प्रकृति संरक्षण और फसलों की पूजा का अनोखे पर्व हरेला की कुमाऊं में धूम

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मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र ने प्रदेशवासियों को दी हरेला पर्व की शुभकामनायें 

सावन माह में घर- घर में मनाया जाता है हरेला पर्व , पहाड़ के पारंपरिक अनाजों को सावन के नौ दिन पहले बो दिया जाता है घर के पूजा स्थल में 

हरेला पर्व सामाजिक सदभाव और संयुक्त परिवार का भी संदेश देता है, इस दौरान पूरे पखवाड़े में ग्रामीण पौधारोपण भी करते हैं

देवभूमि मीडिया ब्यूरो

नैनीताल। धरती माँ और अन्न की पूजा के प्रतीक पवित्र पर्व हरेला की इन दिनों कुमाऊं में धूम है। इस पर्व में सावन माह से नौ दिन पहले घर में पांच, सात या फिर नौ अलग-अलग अनाजों को बर्तन या फिर टोकरी में बो दिया जाता है और फिर सावन माह की पहली तिथि को इन अनाजों को काटा जाता है। प्रकृति के साथ संतुलन और अन्न की पूजा का ऐसा पर्व अपने आप में अनोखा है। इस दौरान पूरे पखवाड़े में ग्रामीण पौधारोपण भी करते हैं।
सावन माह में कुमाऊं क्षेत्र में घर- घर में हरेला पर्व मनाया जाता है। सामाजिक सदभाव और सुख समृद्धि के प्रतीक हरेला में गेहूं, मंडुवा, जौ, मक्का, गहत, भट्ट,राजमा और झिंगोरा जैसे पहाड़ के पारंपरिक अनाजों को घर के पूजा स्थल में सावन के नौ दिन पहले बो देते है।
यह सामाजिक सदभाव और संयुक्त परिवार का भी संदेश देता है। उसके बाद हरेला पर्व यानी सावन के पहले दिन इन अनाजों को काटा जाता है और बड़े बुजुर्ग,महिलाएं और बच्चे इसे अपने सर और कानों पर रखते है। सामाजिक कार्यकर्ता हरेंद्र बिष्ट बताते है कि उनके पूर्वज इस त्योहार को बड़े ही धूमधाम से मनाते थे। इस त्योहार के समय गाँव में उत्साह का माहौल रहता है। इस दौरान घरों में कई पकवान भी बनाए जाते है।

हरेला पर्व में छिपे हुए है अनेक सन्देश 

हरेला पर्व कृषि प्रधान परंपरा को आगे बढ़ाने की ऊर्जा समाज को देता है। इस पर्व में एक नही बल्कि अनेक संदेश छिपे है। इस दौरान हरेला पर्व के समय पौधारोपण की भी परंपरा है। मान्यता है कि सावन माह भगवान शिव को भी बहुत प्रिय है। इसलिए इस महीने पथरीली जमीन पर भी कुछ भी बोया जाए, वो अवश्य खिल उठेगा।
आचार्य विपिन जोशी बताते है कि कुमाऊं,गढ़वाल और हिमाचल प्रदेश के कई जिलों में हरेला पर्व मनाया जाता है। पर्यावरण संरक्षण के साथ ही ये पर्व सामाजिक सदभाव और प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी अहसास कराता है। कुमाऊं के नैनीताल, अल्मोड़ा,बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चम्पावत जिलों में इस पर्व को बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है।
हरेला पर्व पहाड़ की समृद्ध लोक संस्कृति की पहचान है। ये पर्व हमें ना सिर्फ धरती माँ के प्रति सम्मान का संदेश देता है, बल्कि अन्न की पूजा की भी सीख मिलती है। ऋतु परिवर्तन का संदेश देता हरेला आज भी कुमाऊं की वादियों में उसी अंदाज से मनाया जाता है जैसे वर्षों पहले मनाया जाता रहा है।