एक सदी तक नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस की ग्रीष्मकालीन राजधानी रहा नैनीताल !

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नैनीताल की मौजूदा स्थिति यहां हाईकोर्ट के आने से नहीं हुई, बल्कि इसके लिए अनियोजित नियोजन है जिम्मेदार

प्रयाग पाण्डे 
नैनीताल : अपनी बसावट के करीब बीस साल बाद 1862 से लेकर आजादी के करीब सोलह साल बाद 1963 तक पहले नैनीताल नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस ,फिर नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस एंड अवध कालांतर में यूनाइटेड प्रोविंसेस आगरा एंड अवध ,बाद में यूनाइटेड प्रोविंसेस और आजादी के बाद उत्तर प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी रहा ।इस दौरान यहाँ अविभाजित उत्तर प्रदेश का संपूर्ण मन्त्रिमण्डल, विधायक ,एमएलसी सहित पूरा सचिवालय नैनीताल प्रवास में रहता था।
1880 के भू-स्खलन के बाद स्नोव्यू स्थित को असुरक्षित करार दे दिया गया था।इसकी सुरक्षा को लेकर कई विशेषज्ञ समितियां बनी।1895 में सर एंटोनी पेट्रिक मैकडॉनल ने लेफ्टिनेंट गवर्नर का पदभार संभालते ही पुराने राजभवन को खाली करा कर नया राजभवन बनाने का निर्णय लिया।नया राजभवन बनने तक डायोसेजन बॉयज स्कूल (शेरवुड) को अस्थायी राजभवन बनाने का प्रस्ताव बना।पर स्कूल प्रबंधन इसके लिए राजी नहीं हुआ।तब लेफ्टिनेंट गवर्नर सर मैकडॉनल ने यह इरादा त्याग दिया।ग्रीष्मकालीन राजधानी को मसूरी ले जाने पर विचार किया जाने लगा।इस प्रयोजन के लिए मसूरी में बाकायदा जमीन खोजी गई।पर वहाँ भी उपयुक्त स्थान नहीं मिल पाया।अंततः राजभवन को अस्थायी तौर पर डायोसेजन बॉयज स्कूल भवन में स्थानांतरित कर दिया गया।स्कूल को बार्नसडेल स्थित सचिवालय(वर्तमान में उच्च न्यायालय) भवन में भेज दिया गया।
1895 में भारतीय सेना के गठन के समय नैनीताल बंगाल कमांड का मुख्यालय बना ।1905 में जब भारतीय सेना का पुनर्गठन हुआ नैनीताल को सेना के ईस्टर्न कमांड का ग्रीष्मकालीन हेड क्वॉर्टर बनाया गया ।1939 तक नैनीताल सेना के ईस्टर्न कमांड का ग्रीष्मकालीन मुख्यालय रहा।
ग्रीष्मकालीन राजधानी और सेना के मुख्यालय के चलते ही नैनीताल को वैश्विक पहचान मिली ।नैनीताल में आधारभूत अधिसंरचनात्मक सुविधाओं का विकास हुआ।आजादी के बाद नैनीताल मंडल और जिला मुख्यालय बना रहा।अलग उत्तराखंड राज्य बनने से पहले यहाँ करीब तीन दर्जन राज्य एवं मंडल स्तरीय,करीब चार दर्जन से ज्यादा जिला स्तरीय और आधा दर्जन से अधिक भारत सरकार के दफ़्तर थे,इनमें से अधिकांश कार्यालय अन्यत्र स्थानांतरित हो चुके हैं।
आज उसी नैनीताल में कुछ लोगों को हाईकोर्ट का होना भी खटक रहा है। जबकि असलियत यह है कि नैनीताल की मौजूदा स्थिति यहां हाईकोर्ट के आने से नहीं हुई है।इसके लिए अनियोजित नियोजन जिम्मेदार है ।अगर नैनीताल को लेकर राजनैतिक इच्छाशक्ति प्रबल होती तो हालात इस कदर नहीं बिगड़ते।

(लेखक उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार के साथ ही साहित्यकारऔर इतिहासकार हैं उनकी कई पुस्तकें आजतक प्रकाशित हो चुकी हैं )