फर्म द्वारा पिटकुल से अंतिम निरीक्षण का अनुरोध किया गया। पिटकुल द्वारा इसी तिथि को अनुरोध स्वीकार कर अंतिम निरीक्षण के लिए अधिकारी को अधिकृत किया गया। किसी टेंडर में एक ही तारीख को इतने सारे कार्य होना यह भी दर्शाता है कि फर्म विशेष को आर्डर देने का निर्णय पहले ही किया जा चुका था। इतनी सारी गतिविधियां एक ही तारीख को होना भी एक बड़े संदेह की तरफ ईशारा करता है। इतना ही नहीं फर्म द्वारा परफार्मेंस गारंटी डिपोजिट 02 अप्रैल 2014 को जमा किया गया, जबकि पिटकुल द्वारा कंपनी को एक दिन पहले ही डिस्पैच इंस्ट्रक्शन जारी कर दिए गए। पिटकुल प्रबंधन को इतनी जल्दी क्यों थी कि फर्म द्वारा परफार्मेंस गारंटी डिपोजिट करने से पहले डीआई कर दी गई।

झाझरा में लगे 80 एमवीए के ट्रांसफार्मर की कीमत करीब साढ़े चार करोड़ है। एक अन्य खरीद में यह ट्रांसफार्मर झाझरा के लिए मै.आईएमपी से खरीदा गया। पिछले साल यह ट्रांसफार्मर फुंक गया। जबकि बताया जाता है कि यह सिर्फ 70 प्रतिशत कैपेसिटी पर चलाया जा रहा था। यह गारंटी पीरियड में था, इसे रिपेयर के लिए कंपनी के पास भेजा गया, रिपेयर होने के बाद यह फिर से फुंक गया।

ट्रांसफार्मरों की इस खरीद में बड़ा खेल होने की आशंका जताई जा रही है। अभी और भी कई मामले ट्रांसफार्मर खरीद के हैं, जो संदेह को और पुख्ता करते हैं। यदि सरकार करोड़ों रुपये के इस खरीद में टेंडर प्रक्रिया की जांच करा दे तो सारा खेल खुलकर सामने आ जाएगा। तब ऊर्जा निगम और पिटकुल के एमडी का कार्यभार संभाले सुमेर सिंह यादव के जलवे थे। वह मिट्टी पर भी हाथ डाल दे तो सोना बन जाता था। मिट्टी से सोना बनाने की इस खेल की जांच तो बनती ही है। नई सरकार के हाथ में है कि वह इस तरह की गड़बड़ियों पर क्या कदम उठाती है।