सिंहावलोकन : राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020

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पृष्ठभूमि को नया विस्तार और आयाम

‘‘लोकतंत्र में नागरिकता की परिभाषा में कई बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक गुण शामिल होते हैंः एक लोकतांत्रिक नागरिक में सच को झूठ से अलग छांटने, प्रचार से तथ्य अलग करने, धर्मांधता और पूर्वाग्रहों के खतरनाक आकर्षण को अस्वीकार करने की समझ एवं बौद्धिक क्षमता होनी चाहिए….वह न तो पुराने को इसलिए नकारे क्योंकि वह पुराना है, न ही नए को इसलिए स्वीकार करे क्योंकि वह नया है-बल्कि उसे निष्पक्ष रूप से दोनों को परखना चाहिए और साहस से उसको नकार देना चाहिए जो न्याय एवं प्रगति को अवरुद्ध करता हो….’’ (माध्यमिक शिक्षा आयोग-1952)
डाॅ. अरुण कुकसाल
शिक्षा व्यक्ति की मूल अभिवृत्ति को सही दिशा में क्रियाशील करने की सामर्थ्य एवं योग्यता को विकसित करती है। वास्तव में शिक्षा जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। जीवन का हर क्षण और पग हमें कुछ न कुछ संदेश देते हुए गतिशील रहता है। शिक्षा इन्हीं संदेशों के क्रियान्वयन के प्रति व्यक्ति को क्षमतावान बनाती है। इन अर्थों में शिक्षा व्यक्ति के जीवन और जीविका के मध्य अनुकूलतम संतुलन बनाने में प्रमुख भूमिका निभाती है। वास्तव में मात्र जानकारियों को हासिल करना ही शिक्षा नहीं है। वरन् व्यक्ति के अंतर्मन में विराजमान ज्ञान, चरित्र एवं कौशल को उसके व्यवहारिक जीवन में उतारना शिक्षा प्रणाली का मौलिक कार्य है।
पश्चावलोकन-
देश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सामाजिक चिन्तकों द्वारा अभिव्यक्त शिक्षा संबधी विचारों को स्वाधीन भारत में अपनाने की शुरुआत की गई थी। नीति-नियंताओं द्वारा महात्मा गांधी के शैक्षिक दर्शन ‘नई तालीम’ को स्वीकारते हुए बच्चे में बचपन से ही आत्मनिर्भता और आत्म-सम्मान के भाव को विकसित करने पर जोर दिया गया। इसके लिए बच्चे के आस-पास के परिवेश जिसमें मातृभाषा और पैतृक-स्थानीय गतिविधियों को शामिल करते हुए शिक्षा प्राप्ति का प्रमुख माध्यम बनाये जाने का सुझाव दिया गया था। डाॅ. लक्ष्मणस्वामी मुदलियर की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा आयोग-1952 और डाॅ. दौलत सिंह कोठारी (तत्कालीन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष) की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय शिक्षा आयोग-1964 ने महात्मा गांधी के शैक्षिक-दर्शन को विस्तार दिया।
कोठारी कमीशन (1964-66) के आलोक में सन् 1968 में देश की प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अमल में लाया गया था। इसके अन्तर्गत शिक्षा के अवसरों की समानता, प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा शिक्षण, हिन्दी का सम्पर्क भाषा के रूप में विकास, नैतिक और सामाजिक मूल्यों का विकास, काॅमन स्कूल सिस्टम, 25 प्रतिशत माध्यमिक विद्यालयों को ‘व्यावसायिक स्कूल’ के रूप में संचालित करना आदि प्रमुख सिफारिशें की गई थी। आगे इसी दिशा में बढ़ते हुए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-1975 तैयार की गई थी।
