बसंत पंचमी की शुभकामनाएं और बसंत पंचमी से जुड़ी हैं अनेकों घटनाएं

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वीर हकीकत राय के आकाशगामी शीश की याद में प्रतिदिन बसन्त पंचमी पर्व पर भारत ही नहीं अपितु लाहौर में रहता है सर्वाधिक पतंगबाजी पर जोर

कमल किशोर डुकलान

बसंत पंचमी का पर्व जहां हमें ऋतु परिवर्तन और प्रकृति में प्राकृतिक सौन्दर्यता आनन्दमूलकता की ओर दृष्टिगोचर करता है वहीं बसंत पंचमी का दिन पृथ्वीराज चौहान से मोहम्मद गौरी का सत्रहवीं बार में पराजय,धर्मरक्षा हेतु वीर हकीकत राय का बलिदान तथा कूका आन्दोलनकारियों का अंग्रेजी शासन में मुस्लिमों से संघर्ष जैसी अनेकों ऐतिहासिक घटनाओं की याद दिलाता है।

पृथ्वीराज चौहान ने विदेशी हमलावर मोहम्मद ग़ोरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए उसे हर बार जीवित छोड़ दिया, परन्तु जब सत्रहवीं बार पृथ्वीराज चौहान जब पराजित हुए,तो मोहम्मद ग़ोरी ने उन्हें नहीं छोड़ा।वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं। इसके बाद की घटना तो जगप्रसिद्ध ही है।मोहम्मद ग़ोरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर ग़ोरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया। तभी चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को संदेश दिया।

चार बांस चौबीस गज,
                      अंगुल अष्ट प्रमाण।
ता ऊपर सुल्तान है,
                       मत चूको चौहान ॥

पृथ्वीराज चौहान ने इस बार भूल नहीं की। उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंदबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण मारा, वह मोहम्मद ग़ोरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया। (1192) की यह घटना भी वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।

वसंत पंचमी के पर्व का लाहौर निवासी वीर हकीकत से गहरा संबंध है। एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये,तो सब बच्चे खेलने लगे, परन्तु वीर हकीकत पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने उसे छेड़ा,तो उसने दुर्गा मां की सौगंध दी। मुस्लिम बालकों ने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। हकीकत ने कहा कि यदि में तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं,तो तुम्हें कैसा लगेगा? बस फिर क्या था, मुल्ला जी के आते ही उन शरारती छात्रों ने शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। फिर तो बात बढ़ते हुए काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में वही निर्णय हुआ,जिसकी अपेक्षा थी।आदेश हो गया कि या तो वीर हकीकत राय मुसलमान बन जाये,अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत ने यह स्वीकार नहीं किया। परिणामत: उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया।कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी।

हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं,तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी, परन्तु उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। यह घटना वसंत पंचमी के ही दिन 23 फरवरी सन् 1734 को ही हुई थी। पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है, परन्तु हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वहां वसन्त पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। हकीकत लाहौर का निवासी था। अत: पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता है।वसंत पंचमी हमें गुरू रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है। उनका जन्म 1816 ई. में वसंत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे महाराजा रणजीत सिंह की सेना में रहे,फिर घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये, परन्तु राम सिंह कूका आध्यात्मिक प्रवृत्ति होने के कारण लोग उनके प्रवचन सुनने आने लगे। धीरे-धीरे इनके शिष्यों का एक अलग पंथ ही बन गया,जो कूका पंथ कहलाया।

गुरू रामसिंह,गोरक्षा,स्वदेशी,नारी उद्धार, अन्तरजातीय विवाह,सामूहिक विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे।उन्होंने भी सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिष्कार कर अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी।प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर भैणी गांव में मेला लगता था। 1872 में मेले में आते समय उनके एक शिष्य को मुसलमानों ने घेर लिया।उन्होंने उसे पीटा और गोवध कर उसके मुंह में गोमांस ठूंस दिया।यह सुनकर गुरू रामसिंह के शिष्य भड़क गये।उन्होंने उस गांव पर हमला बोल दिया,परन्तु दूसरी ओर से अंग्रेज सेना आ गयी। अत:युद्ध का पासा पलट गया।

इस संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद हुए और 68 पकड़ लिये गये। इनमें से 50 को सत्रह जनवरी 1872 को मलेरकोटला में तोप के सामने खड़ाकर उड़ा दिया गया। शेष 18 को अगले दिन फांसी दी गयी।दो दिन बाद गुरू रामसिंह को भी पकड़कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 1885 ई. में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।