युद्ध कौशल के लिए अखाड़ों के नागाओं का इतिहास

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जगद्गुरु शंकाराचार्य ने मुगलों के आक्रमण से रक्षा करने के लिए शस्‍त्र विद्या में निपुण साधुओं के अनेकों संगठन बनाए जिन्हें अखाड़ा दिया नाम 

कमल किशोर डुकलान 
मुगलों के आक्रमण से ही हिंदू धर्म की रक्षा के लिए संत समाज को आध्‍यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ युद्ध कौशल,शस्‍त्र विद्या में पारंगत माना जाता है।..

इस समय पूरे देश और दुनिया में सिर्फ एक नाम गूंज रहा है और वो है हरिद्वार महाकुंभ का। कुंभ को पूरी दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन या मेला अगर देखा जाए तो इतनी बड़ी संख्या में सिर्फ मुस्लिम समुदाय हज के दौरान ही मक्का में मानव समुदाय इकट्ठा होता है। कुंभ लोगों को जोड़ने का एक माध्यम है। इतिहासकारों का कहना है कि कुंभ पर्व डेढ़ से ढाई हजार साल पहले शुरू हुआ था। कुंभ का प्रथम लिखित प्रमाण हमें बौद्ध यात्री ह्वेनसांग के लेख से मिलता है जिसमें छठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासन में होने वाले कुंभ का वर्णन किया गया है। कुंभ को लेकर लोगों के दिलोदिमाग में तरह-तरह के सवाल उमड़ते हैं जिसकी जानकारी होना आवश्यक है।
प्राचीन काल में बौद्ध धर्म के बढ़ते वर्चस्‍व और मुगलों के आक्रमण से हिंदू धर्म की रक्षा करने के लिए जगद्गुरु शंकाराचार्य ने शस्‍त्र विद्या में निपुण साधुओं के अनेकों संगठन बनाए जिन्हें अखाड़ा नाम दिया। संत समाज आध्‍यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ शस्‍त्र विद्या में पारंगत माना जाता है।अखाड़ा नाम लेते ही दिमाग में एक अलग छवि उभरती है। वह छवि होती है पुलपुली जमीन पर मिट्टी में सने पहलवान एक-दूसरे पर कुश्ती के दांव आजमाते हुए। हमारे देश में इसकी पुरानी परंपरा रही है। साधु समाज में वही परंपरा दूसरे रूप में आई। इसकी शुरुआत आदि शंकराचार्य ने उस समय की जब सनातन धर्म पर विधर्मी शक्तियां जोर आजमाइश कर रही थीं। शंकराचार्य ने शारीरिक रूप से बलिष्ठ साधुओं को एकत्र कर सनातन धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ा बनाया।
सधुक्कड़ी भाषा में अखाड़ा उसे कहते हैं जहां साधुओं का जमावड़ा रहता है। सीधे सपाट शब्दों में कहें तो अखाड़े शंकराचार्य की सेना के रूप में थे, जिन्हें धर्म की रक्षा के लिए तैनात किया गया था। एक हाथ में माला और एक हाथ में भाला वाले सिद्धांत पर इन्हें शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा दी गई। व्यवस्था बनाई गई कि शंकराचार्य या उनके द्वारा नामित आचार्य जब कभी सनातन धर्म की रक्षा के लिए इन अखाड़ों को शस्त्र उठाने का आदेश देंगे, यह अपना काम करेंगे। यानी सेना जैसा आचरण कि सेनापति या मुखिया के आदेश के बिना जैसे अपने विवेक से सेना कोई कार्रवाई नहीं कर सकती,अखाड़े भी मनमाना निर्णय नहीं ले सकते।
बाद में संत बढ़ते गए, उनके संप्रदाय बढ़ते गए, इनमें शैव और वैष्णव विवाद होता गया। इनकी संख्या में उसी तरह इजाफा होता गया। संत समूह के पूरे देशभर में 13 अखाड़े हैं। इनमें शैवों के सात, वैष्णवों या वैरागियों के तीन और उदासीनों के तीन अखाड़े हैं। ये अखाड़े कुंभ मेले के अवसर पर कुंभ स्थलों पर डेरा डालते हैं और शंकराचार्यों व अपने-अपने अखाड़े के महामंडलेश्वरों की अगुवाई में विशेष स्नान पर्वों पर स्नान करते हैं। इसी को शाही स्नान कहा जाता है। शैव अखाड़ों मे दशनामी, नागा संत, शाक्त आदि उप संप्रदाय भी होते हैं।
सनातन धर्म की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध ये नागा योद्धा कई वर्षों तक कठोर तपस्या एवं अपने शौर्य,पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए अपनी अद्भुत जीवनी शक्ति का प्रमाण पेश करते थे।इस तरह की जटिल साधनाओं को पास करने वाले पारंगत साधुओं को राजाओं, महाराजाओं द्वारा ऐसे योद्धाओं को गुप्तचरी का भी काम दिया जाता था। इसी कारण आज भी नागा साधुओं को राष्ट्र व धर्म की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर करने के कारण परम सम्मानीय माना जाता है,उनकी वंदना की जाती है।इतिहास में कई ऐसे गौरवशाली युद्धों का वर्णन मिलता है जिनमें 40 हजार से ज्यादा नागा योद्धाओं ने हिस्सा लिया। अहमद शाह अब्दाली द्वारा मथुरा-वृन्दावन के बाद गोकुल पर आक्रमण के समय नागा साधुओं ने ही उसकी सेना को खदेड़कर गोकुल की रक्षा की। सन् 1260 में महानिर्वाण अखाड़ा के महंत भगवानंद गिरी के नेतृत्व में 22 हजार नागा साधुओं ने कनखल स्थित शिव मंदिर को आक्रमणकारी सेना के कब्जे से मुक्त कराया था।
देश की आजादी के बाद इन अखाड़ों और धर्म सत्ता की सनातनी सेना की घोर उपेक्षाएं हुई। जिस कारण से इन अखाड़ों का अति प्राचीन गौरवमयी स्वरुप धूमिल होता गया। अगर देखा जाए तो आज भी इनसे बड़ा योद्धा,इनसे बड़ा त्यागी भारत के अलावा अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा। राष्ट्र की सुरक्षा के प्रति इन्हें जाग्रत और पुन: समर्पित कर दिया जाए तो ये आग से भी खेल सकते हैं। भारत को आंख दिखाने वालों को उन्हीं के अंदाज में सबक सिखा सकते हैं।