हथेली पर आम उगाने की मशीन नहीं हैं मीडिया के रिपोर्टर

0
383

डिजीटल के दौर में पहले हम, पहले हम.की स्पर्धा में रिपोर्टर से अपेक्षा पहले से ज्यादा बढ़ी है 

आपको डेस्क का काम तभी संभालना चाहिए, जब आप रिपोर्टिंग में पेश आने वाली चुनौतियों का कई बार सामना कर चुके हो

आप रिपोर्टर हैं सुपरमैन नहीं। पर, संपादक से लेकर डेस्क तक के कुछ साथियों की नजर में आप सुपरमैन हैं, तभी तो, कभी भी आपसे कुछ कंटेंन्ट मांगा जा सकता है। भरी गर्मियों में एयरकंडीशन्ड कमरों में विराजमान संपादक, समाचार संपादक और डेस्क के वो साथी, जिनका कभी रिपोर्टिंग से वास्ता नहीं रहा, रिपोर्टर से उम्मीद करते हैं कि वो आधा घंटे में उनके बताए अनुसार तथ्यों को विद्प्रूफ परोस दे। डिजीटल के दौर में पहले हम, पहले हम.की स्पर्धा में यह अपेक्षा पहले से ज्यादा बढ़ी है। ऐसे में गलत सूचना और हवाई आंकड़ों की आशंका बढ़ जाती है।
मैं यह बताने की कोशिश कर रहा हूं कि आपको डेस्क का काम तभी संभालना चाहिए, जब आप रिपोर्टिंग में पेश आने वाली चुनौतियों का कई बार सामना कर चुके हों। इससे फायदा यह होगा कि आप रिपोर्टर को सुपरमैन नहीं समझोगे और खबरों के लिए उन्हीं तथ्यों की मांग करोगे, जो जुटाए जाने संभव हों। इससे आपको किसी भी पैकेज के लिए प्लान करना आसान होगा। इससे डेस्क और रिपोर्टिंग के बीच अखबार की बेहतरी के लिए समन्वय बना रहेगा। सोशल मीडिया के दौर में रिपोर्टिंग जहां पहले की तुलना में आसान हुई है, वहीं इससे अपेक्षाएं भी बढ़ गई हैं। सोशल मीडिया पर इन्फारमेशन की बाढ़ है, जिसने इसके बहाव को समझ लिया, वो बच गया, नहीं तो डूबना तय है।
सोशल मीडिया पर इन्फारमेशन के बहाव को समझने का मतलब है कि आपको जानना होगा कि कौन सी सूचना तथ्यों के साथ है और कौन सी मनगढ़ंत। इसके लिए आपको स्रोत तक जाना होगा। सूचना से संबंधित, अनुभवी और जानकार लोगों से बात करनी होगी। अगर सूचना गलत है तो भी आपको बताना होगा कि क्यों गलत है। यह अलग तरह का टास्क है।
अब आपसे एक किस्सा साझा करता हूं, जब हथेली पर आम उगाने को कहा गया। खबर की मिसिंग से संपादक और संबंधित डेस्क कम, उनके आसपास मौजूद रहने वाले ज्यादा परेशान हो जाते हैं। संपादकों को पता रहता है कि अखबार तो रोजाना निकलता है, कभी हमारे यहां कोई खबर मिसिंग होगी और कभी प्रतिद्वंद्वी अखबार में। यह बात सभी को मालूम होती है, पर कुछ लोग किसी खास मिसिंग को लेकर रिपोर्टर, खासकर उनके इंचार्ज के पीछे पड़ जाते हैं। ये वो लोग होते हैं, जिनका रिपोर्टिंग से कभी कोई वास्ता नहीं रहता। वैसे तो इनका डेस्क से भी कोई मतलब नहीं होता। अगर ये दफ्तर न भी आएं तो अखबार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला।
