अरुण कुकसाल
…घिमतोली से कनकचौंरी 8 किमी. है‌। वहां से पैदल 4 किमी. उत्तरी दिशा की ओर इसी पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर कार्तिक स्वामी मंदिर (समुद्रतल से ऊंचाई 3048 मीटर) है। वैसे कनकचौंरी से नागनाथ पोखरी होते हुए इस सड़क से गोपेश्वर पहुंचा जा सकता है। इस प्रकार रुद्रप्रयाग से गोपेश्वर जाने का यह एक वैकल्पिक मार्ग भी है‌।

घिमतोली से पहले घुमावदार सड़क के कारण लुकते-छिपते हिम शिखर अब हिमालय के विहंगम परिदृश्य के रूप में दिख रहे हैं। चौखंबा, पंचचूली, त्रिशूल, नंदा घुंघटी, कामेट, नंदा देवी आदि और भी हिमालयी शिखर अपने श्वेत वस्त्र में तैनात हैं।

‘यहां बरफ ऐसे ही रहती हैं? 7 वर्षीय शाश्वत ने पूछा।
‘हां’ बेटा यहां हमेशा बर्फ रहती है।’ उसकी मम्मी नीतू ने जबाव दिया।
‘वहां के लोगों को ठंड नहीं लगती?’ शाश्वत का प्रश्न है।
‘वहां लोग नहीं, भगवान रहते हैं।’ नीतू ने कहा।
‘कौन से भगवान? शाश्वत का फिर प्रश्न है।
‘शिव-पार्वती’ नीतू कहती है।
‘शिव-पार्वती को ठंड नहीं लगती क्या?’ शाश्वत का प्रश्न जारी है।
‘नहीं बेटा, वो ठंड से ऊपर हैं’ नीतू कहती है।
‘कितना ऊपर?’ शाश्र्वत बोला ही था कि नीतू उसे सड़क पर बाइक घसीटते लड़के की ओर ध्यान बंटाने का प्रयास करने लगती है। बच्चों के प्रश्नों से पीछा छुड़ाने की महारथ मां के पास ही रहती है।

सौम्या का यह प्रश्न है कि ‘कार्तिकेय भगवान कौन हैं? इस पर धर्म-मर्मज्ञ दीना जी का प्रवचन हम-सबका ज्ञान बढ़ा रहा हैं। वो बता रही है कि ‘शिव-पार्वती के बड़े पुत्र कार्तिकेय और छोटे पुत्र गणेश हैं। कार्तिकेय का वाहन मोर और गणेश का वाहन चुहा है। एक बार शिव-पार्वती की आज्ञानुसार ब्रह्माण्ड परिक्रमा करके सबसे पहले माता-पिता के सम्मुख पहुंचने की दोनों भाइयों में प्रतियोगिता हुई। कार्तिकेय संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा करके अपने माता-पिता के पास पहुंचे ही थे कि उन्हें मालूम चला कि गणेश जी को पहले ही विजेता घोषित किया जा चुका है। क्योंकि गणेशजी ने शिव-पार्वती के चारों ओर परिक्रमा करके यह विश्वास दिला दिया कि मां-पिता के चरणों में ही संतान का संपूर्ण ब्रह्मांड है। कार्तिकेय जी ने इसे अपने प्रति अन्याय माना। इसके प्रतिकार स्वरूप उन्होंने अपने शरीर से मांस और हड्डियां अलग कर दी थी। उसके बाद हड्डी शिव और मांस पार्वती के चरणों में समर्पित कर दिया। ऐसा करके उन्होंने यह संदेश दिया कि यह शरीर माता-पिता से ही मिला है। अतः अब मैं उस ऋण से मुक्त हो गया हूं। परन्तु माता-पिता को हमेशा देखते रहने का मोह कार्तिकेय नहीं छोड़ पाये। इस कारण इसी क्रौंच पर्वत की चोटी पर जिस पर हम चल रहे हैं मैं वे हिमालय में शिव-पार्वती को निहारते हुए प्रतिष्ठित हो गये।’

‘ये तो बिल्कुल ग़लत बात है। कार्तिकेय भगवान के साथ उनके ही माता-पिता ने अन्याय किया‌। अब मैं समझी, आज के मम्मी-पापा ही नहीं भगवान भी अपने बच्चों के साथ भेदभाव करते रहे हैं।’ सौम्या की आवाज़ में तेजी है। ‘अरे ऐसा कुछ नहीं। ये तो भगवान की माया है’ दीना जी सौम्या को मनाने की कोशिश में हैं। ‘भगवान की माया-वाया जो भी है पर हुआ तो गलत’। मैं भी बहस के बीच में आ गया। ‘अब तुम बच्चों को और भड़काओ।’ दीना जी मेरी ओर मुखातिब हैं। ‘असल बात तो यह है कि समाज में बहुचर्चित ‘गणेश परिक्रमा’ शब्द इसी किंवदंती से उपजा होगा। तभी तो आज के जमाने में भी ‘गणेश परिक्रमा’ करने वाले लोगों का ही बोलबाला है। कार्तिकेय भगवान जैसे मेहनती और सीधे-सादे इंसान गुमनामी में ही रहते हैं।’ मैं बोला। परन्तु इस डर से कि बात ज्यादा आगे न बढ़े, मैं यह कहते हुए कि ‘सामने देखो ! बच्चों ये कनकचौंरी और उसकी ऊपर धार पर कार्तिकेय मंदिर है। बोलो ! कार्तिकेय भगवान की जय।’ जय का नारा सामुहिक रूप में गाड़ी में जो गूंजा तो पिछली बातें उसी में समा गई।

