• फूलेदई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भरी भंकार…. 
  • ये देली स बारंबार नमस्कार, पूजैं द्वार बारंबार, फूले द्वार…..

देवभूमि मीडिया ब्यूरो

देहरादून  : चैत्र संक्रांति में सूर्य, मीन राशि में  सुबह 4 बजकर 29 मिनट पर प्रवेश करेंगे जो 15 मार्च को दोपहर 2 बजे तक रहेंगे और कुम्भ लग्न समय चैत्र संक्रान्ति का आरंभ होगा। इस संक्रान्ति में स्नान, दान, जप इत्यादि का विशेष पुण्य काल अगले दिन दोपहर दो बजे तक रहेगा। चैत्र संक्रांति का शास्त्रों में बड़ा महत्व बताया गया है। इस दिन को धार्मिक दृष्टि से ही पवित्र एवं शुभ नहीं माना जाता बल्कि व्यावहारिक रूप से भी उत्तम माना गया है। चैत्र संक्रांति से सूर्य की गति उत्तरायण की ओर बढ़ रही होती है, उत्तरायण काल में सूर्य उत्तर की ओर उदय होता दिखता है और उसमें दिन का समय बढ़ता जाता है जिससे दिन बढ़े और रातें छोटी होती हैं और प्रकृति में नया जीवन शुरू हो जाता है। इस समय वातावरण और वायु भी स्वच्छ होती है, ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन-मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं। शास्त्रों के अनुसार रातें छोटी होने के कारण नकारात्मक शक्तियों में भी कमी आती है और दिन में ऊर्जा प्राप्त होती है। चैत्र संक्राति में स्नान, दान, जप इत्यादि का विशेष पुण्य काल 14 मार्च को सुबह 4 बजकर 29 मिनट से आरंभ होकर 15 मार्च को दोपहर 2 बजे तक रहेगा।

वहीं उत्तराखंड के अधिकांश क्षेत्रों में चैत्र संक्रांति से फूलदेई का त्योहार मनाने की वर्षों पुरानी परंपरा रही है। प्रदेश के कुमाऊं और गढ़वाल मंडलों के ज्यादातर इलाकों में आठ दिनों तक यह त्योहार मनाया जाता है। वहीं, टिहरी के कुछ इलाकों में एक माह तक भी यह पर्व मनाने की परंपरा रही है। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में चैत्र संक्रांति को फूलदेई त्यौहार के रूप में मनाये जाने की वर्षों पुरानी परंपरा रही है चैत्र संक्रांति से एक दिन पहले  पहाड़ों में शाम को बच्चे रिंगाल की टोकरी लेकर तमाम  फूलों जिनमें फ्यूंली, बुरांस, बासिंग, आडू, पुलम, खुबानी के फूलों सहित अखरोट के पत्तों और पय्याँ के फूलों को इकट्ठा कर अपने -अपने घरों में रख लेते  हैं। जिन्हे वे अगले दिन सुबह नहाकर धोकर गांव की गलियों  में घर-घर जाकर ग्रामीणों की सुख-समृद्धि के पारंपरिक गीत गाते हुए घरों की देहरियों पर इन फूलों को बिखेरते हैं।

कुमाऊं में तो कुछ स्थानों में घरों की देहरियों में ऐपण जिन्हे पारंपरिक चित्र कला भी कहा जाता है जो पिसे हुए चावल सफ़ेद रंगों से लाल मिट्टी की दीवारों और जमीन पर बनाये जाने की परंपरा है। इस फूलों को घरों की देहरियों पर रखते हुए बच्चे ”फूलेदई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भरी भंकार, ये देली स बारंबार नमस्कार, पूजैं द्वार बारंबार, फूले द्वार…. यानि (आपकी दहलीज फूलों से भरी और सबकी रक्षा करने वाली (क्षमाशील) हो, घर व समय सफल रहे, भंडार अनाज यानि खाद्यान्नों से भरे रहें, इस देहरी को बार-बार नमस्कार, द्वार खूब फूले-फले…) गीत की पंक्तियों के साथ उत्तराखंड में फूलदेई का त्योहार मनाया जाता है।

इन आठ दिनों तक रोज बच्चे ‘घोघा माता फुल्यां फूल, दे-दे माई दाल चौंल’ और ‘फूलदेई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भरी भकार’ गीत गाते हुए बच्चों को लोग इसके बदले में दाल, चावल, आटा, गुड़, घी और दक्षिणा (रुपए) दान करते हैं। पूरे माह में यह सब जमा किया जाता है। इसके बाद घोघा माता  जिन्हे सृष्टि की देवी कहा जाता  है की पूजा की जाती है। जिसमें  बच्चों की मदद गांव  की महिलाएं भी करती यही और चावल, गुड़, तेल से मीठा चावल बनाकर प्रसाद के रूप में गांव में सबको बांटा जाता है। वहीं  प्रदेश के कुछ इलाकों में बच्चे घोघा की डोली बनाकर देव डोलियों की तरह घुमाते हैं और ये बच्चे पूरे गांव में नंगे पैर चलकर इस डोली को घुमाते हैं और घोघा माता की पूजा अर्चना कर इस पारम्परिक पर्व का समापन किया जाता है । 

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