डीएम ने एसएसपी को पत्र लिखकर रिपोर्ट दर्ज कराने के दिए निर्देश

क्षेत्रीय अधिकारी उत्तराखंड राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण देहरादून की भी संलिप्तता

भूमि स्वामी भी दोषी  जिन्होंने अधिक मुआवजा लेने के लिए अभिलेखों में कराई छेड़छाड़

रुद्रपुर(उधमसिंह नगर )। जिलाधिकारी चंद्रेश यादव ने नेशनल हाइवे के चौड़ीकरण के लिए अधिग्रहीत की गई भूमि के एवज में हुए 118 करोड़ के घोटाले के संबंध में एसएसपी को तहरीर सौंप दी है, जिसमें चकबंदी कार्यालय, 143 करने वाले एसडीएम, तहसीलदार व उनके अधीनस्थ कर्मचारी, परियोजना निदेशक एनएच नजीबाबाद व रुद्रपुर एवं क्षेत्रीय अधिकारी उत्तराखंड राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण देहरादून की संल्पितता होना दर्शाया गया है। जिलाधिकारी ने इस मामले की विवेचना के लिए एसआईटी गठित करने की सिफारिश की है।

जिलाधिकारी ने पत्रकारों से वार्ता करते हुए बताया कि नेशनल हाइवे के भूमि अधिग्रहण में कृषि योग्य जमीनों को अकृषक कराकर दस गुना अधिक मुआवजा लिया गया है। बताया कि इसमें सबसे पहले भूमि स्वामी दोषी हैं, जिन्होंने अधिक मुआवजा लेने के लिए अभिलेखों में छेड़छाड़ कराई। कृषि की भूमि को अकृषक करने के लिए पटवारी, कानूनगो से लेकर तहसीलदार व एसडीएम उनके रीडक व पेशकार दोषी हैं। इसके साथ ही जहां चकबंदी चल रही है वहां चकबंदी अधिकारी व सहायक चकबंदी अधिकारी दोषी हैं। इसके अलावा परियोजना निदेशक रुद्रपुर व नजीबाबाद व उनके अधीनस्थ दोषी हैं, जिन्होंने एसएएलओ के आदेश का पालन किया, जबकि उन्हें राजस्व क्षति बचाने के लिए आर्विटेटर के पास जाना चाहिए था।

डीएम ने बताया कि क्षेत्रीय अधिकारी उत्तराखंड राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण देहरादून की भी संलिप्तता पाई गई है, क्योंकि उन्होंने मुआवजा राशि उन किसानों की रिलीज की जिन किसानों ने कृषि भूमि को अकृषि कराकर अधिक मुआवजा लिया। डीएम का कहना है कि 90 फीसदी लोगों के बजाय 10 फीसदी लोगों को प्राथमिकता दी गई। जिलाधिकारी ने बताया कि अभियोजन अधिकारी की सलाह के अनुसार भारतीय दंड विधान की धारा 167, 218, 219, 409, 420, 465, 466, 467, 468, 471, 474, 120 बी तथा धारा 34 के तहत प्रथम दृष्टया अपराध पाते हुए उनके खिलाफ तहरीर एसएसपी को भेजी गई है। साथ ही इस मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित करने का अनुरोध किया गया है। जिलाधिकारी ने बताया कि आयुक्त की जांच रिपोर्ट के बाद शासन ने इस मामले में एफआईआर कराने के निर्देश दिए थे।

बाजपुर के ग्राम हरलालपुर व बिचपुरी की पत्रावलियां कब्जे में लीं
जिलाधिकारी चंद्रेश यादव ने नेशनल हाइवे 74 के मुआवजे में हुए घोटाले की फाइलें खंगालने के बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सेंथिस अबुदई को पत्र लिखकर रिपोर्ट दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने नैनीताल ऊधमसिंह नगर भूमि अध्याप्ति अधिकारी के दफ्तर से बाजपुर तहसील के दो गांवों की फाइलों को खंगाला। इन गांवों में बैकडेट में 143 हुई है, जिनका भुगतान 2015 में हो चुका है।
प्रशासनिक अधिकारियों में इस वक्त एनएच 74 का घोटाला ही चर्चा का विषय बना हुआ है। जिलाधिकारी चंद्रेश यादव ने गत दिवस एसएएलओ के दफ्तर पहुंच कर ग्राम हरलालपुर व बिचपुरी की पत्रावलियों की जांच की।

सूत्रों की मानें तो जिस वक्त नेशनल हाइवे का गजट नोटिफिकेशन हुआ था तो इन गांवों से ली जा रही भूमि कृषि दर्शायी गई थी। इसके बाद आपत्ति के वक्त पर भी किसी किसान ने आपत्ति दर्ज नहीं कराई। बाद में बैक डेट में इन गांवों की उन जमीनों की 143 कर दी गई जो एनएच के थ्री एक के वक्त कृषि भूमि दर्शायी गई। इन जमीनों का दस गुना मुआवजा वर्ष 2015 में तत्कालीन एसएएलओ ने रिलीज किया। सूत्रों की मानें तो इन पत्रावलियों में काफी अनियमितताएं पाई गई हैं। 143 होने के बाद परवाना सालों तक दबा रहा। हालांकि ऐसे तमाम प्रकरण हैं जिन पर जांच चल रही है। सभी तहसीलों में 2011 के बाद से हुई 143 की पत्रावलियों को सूचीबद्ध किया जा रहा है। इनमें खासतौर पर उन पत्रावलियों को अलग किया जा रहा है जो नेशनल हाइवे के चौड़ीकरण से जुड़ी हैं। जिलाधिकारी श्री यादव ने एसएएलओ डीपी सिंह के साथ बंद कमरे में करीब दो घंटे तक बातचीत की। बताते हैं कि उन्होंने मुआवजे में हुए खेल पर ही चर्चा की।

पुलिस के पाले में डालना चाहते हैं गेंद
एफआईआर की तैयारी में जुटे अफसर

मुख्य सचिव एम रामास्वामी के निर्देश पर 118 करोड़ के मुआवजा घोटाले में एफआईआर की तैयारी चल रही है। सूत्रों की मानें तो एफआईआर सिर्फ जांच के आधार पर कराने की योजना है। इसमें कौन अफसर और कर्मचारी दोषी हैं यह पुलिस की विवेचना से तय होगा। यानि प्रशासनिक अधिकारी इस मामले में गेंद पुलिस के पाले में डालना चाहते हैं।

गौरतलब है कि आयुक्त डी सेंथिल पांडियन की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट मिलने पर मुख्य सचिव एम रामास्वामी ने निर्देश दिए हैं कि भूमि का गलत तरीके से उपयोग बदलने और दस गुना अधिक मुआवजा दिलाने वाले अफसरों को चिह्नित करके उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई जाए। हालांकि 143 की तिथि से आसानी से यह पता लगाया जा सकता है कि उस तिथि में संबंधित तहसील में कौन एसडीएम और तहसीलदार तैनात था। किसने परवाने पर हस्ताक्षर किए। आयुक्त ने प्रारंभिक जांच में कई मामले पकड़ लिए हैं।

सूत्रों की मानें तो जिला प्रशासन के अधिकारी जांच रिपोर्ट को ही आधार बना कर रिपोर्ट दर्ज कराने की योजना बना रहे हैं, जिसमें किसी अधिकारी कर्मचारी को नामजद नहीं किया जाएगा। पुलिस की विवेचना में यह उजागर होगा कि किन किन अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने फर्जीवाड़ा किया है। प्रशासनिक अधिकारी खुद को बचाते हुए गेंद पुलिस के पाले में फेंकना चाहते हैं।

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