देहरादून। भाजपा में मुख्यमंत्री को लेकर चल रही जद्दोजहद के बीच सूत्रों की माने तो त्रिवेंद्र रावत का नाम सबसे आगे चल रहा है। उसके बाद प्रकाश पन्त व  सतपाल महाराज का नाम भी चर्चा में है। यानि उत्तराखंड का अगला मुख्यमंत्री कोई रावत ही बनेगा। भाजपा को उत्तराखंड में पहली बार प्रचंड बहुमत मिला है। भाजपा ने अभी यह तय नहीं किया है कि राज्य का मुख्यमंत्री कौन होगा। इस संबंध में भाजपा गहन मंथन कर रही है।

सूत्रों की मानें तो उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री के रूप में संघ से जुड़े त्रिवेंद्र रावत का नाम सबसे आगे चल रहा है। त्रिवेंद्र रावत साफ सुथरी छवि के भाजपा नेता हैं और उनका नाम काफी पहले से चर्चा में है। त्रिवेंद्र रावत पूर्व में मंत्री रह चुके हैं। सूत्रों की मानें तो त्रिवेंद्र रावत भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष  अमित शाह की पहली पसंद हैं। हालांकि पूर्व रेल राज्यमंत्री सतपाल महाराज का नाम भी मुख्यमंत्री के दावेदारों की सूची में है। बताया जाता है कि महाराज ने चुनाव से पहले से ही अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए प्रयास शुरू कर दिए थे। उनकी छवि भी बेदाग है। यूं तो पार्टी के भीतर चर्चाएं हैं कि भगत सिंह कोश्यारी की नजर भी मुख्यमंत्री पद पर लगी है, मगर पार्टी के ही सूत्र बताते हैं कि कोश्यारी को शायद ही उत्तराखंड में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने का मौका मिले।

यूं तो भाजपा में मुख्यमंत्री के लिए रटे रटाए नाम जिस तरह से उछाले जा रहे, उनमें से किसी को भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाने की संभावना क्षीण ही नजर आती है। सबसे बड़ा सवाल आलाकमान के सामने यह होगा कि जिसे भी उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, उसका नाम सत्ता के गलियारों में किसी भी तरह नहीं जुड़ा होना चाहिए। उल्लेखनीय रहे कि भाजपा ने उत्तराख्ंाड का चुनाव ‘न भय न भ्रष्टाचार, भाजपा सरकार अबकी बार लोगो के साथ लड़ा, और ऐसे में माना जा रहा कि जनता को भय और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार का जुमला पसंद आया।

अब जबकि जनता से भाजपा को भारी बहुमत के साथ जीत दिला दी है तो ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व कहीं से भी नहीं चाहेगा कि ऐसे चेहरे को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया जाए, जिसका नाम पूर्व में भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ हो। ऐसे में देखा जाए तो विधानसभा अध्यक्ष रह चुके वरिष्ठ नेता प्रकाश पंत का नाम पहले पायदान पर अपने आप ही दिखाई पड़ रहा। हालांकि मुख्यमंत्री को लेकर किसी भी नाम पर एकराय बनाना अभी जल्दबाजी ही होगी। बहरहाल यह भी स्पष्ट है कि भले ही उत्तराखंड  में विपक्षी विधायकों की संख्या कांग्रेस और निर्दलीयों को मिलाकर फिलहाल 13 की हो, मगर भाजपा कहीं से भी विरोधियों को मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार को लेकर पार्टी की नीतियों पर सवाल उठाने का मौका नहीं देना चाहेगी।

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