सन् 1976 तक भारतीय संविधान में शिक्षा राज्य सूची का विषय था। शिक्षा संबधी नीतिगत मुद्दों पर केन्द्र सरकार राज्यों का केवल मार्गदर्शन ही कर सकती थी। सन् 1976 में संविधान संशोधन के माध्यम से शिक्षा को समवर्ती सूची में रखा गया। इसका मुख्य उद्देश्य संपूर्ण राष्ट्र में शिक्षा से संबधित मूलभूत बातों और तथ्यों में समानता विकसित करना था। यही कारण था कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1986 में संपूर्ण देश की विद्यालयी पाठ्यचर्या में एक सर्वसामान्य (Common Core) नीति लागू करने की सिफारिश की गई। इसी के तहत एनसीईआटी द्वारा देश में किये गये कुछ प्रमुख अध्ययनों के आधार पर राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-1988 तैयार की गई।
इस दिशा में आगे बढ़ते हुए बच्चों पर पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक और परीक्षा के अनावश्यक दवाब को कम करने के दृष्टिगत प्रो. यशपाल के नेतृत्व में सन् 1993 में ‘शिक्षा बिना बोझ के’( Learning Without Burden) की रिपोर्ट तैयार हुई। इस रिपोर्ट ने बच्चों पर पढ़ाई के बोझ को तर्कसंगत तरीके से कम करने की अनेक सिफारिशें की। पुनः विद्यालयी शिक्षा की चुनौतियों, आवश्यकताओं एवं समस्याओं के संदर्भ में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2000 तैयार की गई थी।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2000 की पुर्नसमीक्षा में यह कहा गया कि वर्तमान विद्यालयी शिक्षा प्रणाली में बच्चे का स्कूली ज्ञान और व्यवहारिक जीवन में उसके उपयोग में उचित तारतम्य नहीं है। आज की शिक्षा व्यवस्था में बच्चों का भविष्य इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि उसके लिए अब बच्चों के वर्तमान को अनदेखा किया जा रहा है। ऐसे अनेक ज्वलंत प्रश्नों के समाधान के परिपेक्ष्य में प्रख्यात सामाजिक चिन्तक प्रो. यशपाल की अघ्यक्षता में 21 फोकस समूहों द्वारा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 बनाई गई।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 के केन्द्र बिन्दु में निम्न पांच मार्गदर्शक सिद्धान्तों को ध्यान में रखा गया था-
1. ज्ञान को स्कूल के बाहरी जीवन से जोड़ना।
2. पढ़ाई को रटन्त प्रणाली से मुक्त करना।
3. शिक्षा पाठ्यपुस्तक केन्द्रित न होकर बच्चों को सर्वागींण विकास के अवसर उपलब्ध कराने में सहायक हो।
4. परीक्षा को लचीला बनाते हुए उसे कक्षा की गतिविधियों से जोड़ना।
5. बच्चों का विकास ऐसे नागरिकों के रूप में, जिनका राष्ट्रीय मूल्यों (लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता एवं समानता) में विश्वास और आस्था हो।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 के प्राक्कथन में दर्ज प्रो. यशपाल की यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण हैं कि ‘‘शिक्षा कोई भौतिक वस्तु नहीं है जिसे शिक्षक या डाक के जरिए कहीं पहुंचा भर दिया जा सके। शिक्षा की जड़ें हमेशा ही बच्चे की भौतिक और सांस्कृतिक ज़मीन में गहरे पैठी (मौजूद) होती हैं और उन्हें माता-पिता, शिक्षकों, सहपाठियों और समुदायों के साथ पारस्परिक क्रियाओं से पोषण मिलता है। इस दायित्व के संदर्भ में शिक्षकों की भूमिका और प्रतिष्ठा को रेखांकित करने और सुदृढ़ करने की जरूरत है। खरे ज्ञान के सृजन में हमेशा ही पारस्परिकता अंतर्निहित होती है। अगर बच्चे को निष्क्रिय रहने को मजबूर न किया जाए तो इस आदान-प्रदान में शिक्षक भी सीखता है। चूंकि बड़ों के मुकाबले बच्चों की अवलोकन और अनुभूति में अधिक गहराई होती है, ज्ञान के सृजक के रूप में उनकी संभावनाओं की हमें अधिक समझ होनी चाहिए। अपने अनुभव के आधार पर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि जो भी थोड़ी बहुत मेरी समझ है उसका अच्छा-खासा हिस्सा बच्चों के साथ मेरे संवाद का नतीजा है। यह दस्तावेज इस पहलू की भी पड़ताल करता है।’’