साइबेरिया में बढती गर्मी का कारण मानव जनित जलवायु परिवर्तन : वैज्ञानिक

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ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कर जलवायु को प्रभावित नहीं किया होता तो औसत तापमान 2°C से न बढ़ा होता : वैज्ञानिक 

साइबेरिया का कुल तापमान जनवरी से जून तक औसत से 5 °C था अधिक

देवभूमि मीडिया ब्यूरो 
350 से अधिक अध्ययनरैपिड और साथ ही सहकर्मी की समीक्षाने जांच की है कि क्या जलवायु परिवर्तन ने विशेष रूप से मौसम की घटनाओं को अधिक संभावित बना दिया है। वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन ग्रुप के पिछले अध्ययनों में पाया गया कि जलवायु परिवर्तन ने इस साल की ऑस्ट्रेलियाई आग और पिछले जून में फ्रांस में रिकॉर्ड तोड़ हीटवेट की संभावना को और अधिक बढ़ा दिया। यह भी पाया गया कि ट्रॉपिकल स्टॉर्म इमेल्डा में सितंबर में टेक्सास में हुई बारिश को जलवायु परिवर्तन से अधिक संभावित और तीव्र बना दिया गया था।
   
देहरादून : विश्व के कुछ शीर्ष जलवायु वैज्ञानिकों की एक टीम द्वारा किये गए एक ताज़ा एट्रिब्यूशन विश्लेषण के अनुसार, बिना मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के, साइबेरिया में बीती जनवरी से जून 2020 के बीच दिखने वाले गर्मी के प्रभाव, असंभव हैं।
पी.पी. शिर्शोव इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओसियनोलॉजी (समुद्र विज्ञान), और  रूसी विज्ञान अकादमी सहित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों और मौसम विज्ञान सेवाओं के शोधकर्ताओं ने यह भी पाया अगर मानवों ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कर जलवायु को प्रभावित नहीं किया होता तो वहां का औसत तापमान 2°C से न बढ़ा होता। 
वर्ष की शुरुआत से साइबेरिया में तापमान औसत से ऊपर रहा है। आर्कटिक के लिए 38 °C का एक नया रिकॉर्ड तापमान 20 जून को रूसी शहर वेरखोयान्स्क में दर्ज किया गया था, जबकि साइबेरिया का कुल तापमान जनवरी से जून तक औसत से 5 °C अधिक था।
इन उच्च तापमानों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को मापने के लिए, वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर सिमुलेशन चलाए, आज के जलवायु, जिसमे लगभग 1 °C  ग्लोबल वार्मिंग, की तुलना मानव प्रभाव के बिना जैसे जलवायु होता उसके साथ करने के लिए, अतीत की तरह ही रैपिड और पीयर रिव्यूड स्टडीज़ के तरीकों का उपयोग करके। 
उनके विश्लेषण से पता चला है कि जैसी लंबी गर्मी साइबेरिया में इस साल जनवरी से जून तक अनुभव की गई थी, वैसी गर्मी बिना मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन के 80,000 वर्षों में केवल एक बार से भी कम होगी – मतलब ऐसी स्थिति बिना मानव जनित जलवायु परिवर्तन में लगभग असंभव है। बिना ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से पैदा हुई गर्मी के ऐसा नहीं हो सकता था। जलवायु परिवर्तन ने लंबे समय तक गर्मी की संभावना को कम से कम 600 के कारक से बढ़ा दिया। यह अब तक किए गए किसी भी एट्रिब्यूशन अध्ययन के सबसे मजबूत परिणामों में से है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि वर्तमान जलवायु में भी  लंबे समय तक ऐसी गर्मी की संभावना बहुत कम थी। ऐसी चरम स्थितियों की संभावना हर 130 साल में एक बार से भी कम होती है। लेकिन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेजी से कटौती के बिना सदी के अंत तक उनके ज़्यादा फ्रिक्वेंसी से होने का जोखिम हैं।
