सप्तपुरियों में मायापुरी (हरिद्वार) का है विशेष महत्व

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अयोध्या मथुरामायाकाशीकांचीत्वन्तिका,
पुरी द्वारावतीचैव सप्तैते मोक्षदायिकाः।

कमल किशोर डुकलान

एकात्मकता स्तोत्र के तैंतीस श्लोकों में मोक्षदायिनी सप्ततपुरियों का विशेष उल्लेख है सप्त याने सात एवं पुरियों का अर्थ है नगर मान्यतानुसार भारत में सात ऐसे स्मरणीय स्थल हैं,जिन्हें मोक्षदायिनी सप्त पुरियों के नाम से जाना जाता है। हिन्दू धर्म में मोक्ष पाने को बेहद महत्व दिया जाता है। जहां इंसान को मुक्ति प्राप्त होती है। जो इंसान को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति देती है।शरीर त्यागना मनुष्य जीवन के लिए सभी मूल्यवान वस्तुओं से भी ऊपर है। इन मोक्ष दायिनी पुरियों में हरिद्वार का विशेष महत्व है। सप्तपुरियों में मायापुरी (हरिद्वार) तीसरे स्थान पर आता है। हरिद्वार शब्द हरि+द्वारा दो शब्दों के मेल से बना है। हरि शब्द से तात्पर्य है भगवान विष्णु और द्वारा से आशय है दरवाजा पतित पावनी मां गंगा के किनारे बसा शहर दुनिया के पवित्र शहरों में माना जाता है। इसे पौराणिक व्याख्या में ‘मायापुरी’ के नाम से भी पुकारा गया है। भगवान शिव के केशों से निकली गंगा नदी इस शहर की पवित्रता को और भी बढाती है। वर्षों से लोग मोक्ष प्राप्ति के लिए हरिद्वार के दर्शन करने आते हैं।

पाश्चात्कालीन हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार,हरिद्वार देश का ऐसा स्थान है जहाँ समुद्र मंथन के समय दैत्य-देवों के अमृत पाने के संघर्ष में अमृत कलश से कुछ अमृत की बूंदें भूल से घड़े से धरती पर गिर गयीं थी। मान्यता है कि जिन चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरी थीं। वे स्थान हैं:- उज्जैन, हरिद्वार,नासिक और प्रयाग। इन चारों स्थानों पर बारी-बारी से हर १२वें वर्ष महाकुम्भ का आयोजन होता है। एक स्थान के महाकुम्भ से तीन वर्षों के बाद दूसरे स्थान पर महाकुम्भ का आयोजन होता है। इस प्रकार बारहवें वर्ष में एक चक्र पूरा होकर फिर पहले स्थान पर महाकुम्भ का समय आ जाता है। पूरी दुनिया से करोड़ों तीर्थयात्री, भक्तजन और पर्यटक यहां इस समारोह को मनाने के लिए एकत्रित होते हैं और गंगा नदी के तट पर शास्त्र विधि से स्नान इत्यादि करते हैं।
मान्यता के अनुसार हरिद्वार के जिस स्थान पर अमृत की बूंदें गिरी थीं उसे हर की पौड़ी पर ब्रह्म कुण्ड माना जाता है। ‘हर की पौड़ी’ हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है और पूरे भारत से भक्तों और तीर्थयात्रियों के जत्थे त्योहारों या पवित्र दिवसों के अवसर पर स्नान करने के लिए यहाँ आते हैं। यहाँ स्नान करना मोक्ष प्राप्त करवाने जैसा माना जाता है।
हरिद्वार तीर्थ के रूप में बहुत प्राचीन तीर्थ है परंतु नगर के रूप में यह बहुत प्राचीन नहीं है। हरिद्वार नाम भी उत्तर पौराणिक काल में ही प्रचलित हुआ है। महाभारत में इसे केवल ‘गंगाद्वार’ ही कहा गया है। पुराणों में इसे गंगाद्वार,मायाक्षेत्र,मायातीर्थ,सप्तस्रोत तथा कुब्जाम्रक के नाम से वर्णित किया गया है। प्राचीन काल में कपिलमुनि के नाम पर इसे ‘कपिला’ भी कहा जाता था। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ कपिल मुनि की तपोस्थली रहा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगीरथ ने,जो सूर्यवंशी राजा सगर के प्रपौत्र इच्छाकु वंशीय श्रीराम के पूर्वज थे। मां गंगा जी को सतयुग में वर्षों की तपस्या के पश्चात् राजा सगर ने अपने 60 हज़ार पूर्वजों के उद्धार और कपिल ऋषि के शाप से मुक्त होने के लिए मां गंगा को धरती पर उतारा था।

