विष विद्यालय है या विश्व विद्यालय ?

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इन्द्रेश मैखुरी

ख्वातीन-ओ-हज़रात,माज़रा यूं है कि सत्ता के ऐन नाक के नीचे ,इतना नाक के नीचे कि हाकिम कभी भी मुंह उठाए यहाँ पहुँच जाएँ,एक विषविद्यालय है। अरे-अरे,नहीं,नहीं जुबान थोड़ा फिसल गयी,विष नहीं भई दुनिया का विद्यालय है ! दुनिया समझते हैं ना,दुनिया बोले तो विश्व। 

विष तो इस लिए हो गया कि वहाँ एक-दूसरे के खिलाफ खूब विष वमन हो रहा है और अंग्रेजी वाली विश यानि चाह सबकी यह है कि सामने वाला धराशायी हो जाये। गुरु दक्षिणा में शिष्य का अंगूठा कटवाने वाले गुरु के नाम वाले नगर में अवस्थित इसी नाम वाले बड़े भारी विद्यालय में गुरुजन शिष्य का अंगूठा कटवाएँ न कटवाएँ पर कानून के कान जरूर कतर रहे हैं।

अध्ययन-अध्यापन के दायरे में कानून नहीं हैं पर प्रैक्टिस में सर्वाधिक कानून ही है। दाँवपेंच कानून के ही लड़ाये जा रहे हैं, विद्वता उसी में प्रदर्शित हो रही है। 

आलम यह है कि सब एक दूसरे का कच्चा चिट्ठा लिए घूम रहे हैं और उसका हवाई जहाज बना-बना कर उड़ा रहे हैं। एक के कच्चे चिट्ठे वाला हवाई जहाज इधर लैंड कर भी नहीं पाता कि तब तक दूसरे के कच्चे चिट्ठे का जहाज कानून के रनवे पर दौड़ने लगता है। सोचनीय यह भी है कि आखिर यह कच्चा चिट्ठा,बरसों-बरस तक कच्चा ही रहेगा या पकेगा भी। नौकरी तो पक्की हो गयी पर जिन चिट्ठों से नौकरी मिली वे बेचारे कच्चे ही रह गए !  

और चिट्ठे भी कैसे-कैसे हैं। “पुष्प” ने नौकरी पाये तो बाकी खड़े हो गए। मचा कोहराम कि “पुष्प” तो अब दूसरे डाल की वासी हैं,वे इस डाल का लाभ कैसे ले सकती हैं। जिनको उनके इस डाल का लाभ लेना नागवार गुजरा,वे कानून के रनवे  पर उनके चिट्ठों का जहाज लिए दौड़ रहे हैं। 

एक हजरत हैं “खुमार”। चिट्ठों के पूर्ण होने का अता-पता नहीं पर प्रोफेसरी का चढ़ गया खुमार। सो बिन चिट्ठों के ही प्रोफेसरी झटकने का “खुमार” ने कर डाला चमत्कार। वैसे इस कॉन्फिडेंस की भी बलिहारी है कि आदमी के चिट्ठे भले ही कच्चे हों पर इरादे पक्के हों तो बिन चिट्ठों के भी आदमी प्रोफेसर हो जाये। बोले तो चिट्ठों में नहीं इरादों में जान होनी चाहिए ! पर ऐसा करने के लिए बाकी कोई विद्या आदमी जाने-न-जाने पर जुगाड़ विद्या में उसका पारंगत होना लाज़मी है। बहरहाल “खुमार” साहब का कच्चा चिट्ठा भी आजकल नैनीताल की सैर पर है।

ऐसा ही माहौल ठैरा,ऐसा ही पर्यावरण ठैरा। अब पर्यावरण की भली चलायी “पर्यावरण” में एक-आध का साधू मन ठैरा ! साधू मन तो जानते ही हैं आजकल स्वादू लपलपाती जीभ वाला ठैरा और सवाल उठाने वालों को धमकाने वाला ठैरा ! 

और हज़रात इनसे ऊपर,उनसे ऊपर,सबसे ऊपर जो हैं, वे naughty हैं,“नौटी”। व्यवहार में आदमी नॉटी हो चलेगा,नाम-उपनाम में भी नौटी हो, ये भी चलेगा पर चिट्ठों में भी नॉटी हो,यह चलेगा नहीं उड़ेगा ! चिट्ठों में naughtiness यानि नॉटीपना रह जाये तो चिट्ठा कच्चा रह जाता है। चिट्ठा कच्चा रह गया तो नैनीताल की सैर पर जाएगा।सो  इनके चिट्ठों ने भी इनके साथ नॉटीपना कर दिया और वे चले नैनीताल !

कुल मिला कर यहाँ भी हालात “पुर्जा-पुर्जा कट मरे” वाले बने हुए हैं,बस फर्क यह है की यहाँ पुर्जा यानि अंग नहीं है,बल्कि कागज का पुरजा है। इसका पुरजा,उसके पुरजे से लड़ रहा है। आखिरी में यही देखना रोचक होगा कौन कच्चे चिट्ठे के बावजूद पक्के तौर पर टिका रह जाएगा ! इतने कच्चे चिट्ठों के बावजूद ठिके रहने के लिए “छोटा रिचार्ज” का चार्ज बोले तो चढ़ावा भी चुकाना होगा !

                                                                                                                       क्रमशः

इसे कथा का अंत न समझें, यह तो ट्रेलर मात्र है, पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त,जो किश्तों में आप तक पहुंचती रहेगी ………..