फॉरेस्ट कंजरर्वेशन एक्ट 1980 के अनुसार प्रदेश में 71 फीसद वन क्षेत्र घोषित

पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले जंगल को वन की श्रेणी से किया है सरकर ने बाहर

देवभूमि मीडिया ब्यूरो 

उत्तराखंड सरकार का आदेश सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के तहत

हाई कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की अध्यक्षता वाली खंडपीठ में सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता एसएन बाबुलकर ने बताया कि उत्तराखंड सरकार का आदेश सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के तहत है। सुप्रीम कोर्ट के ही गोंडावर्मन केस में पारित आदेश की भावना के अनुरूप है। महाधिवक्ता ने कहा कि इस आदेश से राज्यों में वन क्षेत्रफल बढ़ेगा।

नैनीताल : हाई कोर्ट नैनीताल ने प्रदेश सरकार के एक निर्णय को झटका देते हुए  सूबे के पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र के जंगल को वनों की श्रेणी से बाहर रखने के आदेश पर शुक्रवार को रोक लगा दी है। 

शुक्रवार को वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ में नैनीताल के पर्यावरणविद् प्रो. अजय रावत की जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। इसमें कहा गया है कि सरकार ने 19 फरवरी को संशोधित आदेश जारी कर पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले जंगल को वन की श्रेणी से बाहर कर दिया है। इससे पहले भी सरकार ने दस हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले जंगल को वन नहीं माना था। उस पर भी हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी, लेकिन सरकार ने संशोधित आदेश में 10 हेक्टेयर के स्थान पर पांच हेक्टेयर से कम जंगल को वनों की श्रेणी से बाहर करने का शासनादेश कर दिया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता राजीव बिष्ट ने कोर्ट को बताया कि फॉरेस्ट कंजरर्वेशन एक्ट 1980 के अनुसार प्रदेश में 71 फीसद वन क्षेत्र घोषित हैं। वनों की श्रेणी को भी विभाजित किया गया है। इसके अलावा भी कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जिन्हें किसी भी श्रेणी में नहीं रखा गया। याचिकाकर्ता के अनुसार इन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र की श्रेणी शामिल किया जाय। दलील सुनने के बाद कोर्ट ने सरकार के आदेश पर रोक लगाते हुए जवाब तलब किया है