कोरोना संकट के चलते उत्तराखंड के सैकड़ों लोक कलाकार आर्थिक तंगी से हो रहे दो चार

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 उत्तराखंड के सैकड़ों कलाकार आर्थिक तंगी से बेहाल

सी एम पपनैं
नई दिल्ली। भयावह कोरोना विषाणु संक्रमण के बढ़ते चरण में उत्तराखंड के सैंकड़ो कलाकार जिनकी आजीविका रंगमंच, फिल्म, गीत-संगीत व नृत्य विधाओं से सदा जुड़ी रही है, बुरी तरह आर्थिक संकट की मार झेलने को मजबूर हैं। कलाकारों का पारिवारिक जीवन, आर्थिक तंगी से दयनीय स्थिति मे पहुच, जीवन मरण का प्रश्न बन कर खड़ा हो गया है। विगत दिनों दो प्रख्यात लोकगायकों हीरा सिंह राणा व जीत सिंह नेगी का ह्र्दयगति रुक जाने से निधन हो गया है।
मुश्किल वक्त में, भुक्तभोगी कलाकारों द्वारा प्रदेश सरकार के रहनुमाओं से आर्थिक मदद हेतु गुहार लगाई गई। सरकार की चुप्पी देख, दयनीय स्थिति मे पहुच चुके कलाकारों की मदद हेतु कुछ सामाजिक संगठनों द्वारा हाथ आगे बढ़ाया गया। उत्तराखंड फिल्म कलाकार संगठन महासचिव नरेंद्र रौथाण जो स्वयं एक गायक तथा कुशल फिल्म व वीडियो एल्बम निर्माता निर्देशक हैं, के सानिध्य में उनके संगठन द्वारा जरुरत मंद कलाकारों, जिनके पास आय का कोई साधन नहीं था, कलाकारों के घरों पर जाकर नकद आर्थिक मदद, खाद्द्यान व जरूरी सामान आवंटित कर, परोपकारी पहल की गई। स्व.जयपाल नेगी (कलाकार) की धर्मपत्नी को पच्चीस हजार रुपयो का चैक, संगठन की ओर से आर्थिक मदद स्वरूप दिया गया। सूचनानुसार, उत्तराखंड का कोई भी जरुरत मंद कलाकार, कभी भी, मदद हेतु संगठन महासचिव नरेंद्र रौथाण से संपर्क कर, आर्थिक मदद व खाद्य सामग्री की प्राप्ति हेतु संपर्क कर सकता है।
सामाजिक संगठनों द्वारा कलाकारों की मदद होती देख, सरकार द्वारा कलाकारों की व्यथा पर पसीज, एक हजार रुपयो की आर्थिक मदद का ऐलान, प्रत्येक जिलों के डीएम आफिस मे अनेकों प्रकार की खानापूर्ति पूर्ण करने के पश्चात, प्राप्त करने का आदेश जारी किया गया। माह मार्च से चलायमान कोरोना संकट के लंबे दौर मे सरकार द्वारा जारी मात्र एक हजार रुपयों की आर्थिक मदद का कलाकारों व अनेकों सांस्कृतिक संस्थाओं, जिनमे गूंज व संस्कार रंगटोली अल्मोड़ा मुख्य थी, द्वारा यह कह कर विरोध किया गया, अधिकतर पीड़ित कलाकारों के पैन व बैंक अकाउंट नही हैं। ऐलान की गई आर्थिक राशि बहुत कम है, जो कलाकारों के साथ भद्दे मजाक समान है। कलाकारों द्वारा मांग रखी गई, आर्थिक राशि बढाई जाय, जिससे कलाकारों के परिवारों का इस संकट के दौर मे संतोष जनक भरण-पोषण हो सके। उक्त संगठनों द्वारा सरकार से यह भी पूछा गया, पूर्व मे भी कलाकारों से विवरण मांगे गए थे, उनका क्या हुआ?
