कुंदन की बगिया में पैदा हो रहे हैं “हिमालयन कीवी”

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ये सफलता का उदाहरण उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो महानगरों में रहते अनुमान लगाते हैं कि उत्तराखंड में तो जैसे कुछ हो ही नहीं रहा

पंवार द्वारा भी बिखरी जोत को एक जगह लाकर स्वैच्छिक चकबंदी का एक बेहतर उदाहरण किया गया प्रस्तुत

वर्षों की कड़ी मेहनत के फलस्वरूप लगभग 3500 से 4000 फीट के मध्य एक हरा-भरा बगीचा किया तैयार

इन्द्र सिंह नेगी 
जब भी टिहरी जनपद के नैनबाग के समीप समाणी तोक स्थित “नारायणी उद्यान” में कुछ नया होता है तो उद्यान के संस्थापक और उद्यान पंडित जैसे अनेकों सम्मान से विभूषित श्री कुंदन सिंह पंवार जी का फोन आता है कि “यार नेगी जी आ जाओ तुम्हारे हिस्से का कुछ रखा हुआ है ।”
अभी चार दिन पहले ही पंवार जी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि यार आ जाओ तुम्हारे लिए आम रखे हुए है, मैंने कहा कि देखता हूं । कल शाम को मैंने फोन किया कि यदि आप वहीं हो तो कल आ रहा हूं उन्होंने कहा आ जाईये, सुबह भाई सुभम के साथ नागथात से चल दिया समाणी के लिए और 11 बजे के करीब पहुंच भी गये ।
वहां पहुंचे तो वो मुख्य मार्ग से घर तक पहुंच मार्ग के सुधारीकरण में जुटे हुए थे, हमको देखा तो स्वागत हेतु वो आगे बढ़े, कुशलक्षेम पूछने के बाद बांज की छांव में कुर्सी लगा कर बैठ गये । चाय-पानी के पश्चात स्थानीय से लेकर देशज विषयों पर काफी देर चर्चा-परिचर्चा होती रही, इसके बाद मैंने पंवार जी से कहा कि चलो एक राउंड बगीचा घूम लिया जाय तो वो सहर्ष तैयार हो गए ।
सबसे पहले हम कीवी के ब्लाक की तरफ गये, वहां लकदक लदी कीवी की बेलो ने मंत्रमुग्ध कर दिया, कई जगह अधिक भार के कारण स्टेंड तक झुक गये है । यहां एलीसन, हैवर्ड व मोन्टी जैसी प्रजाति की कीवी उपलब्ध है जो अगले कुछ दिनों में बाजार के लिए तैयार हो जायेगी । इसके पश्चात पाॅलीहाउस की तरफ बढ़े जहां आड़ू, खुम्बानी, अखरोट, सेब, पलम, बादाम की पौध हजारों की संख्या में उपलब्ध है, थोड़ी-बहुत घूमने के बाद उनके घर की घर की तरफ चल दिये और भात खा कर वापसी राह पकड़ ली । किवी के अतिरिक्त आम की चौंसा प्रजाति के फल उनके बगीचे में उपलब्ध है जो इस 20 तारीख के बाद कभी भी तैयार हो सकता है जबकि मैदानी भू-भागों में आम की फसल कब की समाप्त हो चुकी है ।
ज्ञात हो कि उच्च शिक्षित कुंदन सिंह पंवार जी एलएलबी करने के पश्चात सरकारी सेवा में कार्यरत थे लेकिन सरकारी नौकरी ज्यादा दिन रास नहीं आई और उन्होंने उससे त्यागपत्र दे दिया । इसके पंवार जी ने पश्चात विकासनगर के कुंजा नामक स्थान पर अपना आम व लीची बगीचा स्थापित किया और फिर चल पड़े समाणी की तरफ, यहां लोगों से खेतों का संटवारा कर गड्ढे खोदना शुरू किया और कुछ ही वर्षों की कड़ी मेहनत के फलस्वरूप लगभग 3500 से 4000 फीट के मध्य एक हरा-भरा बगीचा तैयार हो गया ।
आज यहां सेब, आम, आड़ू, पलम, नाशपाती, नेक्टीन, कीवी, नीम्बू जैसी अनेको उत्तम प्रजाति के फलदार पौधे उपलब्ध है, सेब व आम जैसी विपरीत जलवायु के फल एक ही स्थान पर पैदा किये जा रहे है । उनके साथ इस काम में उनकी पत्नी, पुत्र व पुत्र वधु हाथ बंटाते है तथा अन्य लोग भी किसी ना किसी रूप से रोजगार पा रहे है, आपकी देखा-देखी करके अन्य काश्तकार भी बागवानी की तरफ रूख करते हुए बागान तैयार कर रहे है ।
यहां पर ये उल्लेख करना आवश्यक लगता है कि राज्य में चकंबदी को लेकर समय-समय पर अलग-अलग लोग अभियान चलाते रहे और सरकार भी अपनी गति से प्रयासरत है ताकि गांव की छितरे हुए खेतों को एक चक में लाया जा सके । चकबंदी की ये कवायद अनेक कारणों से अभी तक परवान नहीं चढ़ पाई लेकिन उत्तरकाशी जनपद के नौगाँव विकासखंड स्थित बीफ व आसपास के गांवों में पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष स्व. राजेन्द्र सिंह रावत के प्रयासों से राज्य गठन से पूर्व की गये स्वैच्छिक चकबंदी के सफल प्रयोग जिसका बहुत बार अध्ययन भी किया गया के पश्चात श्री पंवार द्वारा भी बिखरी जोत को एक जगह लाकर एक बेहतर उदाहरण प्रस्तुत किया गया है जिससे हम सब को प्रेरणा लेनी चाहिए । यही कारण है ही वे आज बागवानी की दिशा में उदाहरण बन पाये है ।
ये सफलता का उदाहरण उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण लगता है जो महानगरों में रहते अनुमान लगाते है कि उत्तराखंड में तो जैसे कुछ हो ही नहीं रहा है और एक काल्पनिक छवि अपने मन-मस्तिष्क में अंकित कर चुके है । अपने राज्य में ऐसे अनेकों सफल लोग है जो अपने-अपने तरीके से बेहतरी में लगे हुए किन्तु लोगों को इनके बारे में जानकारी का अभाव है । उम्मीद कर सकते है कि अन्य भी अपने-अपने तरीके से आने वाले वर्षों में उदाहरण प्रस्तुत करेगें और रोजगार देने वाले बनेगें ।
(श्री इंदरसिंह नेगी नागथात चकराता के रहने वाले हैं,सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहने के साथ साथ एक अच्छे रंगकर्मीं,सांस्कृतिक और सामाजिक सरोकारों से जुड़े व्यक्ति हैं।)

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