कभी कभी तो किसी खबर की मिसिंग पर संपादकीय टीम से ज्यादा दुखी चेहरा मीडिया मार्केंटिंग वाले दिखाते हैं। उस समय वो पूरी तरह से यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि रिपोर्टिंग और डेस्क से ज्यादा खबरों की चिंता उन्हीं को है। इसकी वजह अखबारों का सर्कुलेशन कम होने का ठीकरा रिपोर्टिंग टीम और डेस्क के सिर फोड़ना है। उस समय बड़ा दुख होता है, जब दो लाइन भी ढंग से नहीं लिख पाने वाले, पूरे अखबार की समीक्षा करते हैं। इस पर भी विस्तार से बात करेंगे।
हां, तो मैं किस्सा बता रहा था। हरिद्वार में एक बड़ी खबर मिसिंग हुई, जो प्रतिद्वंद्वी अखबार के पेज वन की लीड थी। यह खबर, छूटने का काफी दुख था। जनवरी माह की सुबह छह बजे, रविवार को देहरादून से किसी ने अपने घर से ही फोन किया। उनके शब्द थे, आज तो भयंकर गलती कर दी। मैं उनकी आदत से वाकिफ था और मैंने अखबार भी नहीं देखा था। मैंने पूछा, क्या हो गया। वो बोले, संपादक जी बहुत नाराज हैं, बात कर लो।
मैंने सोचा, सुबह छह बजे, संपादक को देहरादून में किसने हरिद्वार का अखबार दिखा दिया। संपादक ने इन शख्स से क्यों नाराजगी व्यक्त की। वो तो किसी भी खबर पर सीधा मुझसे बात करते हैं। वैसे भी इन शख्स का हमारे संस्करण से सीधा वास्ता नहीं है। खैर, कोई बात नहीं,इंचार्ज होने के नाते गलती मेरी है,इसलिए जवाबदेही भी मेरी बनती है।
संपादक को फोन किया तो जवाब मिला, अभी पहुंच जाओ खनन वाले इलाकों में, जाकर देखो, कहां-कहां अवैध खनन हो रहा है। फोटो के साथ, मुझे पूरा एक पेज चाहिए। मैंने कहा, ठीक है एक पेज मिलेगा और फोटो भी।
सुबह तो खराब हो गई थी। रिपोर्टर्स और उनके टीम इंचार्ज के साथ अखबारों में अक्सर ऐसा होता है। अब तो दिन से उम्मीद थी कि अच्छा होगा। फोटोग्राफर मंझे हुए हैं, मैंने उनको फोन किया। उन्होंने कहा, मैं तैयार हूं। आप हरिद्वार पहुंचो। मैं रास्ते में ही मिल जाऊंगा। सच बताऊं, मैंने गंगा के वो इलाके कभी नहीं देखे थे। मुझे टीम पर पूरा विश्वास था।
डोईवाला से जैसे ही हरिद्वार के लिए आगे बढ़ा तो एक फोन आया। अभी पहुंचे नहीं। मैंने कहा, रास्ते में हूं। फिर पूछा, कब पहुंचोगे। मैंने कहा, एक घंटा लगेगा। आपको चार बजे तक पूरा मैटर और फोटोग्राफ मिल जाएंगे। उन्होंने निर्देश दिए, वहां सभी जगह रिपोर्टर तैनात कर दो। मेरा सब्र टूट गया, मैंने कहा, गंगा के किनारों पर जिन इलाकों की बात कर रहे हैं, वो हरिद्वार शहर से साठ किमी. के दायरे में हैं। उनका जवाब मुझे आज भी याद है। हो भी क्यों नहीं, जो बात आपको बुरी लगती है, वो याद रहती है। उनका कहना था कि एक तो खबर छोड़ दी और फिर जले पर नमक छिड़क रहे हो।