उक्त कलाकार संगठनों की मांगो के समर्थन मे उत्तराखंड फिल्म, टेलीविजन एंड रेडियो एसोशिएशन (उफतारा) के अध्यक्ष प्रदीप भंडारी द्वारा सरकार के खिलाफ धरने प्रदर्शन का ऐलान किया गया।
उत्तराखंड फिल्म कलाकार संगठन महासचिव नरेंद्र रौथाण द्वारा असहाय व पीड़ित कलाकारों को सरकार द्वारा जारी की गई एक हजार रुपयों की आर्थिक मदद को कलाकारों का उपहास बताया गया। उक्त संगठन द्वारा मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को कलाकारों के सरोकार हेतु पत्र लिख, तर्क संगत मांगो मे, सरकार द्वारा कलाकारों के हित में नीति बनाने। कला संस्कृति विभाग द्वारा प्रदेश के कलाकारों की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया आरंभ कर उनका विवरण रखने। एक हजार रुपये की आर्थिक मदद पर पुनर्विचार कर उक्त राशि पांच हजार प्रतिमाह करने। 45 वर्ष से अधिक उम्र के कलाकारों को प्रतिमाह पेंशन या मानदेय देने। ग्रामसभा, विकासखंड व जिला स्तर पर कलाकारों की चयन प्रक्रिया शुरू करने। कलाकारों के पहचान पत्र बनाने। दिवंगत कलाकारों के परिजनों को मदद मुहैया करवाने। दिवंगत प्रेरणाश्रोत लोक कलाकारों के नाम पर पर्वतीय क्षेत्रों में म्यूजियम, संग्रहालय,, शिल्प कला केंद्र निर्मित किए जाने इत्यादि के बावत मांगे रखी गई हैं।
संगठन द्वारा प्रेषित किए गए पत्र मे उक्त मांगो के निराकरण के बाद, उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को बढ़ावा मिलने व कोरोना महामारी के भय से उत्तराखंड वापस लौटे प्रवासीयो के घर-गांवो मे ही रुके रह, खेती-किसानी व अन्य क्षेत्रो से जुडी आजीविका तलाशने की संभावना व्यक्त की गई है।
अवलोकन कर ज्ञात होता है, उत्तराखंड की लोक कलाओं, रीति रिवाजों, बोली-भाषा इत्यादि को संजोने, संरक्षण व संवर्धन करने मे लोकगायकों व अन्य लोकविधाओं से जुड़े प्रबुद्ध कलाकारों का बड़ा योगदान रहा है। अधिकतर कलाकार पढ़े-लिखे न होने के बावजूद, विलक्षण प्रतिभा के धनी रहे हैं। प्रदेश की संस्कृति को जीवित रखने व उसकी पहचान को कायम रखने में, अंचल के कलाकारों की सदैव महत्वपूर्ण भूमिका रही है। चाहे वे गायक, वादक, नर्तक, शिल्पी या चित्रकार कुछ भी हों, विलक्षण प्रतिभा के कलाकारों ने पहाड़ की परम्पराओ व लोक संस्कृति को अंतर्रराष्ट्रीय मंचो तक पहुचा, प्रदेश को ख्याति दिलवाने मे महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है।
बदलते युग व बदलती चाहतो के प्रभाव से उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल का जनमानस भी अछूता नहीं रहा है। पहाड़ो के जटिल जीवन, खेती-पाती का जंगली जानवरों द्वारा किए जा रहे विनाश तथा रोजगार के अभाव में पहाड़ो से बड़ी संख्या मे लोगों का ही पलायन नही हुआ, उनके साथ उनकी पीढ़ियों के ज्ञान, व्याप्त कला-संस्कृति व परम्पराओ का भी पलायन हुआ है, जिसे उन्होंने प्रवास मे भी पीढ़ी दर पीढ़ी संजो कर रखा है। लोक संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन मे लोक कलाकारों की भूमिका को नकारा व नजरअंदाज नही किया जा सकता है।
उत्तराखंड की प्रदेश सरकार को समझना होगा, कला मनुष्य की पवित्र अनुभूति है, तथा उसकी आत्मा की अभिव्यक्ति है। लोक कलाकारों का सदा सम्मान हुआ है, उनका सम्मान भविष्य में भी करना होगा। भूमण्डलीकरण के दौर मे उत्तराखंड के प्रवासी जनों की पहचान उनकी परम्पराए, लोकसंस्कृति, रीति-रिवाज बोली-भाषा, गीत-संगीत, खान-पान, इत्यादि ही मुख्य है। इस पहचान को कायम रखने में, उत्तराखंड के लोक कलाकारों की बड़ी भूमिका रही है। कलाकारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी शालीनता के साथ न सिर्फ उत्तराखंड बल्कि प्रवास मे भी लोकसंस्कृति को सहेज कर रखा हुआ है। आयोजित उत्सवो, समारोहों मे लोक संस्कृति के विभिन्न रंग कलाकारों द्वारा चारों दिशाओं में बिखरे जाते रहे हैं, जिनमे उत्तराखंड के वाद्य यंत्रों से प्रवाहित कर्णप्रिय लोकसंगीत, गीत, नृत्य, शिल्प, चित्र इत्यादि की विविधता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
उत्तराखंड की इन पारम्परिक लोक कलाओं व लोक संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन व प्रचार-प्रसार हेतु प्रदेश सरकार को प्रति वर्ष कला, भाषा एवं संस्कृति विभाग हेतु आवश्यक बजट आवंटित करना चाहिए। कोरोना संकट में पीड़ित कलाकारों की भरपूर मदद कर, उन्हे प्रोत्साहित करना चाहिए, यह सोच कर कि, उत्तराखंड की लोकसंस्कृति की पारंपरिक विधाओं से कलाकार डिगे नही। रुष्ट हो, विमुख न हो। अगर कलाकार कला-संस्कृति के पथ से डिग गया, ऐसी स्थिति मे प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान का क्या होगा, समझा जा सकता है। विद्ववान संस्कृतिकर्मियों द्वारा अक्सर कहा जाता है, ‘किसी भी देश-प्रदेश को उसकी प्रचलित लोकसंस्कृति की परम्पराओं, बोली-भाषा, खान-पान, गीत-संगीत, वेश-भूषा इत्यादि से पहचाना जाता है। यह जितनी स्मृद्ध होगी, वह राष्ट्र व प्रदेश उतना ही स्मृद्ध व शक्तिशाली होगा।’