कनकचौंरी में गाड़ी से उतरने पर मैं बच्चों से कहता हूं कि ‘गाड़ी की सेवाएं खत्म, अब पैदल चलना है। ‘कहां?’ शाश्वत कहता है। मैं उसकी मुंडी ऊपर पहाड़ की चोटी पर दिख रहे कार्तिक स्वामी मंदिर की ओर करके कहता हूं ‘वहां’। ‘हे बाप रे!’ सौम्या की प्रतिक्रिया है पर शाश्वत का कहना है कि वह एक ही लपाक में वहां पहुंच जायेगा। इसी उत्साह में वह सबसे आगे उछलता हुआ चल रहा है। उस नादान को नहीं मालूम 4 किमी. तीखी चढ़ाई वो भी भारी बर्फ में चलना कितना मुश्किल होता है?

इस यात्रा में आने से पूर्व कनकचौंरी के बारे में मित्र डॉ. योगेन्द्र कांडपाल ने बताया था कि इस जगह के यत्र-तत्र छोटे-छोटे पोखरों (चौंरी माने-बित्ते भर के तालाब-पोखर जिसमें इधर-उधर का पानी रुका रहता है।) में हिमालय को छूकर आने वाली सूर्य की किरणें स्वर्णिम (कनक माने-सोना) आभा देती हैं। इस कारण इस स्थल का नाम कनकचौंरी पड़ा। कनकचौंरी में मानवीय बसावट ज्यादा पुरानी नहीं लगती है। सड़क के दोनों तरफ नयी शैली के कुछ दुकाननुमा भवन हैं। सड़क से नीचे पांच-छः टैंट कमरे दिख रहे हैं। साथ चल रहे सज्जन स्थानीय हैं। वे बताते हैं कि हम इस समय क्रौंच पर्वत की धार ही धार (पहाड़ की लम्बी पीठ) पर चल रहे हैं। हमारे बांये मंदाकिनी घाटी और दांये अलकनंदा घाटी है। इस प्रकार क्रौंच पर्वत मंदाकिनी और अलकनंदा घाटी का मिलन-सीमा रेखा है। कार्तिक स्वामी मंदिर (समुद्रतल से ऊंचाई 3048 मीटर) इसी क्रौंच पर्वत के सबसे ऊंचे शिखर पर है।

वक्राकार चढ़ाई में चढ़ते हुए जमीन पर गिरी बर्फ की परत ज्यादा गहरी होती जा रही है। लोगों के जाने-आने से रास्ते की बर्फ सख्त होकर फिसलने का निमंत्रण दे रही है। रास्ते के आगे-पीछे गिरते-फिसलते यात्रियों दृश्य दिखते जा रहे हैं। लक-दक पेडों से हमारे सिर पर गिरती बर्फ की फुहार चौंका देती है।

बर्फ से ढके घने जंगल की तीखी पगडंडी के खुलते ही समतल बुग्याल स्वागतार्थ है। यहां पेड़ों की जगह मखमली घास है। बर्फ भी यहां अब सिमटी और टुकड़े-टुकडे में है। पर्यटन विभाग के सूचना पटल पर कार्तिक स्वामी के बारे में जानकारियां हैं। पास ही धर्मशाला और पुजारी कक्ष लिखा एक लम्बा दुमंजिला भवन है।

एक महिला और एक बच्चा और एक छोटा कुत्ता आस-पास हैं। बच्चे से पूछता हूं इस कुत्ते का क्या नाम है? ‘बरफी’ बच्चा शरमाते हुए बोलता है। ‘वाह ! बर्फ में रहने वाला डोगी ‘बर्फी’ प्यारा नाम है’ सौम्या उसको पुचकारने लगी है। और तुम्हारा क्या नाम है? मैं बच्चे से कहता हूं। ‘दिल बहादुर’ बच्चा झट से कहता है। स्कूल जाते हो? पूछने पर वह मेरी तरफ़ एकटक देख रहा है कि ये क्या पूछ लिया आपने? तभी महिला कहती है कि यहां कहां स्कूल है? इसके मां-पिता ऊपर मंदिर में मजदूरी करने गए हैं। मेरे भरोसे इसे छोड़ गए हैं। ‘ओह’ मैं यही कह पा रहा हूं। यह महिला यहां पर चाय-नाश्ते और पूजा-सामग्री की दुकान चलाती है।