कहते हैं,कि मां गंगा जब भगवान विष्णु के चरणों से प्रकट हुई तो सबसे पहले हरिद्वार में आयी,तब से हरिद्वार देवताओं और मानवों के लिए भी दुर्लभ श्रेष्ठ तीर्थ क्षेत्र बन गया। जो मनुष्य उस तीर्थ में स्नान तथा विशेष रूप से श्रीहरि के दर्शन करके उन की परिक्रमा करते हैं वह दुःख के भागी नहीं होते। वह समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ और धर्म, अर्थ,काम,मोक्ष रूप चारों पुरुषार्थ प्रदान करने वाला है। जहां अतीव रमणीय तथा निर्मल गंगा जी नित्य प्रवाहित होती हैं उस हरिद्वार के पुण्यदायक उत्तम आख्यान को कहने सुनने वाला पुरुष सहस्त्रों गोदान तथा अश्वमेध यज्ञ करने के शाश्वत फल को प्राप्त करता है।

गंगाद्वार (हरिद्वार) स्वर्गद्वार के समान है; इसमें संशय नहीं है। वहाँ एकाग्रचित्त होकर कोटितीर्थ में स्नान करना चाहिए। ऐसा करने वाला मनुष्य पुण्डरीकयज्ञ का फल पाता और अपने कुल का उद्धार कर देता है। वहाँ एक रात निवास करने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है। सप्तगंग,त्रिगंग,और शक्रावर्त तीर्थ में विधिपूर्वक देवताओं तथा पितरों का तर्पण करने वाला मनुष्य पुण्य लोक में प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर कनखल में स्नान करके तीन रात उपवास करने वाला मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल पाता और स्वर्ग लोक में जाता है।

हरिद्वार में ‘हर की पैड़ी’ के निकट जो सबसे प्राचीन आवासीय छतरी निर्मित ऐतिहासिक भवनों में इस क्षेत्र का सबसे प्राचीन निर्माण माना जाता है। इसके बाद इसकी मरम्मत वगैरह होती रही है।विगत लगभग तीन सौ – साढ़े तीन सौ वर्षों से यहां गंगा के किनारे मठ-मंदिर,धर्मशाला और कुछ राजभवनों के निर्माण की प्रक्रिया शुरु हुई। वर्तमान में हर की पैड़ी विस्तार योजना के अंतर्गत जम्मू और पुंछ हाउस और आनंद भवन तोड़ दिए गए हैं। उनके स्थान पर घाट और प्लेटफार्म विस्तृत कर बनाये गये हैं। इस प्रकार हरिद्वार में नगर-निर्माण की प्रक्रिया आज से प्रायः साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व प्रारंभ हुई; किंतु तीर्थ के रूप में यह अत्यंत प्राचीन स्थल है।

यहाँ का प्रसिद्ध स्थान ‘हर की पैड़ी’ है जहाँ गंगा का मंदिर भी है। हर की पैड़ी पर लाखों यात्री स्नान करते हैं और यहाँ का पवित्र गंगा जल देश के प्राय: सभी स्थानो में यात्रियों द्वारा ले जाया जाता है। प्रति वर्ष चैत्र में मेष संक्रांति के समय मेला लगता है जिसमें लाखों यात्री इकट्ठे होते हैं। प्रति बारह वर्षों पर जब सूर्य और चंद्र मेष राशि में और बृहस्पति कुंभ राशि में स्थित होते हैं तब यहां कुंभ का मेला लगता है। उसके छठे वर्ष अर्धकुंभ का मेला भी लगता है। इनमें कई लाख यात्री इकट्ठे होते और गंगा में स्नान करते हैं। यहाँ अनेक मंदिर और देवस्थल हैं। माया देवी में मंदिर पत्थर का बना हुआ है। संभवत: यह 10 वीं शताब्दी के आसपास का बना होगा।
लोगों का मत है कि यहाँ मरनेवाला प्राणी परमपद पाता है और स्नान से जन्म-जन्मांतर का पाप कट जाता है साथ ही परलोक में हरिपद की प्राप्ति होती है।प्रकृतिप्रेमियों के लिए हरिद्वार स्वर्ग जैसा सुन्दर है। हरिद्वार भारतीय संस्कृति और सभ्यता का एक बहुरूपदर्शन प्रस्तुत करता है।