मैंने यह सोचकर फोन काट दिया कि देखा जाएगा। मैं रास्ते भर प्लानिंग करता रहा कि एक पेज में क्या लिखा जाएगा। सभी रिपोर्टर से बात करके उनको आफिस में ही बैठकर डाटा इकट्ठा करने और अपनी बीट से संबंधित लिखने को कहा। पहले आफिस जाने से ज्यादा अच्छा समझा कि आज गंगा के किनारों की सैर की जाए। हरिद्वार शहर से आगे बढ़ते हुए गंगा का विशाल स्वरूप देखा जाए। फोटोग्राफर साथी के साथ लक्सर रोड से होते हुए पदार्था और फिर वहां से पथरी, गंगाभोगपुर, विशनपुर कुंडी सहित कई इलाकों में फोटोग्राफी करते हुए ऊंचाई वाले बंधों से होते हुए जीभर कर मां गंगा का विशाल स्वरूप देखा। हमने पथरी वाले रिपोर्टर की भी मदद ली। सच मानो, जनवरी की सुबह कोहरे से ढंका इलाका और बालू से पटे उबड़ खाबड़ रास्ते हमें जोखिम के साथ किसी रोमांचक सफर पर ले जा रहे थे।
मैं महसूस करता हूं रिपोर्टर और फोटोग्राफर को पहले अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। ठीक है उनका काम खबरों और फोटोग्राफ का संकलन करना है, पर यह तो तभी हो पाएगा, जब वो सुरक्षित रहेंगे। रिपोर्टिंग का आनंद लेना चाहिए। मैं आज सोचता हूं कि अगर वो खबर मिसिंग नहीं होती, इतना ज्यादा दबाव नहीं होता तो मैं जिस रिपोर्टिंग का जिक्र कर रहा हूं, वो शायद नहीं की होती। हालांकि जोखिम बड़ा था। हम लोग ठीक तीन बजे तक अपने दफ्तर में थे। हमारे कपड़े मिट्टी से सने थे। चाय की तलब लगी थी। चाय पी और एक छोटी सी मीटिंग के बाद खबरें लिखने में जुट गए।
कुछ खबरें साथियों ने पहले से तैयार रखी थीं और तीन या चार खबरें मैंने लिखीं और फिर फोटोग्राफ। एक पेज का मैटेरियल और फोटोग्राफ शाम पांच बजे तक डेस्क के हवाले। टास्क पूरा, केवल एक पेज का। अखबार का पेट भरने के लिए फिर आठ बजे तक और खबरों पर काम किया।
हर रिपोर्टर के पास पास डाटा बैंक होना चाहिए, जो एक क्लिक पर सामने हो। तिथिवार संबंधित घटनाओं का रिकार्ड, जिसे वैल्यू एडिशन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।
खबरें भेजकर सूचना दे दी गई। दूसरे दिन हमारे एक पेज की मेहनत पर हमारे हिसाब से पानी फेरा हुआ मिला। जिसे पेज बनाने को दिया था, उसको केवल खबरें चिपकाने से मतलब था। मात्र दो फोटोग्राफ के साथ पूरा पेज पोत दिया गया था। इस तरह के आकर्षणहीन तथा खबरों के महत्व को नकारे जाने को अखबार वाले पेज पोतना कहते हैं। न तो पेज का कोई ले आउट था और न ही कोई फोटोग्राफ तरीके से लगाया। जबकि किसी भी फुल पेज पैकेज की आत्मा उसकी फोटो में बसती है। उस दिन हमने पूरी टीम की मदद से हथेली पर आम उगा कर दिया था, पर हमें क्या पता था कि इनको आम की नहीं, गुठली की समझ है। रिपोर्टिंग और डेस्क की बहुत सारी बातें हैं, जो जारी रहेंगी।
अखबारों के ये किस्से बताने का मतलब यह कतई नहीं है कि जर्नलिज्म में प्रवेश करना सही नहीं है। जर्नलिज्म स्वयं में व्यापक है और ये किसी संस्थान की मोहताज नहीं है। ये आपको खुले आसमान या कहें अंतरिक्ष की अनंतता तक सोचने और वाकई कुछ रचनात्मक और अभिनव करने का अवसर देती है। ये तो कुछ अनुभव हैं, जो आपको चमक दमक वाले आवरण के साथ चुनौतियों भरे टास्क से मिलवाते हैं।

-राजेश पांडेय की फेसबुक वॉल से