यहां से अब आगे की पहाड़ी एकदम संकरी हो गई है। चट्टान को काट-काट कर चलने के लिए सीढ़ियां बनी हैं। पेड़ और घास अब नदारद हैं। सिमटे पहाड़ के सिर पर भीमकाय चट्टानें मजे से चुपचाप खड़ी हैं। आने-जाने वालों को उनसे डर लगे तो उनका क्या दोष? सांय-सांय तेजी से बहती हवा में अब ठंडक और तीखी लग रही है। अचानक मंदाकिनी घाटी से क्रिकेट कामेटंरी की आती आवाज ने आश्चर्य में डाल दिया है। साथी सज्जन बता रहे हैं कि वो नीचे की ओर घिंघतोली है, वहां क्रिकेट मैच हो रहा होगा। पहाड़ों में बंद घाटी की आवाज़ बहुत दूर तक सुनाई देती है। मैं थोड़ा रुक कर उस ओर देखता हूं जहां से हम आ रहे हैं। लगा सांप-सीढ़ी खेल के अंतिम पड़ाव पर हम पहुंचे हैं।

पास वाली चट्टान से नेपाली श्रमिक पत्थर निकाल कर अपनी पीठ पर रखकर मंदिर प्रांगण में ले जा रहे हैं। हम खाली हाथ होकर भी मंदिर की सीढ़ियों पर डरते-डरते चढ़ रहे हैं। वहीं ये बहादुर पुरुष-स्त्री भारी पत्थरों के बोझ के साथ भी बेख़ौफ़ आ-जा रहे हैं।‌ मैं सोच रहा हूं रास्ते में मिले दिल बहादुर के मां-बाप भी इन्हीं मजदूरों में होकर भगवान के मंदिर को सुंदर बनाने के लिए मज़दूरी कर रहे हैं। तो दूसरी तरफ वो दिल बहादुर बच्चा आने वाले समय में किसी और मंदिर को बनाने के लिए मजदूर बन रहा है। सरकार और समाज का जनकल्याणकारी चेहरा यहीं ज्यादा फीका नज़र आता है।

कार्तिक स्वामी मंदिर में प्रतिस्थापित पत्थर सफेद चिन्ह की आकृति लिए हुए है। कार्तिकेय जी ध्यान मग्न मुद्रा में यहां विराजमान हैं। चारों ओर से हिमालयी हिमशिखरों से घिरा यह क्रौंच पर्वत का शीर्ष स्थल है। कार्तिकेय जी ने इसीलिए यह स्थल चुना ताकि हिमालय में विराजमान अपने माता-पिता को वह हर दिशा में निहारते रहें।

मंदिर के पुजारी कल्ली गांव (बचणस्यूं) के नरेन्द्र पुरी जी हैं। वे बताते हैं कि ‘प्राचीन काल से यहां कार्तिकेय जी की पूजा होती आई है। परन्तु उनकी जानकारी से सन् 1872 में उनके परदादा नर्मदा पुरी यहां पुजारी बने। उसके बाद उनके दादा गोविंद पुरी और फिर पिता फते पुरी पुजारी रहे। कार्तिक स्वामी मंदिर साल भर यात्रियों के लिए खुला रहता है।’

मंदिर के पीछे के ओर की पहाड़ी की धार नीचे की ओर है। क्रौंच पक्षी की लम्बी चोंच की तरह। यहां से मंदाकिनी नदी नीचे बहुत नीचे खिंची एक पतली नीली लकीर जैसे दिख रही है।‌ सरपट भागती मंदाकिनी में कोई हलचल नजर नहीं आ रही है। हिमालयी पारिस्थितिकी की संपूर्णता की झलक को यहां से बखूबी देखा जा सकता है। चोटी में बर्फ, फिर बुग्याल, जंगल, मानवीय बसावट और तल पर नदी।

दीना जी का आदेश है कि तुरंत वापसी हो। बादलों की आवाजाही और गड़गड़ाहट बता रही है कि मौसम बदलने वाला है। देखते ही देखते मंदाकिनी और अलकनंदा घाटी में पसरे बादल ऊपर की ओर ऊधम मचाते हुए आने लगे हैं। दोपहर बाद ऊंचे पहाड़ी इलाकों में ये रोज का आलम हुआ। वापसी करते हुए धर्मशाला के आंगन में दिल बहादुर अपने साथी बर्फी के साथ खेलता दिखता है। उसके पास गुजरते हुए वो अपना खेल रोककर चुपचाप मेरी तरफ़ एकटक देखता जा रहा है, पर मैं उससे नजरें नहीं मिला पा रहा हूं। कारण आप भी जानते हैं।

फोटो-अमन कुकसाल
यात्रा के साथी-
दीना कुकसाल, आशीष घिल्डियाल नीतू घिल्डियाल अमन कुकसाल, सौम्या घिल्डियाल, शाश्र्वत घिल्डियाल.
11 जनवरी, 2020