अपनी करनी पत्रकारों के सर मढ़कर आखिर अधिकारी कैसे बच पाएंगे !

देहरादून : उत्तराखंड सचिवालय में पत्रकारों के प्रवेश को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं फ़िज़ाओं में तैर रही है सूत्रों  से मिली जानकारी के अनुसार सचिवालय में पत्रकारों की एंट्री को प्रतिबन्धित करने की तैयारी की जा रही है। लेकिन इस सब प्रतिबन्ध के पीछे बीते दिनों सचिवालय से केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के NH -74 घोटाले पर भेजे गए उस पत्र के लीक होने से जोड़ देखा जा रहा है, जिसमें उन्होंने प्रदेश सरकार द्वारा सीबीआई जांच की घोषणा के बाद इस तरह की जांच की जरुरत नहीं होने की बात लिखकर प्रदेश सरकार को भेजी थी और यह पत्र चर्चाओं के अनुसार मुख्यमंत्री के कार्यालय में बैठे एक आला अधिकारी के यहाँ से लीक होना बताया जा रहा है ।  

उल्लेखनीय है कि  केंद्रीय मंत्री के पत्र के लीक होने ने बाद उत्तराखंड भाजपा से लेकर केंद्र सरकार तक बचाव की मुद्रा में आ गयी थी और राज्य सरकार सहित केंद्र को पत्र पर जवाब देना भारी पड़ गया था  भी इस पत्र की खुशबू सूबे  राजनीतिक गलियारों को महका रही है यही कारण है कि  राज्य के अस्तित्व में आने के 16 साल के बाद पहली बार राज्य सरकार को सचिवालय में पत्रकारों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने  के लिए सोचना पड़ा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि  जिस अधिकारी के कार्यालय से यह पत्र लीक हुआ उनके यहाँ अक्सर वे पत्रकार बैठे रहते हैं जिनमें अधिकाँश दलाल टाइप के लोग होते हैं ।   

गौरतलब हो कि बीते दिन  सचिवालय में आहूत मीटिंग में प्रमुख सचिव आनंद वर्द्धन ने सूचना विभाग के आला अधिकारियों को सरकार की मंशा से अवगत करा दिया है कि अब अगले 15 दिनों में सूचना विभाग द्वारा जारी सभी प्रवेश पत्रों की वैद्यता समाप्त करने का शासनादेश जारी हो जाएगा। सरकार नई व्यवस्था ला रही जिसके तहत पत्रकारों को पास अब सचिवालय प्रशासन जारी करेगा। नई व्यवस्था के तहत किसी भी पत्रकार को गाड़ी का पास नहीं दिया जाएगा। पास केवल दैनिक समाचार पत्रों तथा न्यूज़ चैनल के पूर्णकालिक पत्रकार को ही दिए जाएंगे। मान्यता प्राप्त पत्रकारों की एंट्री भी हो जाएगी प्रतिबंधित की जाएगी । 

प्राप्त जानकारी  के अनुसार सूचना विभाग के पास निरस्त होने के बाद नई व्यवस्था के तहत पास बनने में दो से तीन महीने का वक्त लगेगा। तब तक पत्रकार सचिवालय स्तिथ मीडिया सेंटर से समाचार संकलन करेंगे और सूचना विभाग के अधिकारी उनको सहायता करेंगें। मजे की बात यह है पत्रकारों को सूचना विभाग पर आश्रित होना होगा और  वही खबर प्रकाशित करने पर सूचना विभाग का जोर होगा जो सूचना विभाग पत्रकारों को देगा। 

लेकिन यह बात किसी भी अधिकारी  या नेता ने नहीं सोची जो पत्र या सूचना सूबे के अधिकारी खुद ही  लीक करते रहे हैं उनसे बचने का सरकार के पास क्या इलाज है जब सरकार के अपने ही घर में छेद है तो ऐसे में पत्रकारों को उनके कर्तव्यों से रोकना कहाँ तक न्याय संगत और कहाँ तक सूबे की जनता  और पत्रकारों की स्वतन्त्रता का सवाल है यह तो सरकार ही जाने लेकिन इस निर्णय  सरकार की छवि को कितना  बट्टा लगेगा यह भविष्य के गर्भ में है।  

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