साइबेरिया में गर्मी ने व्यापक आग भड़का दी है, जून के अंत में 1.15 मिलियन हेक्टेयर भूक्षेत्र जल चुके थे।  यह लगभग 56 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड की रिहाई के साथ जुड़ा हुआ है – स्विट्जरलैंड और नॉर्वे जैसे कुछ औद्योगिक देशों के वार्षिक उत्सर्जन से अधिक। इसने पारमाफ्रॉस्ट के पिघलने को भी तेज कर दिया – मई में जमी हुई मिट्टी पर बना एक तेल टैंक ढ़य गया, जिससे इस क्षेत्र में अब तक के सबसे खराब तेल रिसाव में से एक हुआ। ग्रीनहाउस गैसें आग और पिघलाव के द्वारा रिहा होती है – साथ ही साथ बर्फ और बर्फ के नुकसान से ग्रह की परावर्तन में कमी – ग्रह को और अधिक गर्मी देगा। साथ ही बर्फ के नुकसान से ग्रह और गर्म होगा और ग्रह की परावर्तन क्षमता में भी कमी आती है। गर्मी को रेशम कीटों के प्रकोप से भी जोड़ा गया है, जिनके लार्वा शंकुधारी पेड़ खाते हैं।
प्रोफेसर ओल्गा ज़ोलिनापी.पी. शिर्शोव इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओसियनोलॉजी (समुद्र विज्ञान)आरएएस (RAS), मॉस्कोऔर सीएनआरएस (CNRS) इंस्टीट्यूट डेस जिओसाइंसेज डे लएनवीरोमेंटग्रेनोबल (Institut des Géosciences de l’Environnement, Grenoble), प्रमुख लेखक आईपीसीसी एआर 6 (IPCC AR6): “इस अध्ययन से न केवल यह पता चलता है कि तापमान की परिमाण मात्रा अत्यंत दुर्लभ है,  वह मौसम के पैटर्न भी दुर्लभ हैं जो इसका कारण बने।  हम यह अध्ययन करना जारी रख रहे हैं कि हजारों हेक्टेयर में फैले जंगल कैसे आग की लपटों को प्रभावित कर सकते हैं क्योंकि आग की लपटें धुएं और वायुमंडल में राख भर देती हैं।”
एंड्रयू सियावरेलाशोध के प्रमुख लेखक और  मेट ऑफिस में सीनियर डिटेक्शन एंड एट्रिब्यूशन साइंटिस्ट: “इस रैपिड रिसर्च के निष्कर्ष – के जलवायु परिवर्तन ने साइबेरिया में प्रोलोंगड (लंबे समय तक) गर्मी की संभावना को कम से कम 600 गुना बढ़ा दिया – वास्तव में चौंका देने वाला है। यह शोध चरम तापमान का और सबूत है जिसे हम दुनिया भर में एक गर्म वैश्विक जलवायु में अधिक बार देखने की उम्मीद कर सकते हैं। महत्वपूर्ण रूप से, इन अत्यधिक गर्मी की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करके नियंत्रित किया जा सकता है।”
डॉ फ्रेडेरिक ओटोऑक्सफोर्ड के पर्यावरण परिवर्तन संस्थान के कार्यवाहक निदेशकऔर विश्व मौसम विशेषता पहल की सह-लीड: “यह अध्ययन फिर से दिखाता है कि हीटवेव के संबंध में जलवायु परिवर्तन का कितना बड़ा गेम चेंजर हिस्सा है। यह देखते हुए कि दुनिया के अधिकांश हिस्सों में हीटवेव अब तक के सबसे घातक चरम मौसम की घटनाएँ हैं, उन्हें बहुत गंभीरता से लिया जाना चाहिए। चूंकि उत्सर्जन में वृद्धि जारी है, हमें दुनिया भर में अत्यधिक गर्मी का सामना करने में लचीलापन बनाने के बारे में सोचने की जरूरत है, आर्कटिक समुदायों में भी – जो थोड़े ही समय पहले निरर्थक लगता।”
प्रोफेसर सोनिया सेनिविरत्नेईटीएच (ETH) ज्यूरिख (डी-यूएसवाईएस  D-USYS) में पर्यावरण प्रणाली विज्ञान विभागऔर कई आईपीसीसी (IPCC) रिपोर्टों की प्रमुख लेखक: “इन परिणामों से पता चलता है कि हम चरम घटनाओं का अनुभव करना शुरू कर रहे हैं जिनके जलवायु प्रणाली पर मानव पदचिह्न के बिना होने का लगभग कोई भी मौका नहीं होता। हमारे पास ग्लोबल वार्मिंग को उन स्तरों पर स्थिर करने जो के लिए बहुत कम समय बचा है जो के जलवायु परिवर्तन पेरिस समझौते की सीमा में हो। ग्लोबल वार्मिंग के 1.5 डिग्री सेल्सियस पर स्थिरीकरण के लिए, जो अभी भी इस तरह के चरम गर्मी की घटनाओं के अधिक जोखिम का कारण होगा, हमें 2030 तक अपने CO2 उत्सर्जन को कम से कम आधा करने की आवश्यकता है। “