ऋतुओं में बसंत हूं मैं

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बसंत का आगमन प्रकृति में प्राकृतिक सौंदर्य तथा शिक्षा उपनयन संस्कार,शब्दज्ञान के लिए हमें करता है प्रेरित

कमल किशोर डुकलान
भारतीय काल गणना के अनुसार वर्षभर में छः ऋतुएं आती हैं। जिसमें ऋतुराज बसन्त को ऋतुओं का राजा माना गया है। माघ शुक्ल पंचमी से ऋतु परिवर्तन के साथ बसंत का आगमन होने लगता है। माघ शुक्ल पंचमी से हमें प्रकृति में प्राकृतिक सौंदर्य दृष्टिगोचर होने लगता है। बसंत पंचमी को विशेष रुप से वागेश्वरी जयन्ती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मां सरस्वती का पूजन के रुप में श्रद्धालु हवन,पूजन,अर्चन कर उनके जन्मोत्सव के रुप में मनाते हैं।
बसंत पंचमी के ही दिन महाराणा प्रताप एवं हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी”निराला”का भी जन्मदिवस साथ ही विदेशी आक्रमणकारी मुहम्मद गौरी को पृथ्वी राज चौहान से सत्रहवीं बार पराजित बसंत पंचमी को ही किया था। इसी तिथि को चौदह वर्षीय वीर हकीकत राय का धर्मरक्षा हेतु बलिदान हुआ था। इससे हमारी भावी पीढि को स्वधर्म पर अपने प्राणों की आहूति देने की प्रेरणा प्राप्त होती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने जब संसार को बनाया तो उन्हें सृष्टि पर पेड़-पौधे,जीव-जंतुओं में सब कुछ तो दिखाई रहा था,परन्तु उन्हें अगर किसी चीज की कमी का आभास हुआ। इसी कमी को पूर्ण करने के लिए ब्रह्मा जी ने अपने कमण्डल से जल को अभिमंत्रित कर छिटका तो सृष्टि पर एक सुंदर सी कन्या देवी के रुप में प्रकट हुई । जिसके एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में पुस्तक,तीसरे हाथ में माला और चौथे हाथ वर मुद्रा में था। देवी ने जब वीणा बजाया तो संसार की हर चीज में शब्दज्ञान आया।इसी से उनका नाम देवी सरस्वती पड़ा।जिस दिन देवी सरस्वती ने संसार को बोलना सिखाया वह दिन बसंत पंचमी का ही दिन था। तब से देवलोक और मृत्यु लोक में बसंत पंचमी पर लोग पूजा,अर्चन कर उनके जन्मदिवस को मनाने लगे।
बसंत पंचमी का मुहूर्त शास्त्र के अनुसार स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना गया है। भारतीय पंचांग के अनुसार किसी शुभ कार्य को करने के लिए किसी दूसरे मुहूर्त की आवश्यकता नहीं होती है। विशेषकर इस दिवस को मानव जीवन क्रम के सोलह संस्कारों में से एक शिक्षा उपनयन संस्कार (विद्यारंभ संस्कार) शब्दज्ञान के लिए बहुत ही शुभ माना गया है। अधिकांश अभिभावक अपने पाल्यों को विद्यालयों में प्रवेश करवाने के लिए इस दिन को शुभ दिन मानते हैं। अगर हम रामायण काल और महाभारत काल की ओर दृष्टिगोचर करें तो अयोध्या के कुलगुरु वशिष्ठ ने राम सहित चारों भाइयों को विद्यारंभ संस्कार शब्दज्ञान बसंत पंचमी को ही करवाया था। गोकुल में साडिल्य ऋषि के आश्रम में कृष्ण-सुदाम का शिक्षा उपनयन संस्कार बसंत पंचमी को ही करवाया था। गुरु द्रोणाचार्य की रेखदेख में कौरव-पाण्डवों की शिक्षा-दीक्षा भी माघ शुक्ल पंचमी को ही प्रारंभ हुई थी।
भारतीय काल गणना के अनुसार हिन्दी महीनों में फाल्गुन-चैत्र के महीने बसंत ऋतु के माने गये हैं। हिंदी महीनों में वर्ष का अन्तिम मास फाल्गुन तथा पहला मास चैत्र का है। बसंत ऋतु के आने पर सर्दी कम हो जाती है।मौसम सुहावना होने लगता है। पेड़-पौधों में नये पत्ते आने लगते हैं। इस ऋतु में पुष्प-उद्यान में विभिन्न प्रकार के फूलों से युक्त देखकर मन को आनन्दमूलक प्राप्ति होने लगती है। एक प्रकार से यह ऋतु राग-रंग और उत्सव मनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार बसंत को कामदेव का पुत्र माना गया है। हिन्दी साहित्य के महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” जी ने बसंत ऋतु का वर्णन करते हुए कहा है,कि रुप व सौंदर्य के देवता कामदेव के घर पुत्र-रत्न की प्राप्ति का समाचार सुनकर प्रकृति झूम उठी थी। खुशी से पेड़ पल्लवन का पालना डालते लगे,फूल वस्त्र पहनाने का काम करने लगे,पवन के झरोखे झूला झुलाने का काम करने लगे और कोयल की कूं-कूं उसे गीत सुनाकर बहलाने का काम करने लगी।
बसंत ऋतु में ही बसंत पंचमी, शिवरात्रि,होली जैसे सामाजिक पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हैं। भारतीय संगीत,कला,साहित्य में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। संगीत साधना में संगीत साधकों के लिए एक विशेष राग बसंत बनाया गया है। जिसे राग बसंत भी कहते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहां है,”ऋतुओं में मैं बसंत हूं”