जानिए कैसे रुड़की कॉलेज ऑफ सिविल इंजीनियरिंग से बना IIT रुड़की

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लॉर्ड डलहौजी ने रखी देश के पहले इंजीनियरिंग कॉलेज रुड़की की नींव 

देवभूमि मीडिया ब्यूरो
देहरादून : देश ही नहीं, विदेश में अपने शोध और अनुसंधान से इंजीनियरिंग के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान हासिल करने वाले IIT रुड़की के अस्तित्व में आने का इतिहास उतना ही रोचक है जितना कि गंगा के पानी को हरिद्वार में हर की पौड़ी से शुरु होकर, मेरठ, बुलंदशहर से अलीगढ़ में स्थित नानु तक पहुंचाने का है जहां से यह कानपुर और इटावा शाखाओं में बंट जाती है। अंग्रेजी हुकूमत के समय कर्नल कॉटले ने रुड़की में गंगनहर का खाका खींचा तो इस बड़े प्रोजेक्ट को अमलीजामा पहनाने के लिए इंजीनियरों की जरूरत महसूस हुई। तभी देश के पहले इंजीनियरिंग कॉलेज की नींव रुड़की में रखी गई। 
रुड़की कॉलेज ऑफ सिविल इंजीनियरिंग की स्थापना 1847 में लॉर्ड डलहौजी द्वारा, भारत के सबसे पहले इंजीनियरिंग कॉलेज के रूप में हुई थी। लेकिन इस कॉलेज मे इंजीनियरिंग की पढा़ई का कार्य 1845 में ही शुरु कर दिया गया था और इसका कारण, उस समय गंगा नहर निर्माण के दौरान शुरु हुए लोक निर्माण कार्य में सहायता देने के लिए स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित करना था। वर्ष 1854 में कॉलेज का नाम बदल कर गंगा नहर के प्रभारी मुख्य इंजीनियर और 1843-53 के बीच रहे भारत के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर जेम्स थॉमसन के नाम पर थॉमसन सिविल इंजीनियरिंग कॉलेज कर दिया गया।
इतिहासकार बताते हैं कि गंगनहर निर्माण में लगे इंजीनियरों को प्रशिक्षण देने के लिए वर्ष 1845 में सिविल इंजीनियरिंग प्रशिक्षण स्कूल की स्थापना की गई। इसे नवंबर वर्ष 1847 में एक कॉलेज के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। इस कॉलेज ने वर्ष 1848 से ही विधिवत रूप से कार्य करना प्रारंभ किया। देश की आजादी के बाद वर्ष 1948 में इसे विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया गया।
वर्ष 1948 में संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) ने अधिनियम संख्या IX के द्वारा कॉलेज के प्रदर्शन और स्वतंत्रता के बाद के भारत निर्माण के कार्य में इसकी क्षमता को ध्यान में रखते हुए को इसे विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया। स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, ने 1949 नवंबर में चार्टर प्रस्तुत कर कॉलेज का रुतबा बढ़ाकर इसे स्वतंत्र भारत का पहला अभियांत्रिकी विश्वविद्यालय घोषित किया।
इसके बाद यह संस्थान रुड़की यूनिवर्सिटी के रूप में जाना गया। उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद 21 सितंबर 2001 में संसद में कानून पारित कर इसे देश के सातवें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के रूप में मान्यता मिली।