नेट ज़ीरो इमारतें बनाना दुनिया के हर कोने में है सम्भव !

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अगर कुछ चाहिए, तो वो है बस पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पण और जलवायु परिवर्तन से लड़ने की इच्छाशक्ति

देवभूमि मीडिया ब्यूरो 
दुनिया के लगभग हर हिस्से में नेट-ज़ीरो या नेट-ज़ीरो के करीब बिल्डिंग निर्माण के लिये जरूरी तमाम प्रौद्योगिकी और क्षमताएं पहले से ही मौजूद हैं। यह क्षमताएं विकसित तथा विकासशील, दोनों ही देशों में मौजूद हैं और इनकी लागत भी परंपरागत निर्माण परियोजनाओं की लागत के लगभग बराबर ही है।
यह बातें निर्माण क्षेत्र में जलवायु के अनुकूल वैश्विक नवाचार को लेकर हुए एक ताज़ा अध्ययन में सामने आयी हैं।
एनुअल रिव्यू ऑफ एनवायरमेंट एंड रिसोर्सेज़ में छपे एक अध्ययन पत्र में कहा गया है कि बिजली, परिवहन और निर्माण क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के मामले में सबसे बड़ा अंतर पैदा करने की क्षमता है। यह शोध ऐसे समय पर किया गया है जब हमारे शहर और समाज सामूहिक रूप से यह एहसास करने लगे हैं कि लॉकडाउन के दौरान हम कैसे रहते हैं और कैसे अपने घर का मूल्यांकन करते हैं।
दुनिया भर में उत्पन्न होने वाली ऊर्जा संबंधी ग्रीन हाउस गैसों के 39% हिस्से के लिए निर्माण क्षेत्र ज़िम्मेदार है और निर्माण संबंधी सामग्री तैयार करने में निकलने वाले कार्बन पर डेढ़ डिग्री सेल्सियस कार्बन बजट के बाकी बचे हिस्से का लगभग आधा भाग तक खर्च हो सकता है।
निर्माण क्षेत्र में नेट ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करना जलवायु संबंधी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिहाज़ से बेहद जरूरी है। सतत निर्माण और ऊर्जा संबंधी रिट्रोफिट्स भी नौकरियों का एक स्रोत हैं और इन्हें कोविड-19 महामारी के कारण हुए आर्थिक नुकसान की जलवायु के प्रति मित्रवत भरपाई के प्रमुख हिस्से के तौर पर देखा गया है।
और ऐसा नहीं है कि यह निर्माण तकनीकें सिर्फ अमीरों के लिए ही उपलब्ध हैं और उन्हीं के लिए ज़रूरी हैं। नेट ज़ीरो ऊर्जा वाली इमारतें कम आमदनी वाले परिवारों और गरीब इलाकों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनके कारण कूलिंग और हीटिंग दोनों के ही बिल में गिरावट आती है। इनसे परंपरागत मकानों के मुकाबले बिजली की मांग में 95% तक की बचत होती है। 
इमारतों का डिज़ाइन तैयार करने, उनके तौर-तरीकों, निर्माण, संचालन और रिट्रोफिट्स के साथ-साथ निम्न कार्बन या यहां तक कि कार्बन स्टोरिंग निर्माण सामग्री तैयार करने में हाल में हुई प्रगति से पता चलता है कि निर्माण क्षेत्र खुद भी जलवायु के लिहाज से तटस्थ बन सकता है, लेकिन इस अध्ययन के लेखकों ने आगाह किया है कि मौजूदा प्रौद्योगिकियों और क्षमताओं का इस्तेमाल करने के लिए फौरी कदम उठाने होंगे।
सेंट्रल यूरोपीयन यूनिवर्सिटी में सस्टेनेबल एनर्जी पॉलिसी के सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज की निदेशक और इस अध्ययन की सह लेखक डियाना अर्ज वोसात्ज ने कहा ‘‘हमारा अध्ययन यह दिखाता है कि नेट जीरो एनर्जी बिल्डिंग और रिट्रोफिट्स के निर्माण की संभावनाएं दुनिया के हर कोने में मौजूद हैं। साथ ही हर तरह की जलवायु और हर किस्म की इमारत के निर्माण में ऐसा करना संभव है। अनेक स्थानों पर यह पहले से ही बाजार की वास्तविकता है और वह जलवायु के प्रति तटस्थ अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। अगर हमें इस सदी के मध्य तक जीरो एनर्जी ग्लोबल बिल्डिंग सेक्टर तैयार करना है तो इस प्रौद्योगिकी को अभी से मानक बना कर काम करना होगा। अगर हम एक भी इमारत के निर्माण या रिट्रोफिट में अपनी नेट-जीरो प्रौद्योगिकी और उसके तौर-तरीकों का पूरा फायदा नहीं उठाते हैं तो हम एक अधिक गर्म जलवायु में बंध कर रह जाएंगे।”
नेट ज़ीरो एनर्जी निर्माणों के लिए सबसे बड़ी प्रौद्योगिकीय चुनौती वे बहुमंजिला वाणिज्यिक इमारते हैं जो गर्म और उमस भरे वातावरण में बनाई गई हैं। साथ ही ऐतिहासिक धरोहर वाली इमारतों को रिट्रोफिट करना भी बड़ी चुनौती है, लेकिन अच्छी बात यह है कि इनका भी समाधान मौजूद है। अब देखना यह है कि इच्छाशक्ति किसकी कितनी है।