जीवाश्म ईंधन पर प्रतिबन्ध लगाने वाले शहरों की संख्या में हुआ पांच गुना इज़ाफ़ा

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वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए उत्सर्जन के ख़िलाफ़ जंग

देवभूमि मीडिया ब्यूरो

More than half of the world’s population lives in cities where three-fourth of the world’s electricity is consumed. For this reason, for the second year in a row, REN21, in its latest effort, analyzes how cities around the world use renewable energy in the war against emissions to prevent air pollution and climate change.

दुनिया की आधी से ज़्यादा आबादी ऐसे शहरों में रहती है जहाँ दुनिया की तीन चौथाई बिजली की खपत होती है। इसी वजह से, लगातार दूसरे साल, REN21 ने अपने ताज़ा प्रयास में विश्लेषण किया है कि वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए उत्सर्जन के ख़िलाफ़ जंग में दुनिया भर के शहर रिन्यूएबल ऊर्जा का उपयोग कैसे करते हैं।
उनके इस ताज़ा विश्लेष्ण, रिन्यूएबल्स इन सिटीज़ 2021 ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट, में पता चला है कि पिछले साल, 2020 में, जिन शहरों ने जीवाश्म ईंधन पर अधूरा या पूरा प्रतिबन्ध लगाया, उनकी संख्या में पांच गुना इज़ाफ़ा हुआ।

अपनी प्रतिक्रिया देते हुए REN21 की कार्यकारी निदेशक, राणा अदीब कहती हैं, “अधिक प्रभाव के साथ, एक रिन्यूएबल भविष्य की योजना, विकास और निर्माण के लिए शहर हमारे लिए सबसे बेहतरीन रास्ता हैं। लेकिन अक्सर इनकी क्षमताओं का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल नहीं होता। इस दिशा में राष्ट्रीय सरकारों को अपना धन, क्षमता और सबसे ज़रूरी वैधानिक शक्तियों को स्थानीय अधिकारियों के हाथों में सौप देना चाहिए।”

जीवाश्म ईंधन पर प्रतिबन्ध लगाना एक बढ़िया पहल है लेकिन अब शहरों को रिन्यूएबल क्षेत्रों में संक्रमण करना चाहिए और सभी क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधन के प्रयोग की अंतिम तिथियां निर्धारित करनी चाहिए। शहरों की जलवायु रणनीतियों की सफलता के लिए एक महत्वपूर्ण कारक होगा हीटिंग, कूलिंग, और परिवहन के लिए जीवाश्म ईंधन की जगह रिन्यूएबल एनर्जी का प्रयोग करना। ये क्षेत्र वैश्विक उत्सर्जन के सबसे बड़े हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं, और इनसे स्थानीय स्तर पर सबसे अच्छे से संबोधित किए जा सकता है।

रिपोर्ट से पता चलता है कि अमूमन इस दिशा में पहले कदम के तौर पर स्थानीय नेता शहर के लिए रिन्यूएबल बिजली खरीदते हैं, लेकिन अदीब का मानना है कि यह पर्याप्त नहीं। उन्होंने कहा, “हैम्बर्ग, सैन फ्रांसिस्को और शंघाई जैसे शहर हमें उदहारण बन दिखाते हैं कितना महत्वाकांक्षी होना ज़रूरी है इस लड़ाई के लिए।  ये शहर हर जगह रिन्यूएबल ऊर्जा के बारे में सोचते हैं-चाहें इमारतें बनाने के नियम हों या और तमाम जगहों और मौकों पर रिन्यूएबल ऊर्जा दायित्वों को लागू करना हो। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ये शहर गैस, तेल और कोयले के उपयोग के लिए एक अंतिम तिथि निर्धारित करते हैं।”

वर्ष 2020 तक, 43 शहरों ने ऐसा किया था और हीटिंग और / या परिवहन में जीवाश्म ईंधन के प्रतिबंधों को लागू किया था, और ये 2019 के मुक़ाबले पांच गुना अधिक था। कुल मिलाकर, एक अरब लोग – वैश्विक शहरी आबादी के लगभग एक चौथाई – रिन्यूएबल ऊर्जा लक्ष्य या नीति रखने वाले शहरों में रहते हैं । अदीब ने आगे कहा, “लेकिन चाहें ये उदाहरण कितने भी कितने प्रेरक हों, हम अब भी जलवायु परिवर्तन पर अंकुश लगाने के लिए जो ज़रुरत है उससे काफ़ी पीछे हैं।”
पिछले साल लॉक डाउन की वजह से स्वच्छ हवा और साफ आसमान की झलक देखने को मिली हमें। स्वच्छ हवा और कम शोर के वातावरण के परिणामस्वरूप जीवन शैली के पूर्ण परिवर्तन के साथ पिछले साल के लॉकडाउन ने नागरिकों को इस बात की एक झलक दी है संभावनाएं बहुत हैं अगर प्रदूषण पर लगाम लगायी जाए तो।

अच्छी बात ये है कि स्थानीय नेता प्रदूषणकारी जीवाश्म ईंधन से दूर जा कर अब इस गति को आगे बढ़ा रहे हैं और उनके स्थान पर स्वच्छ और लचीला ऊर्जा प्रणालियों का निर्माण कर रहे हैं। सैंटियागो (चिली) शहर के लिए पर्यावरण निदेशक, इसाबेल एग्युलेरा, बताती हैं, “बढ़ते नागरिक समर्थन ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कार्रवाई के लिए सैंटियागो को एक वास्तविक जनादेश दिया। हमारे निवासियों की मांग है कि सरकार साहसिक कदम उठाए।”

लेकिन इसमें दो राय नहीं कई रिन्यूएबल की दिशा में दौड़ का रास्ता बाधाओं से भरा हुआ है। रिन्यूएबल्स इन सिटीज़ 2021 ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि उत्सर्जन में कमी के अलावा, कई अन्य स्थानीय लाभ उन लोगों का इंतजार करते हैं जो अपनी ऊर्जा भविष्य को अपने हाथों में लेते हैं।

जापान और कोरिया गणराज्य से मिले हाल के उदाहरणों से पता चलता है कि शहर की सरकारें भी राष्ट्रीय सरकारों को अधिक महत्वाकांक्षी होने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। लेकिन ध्यान रहे, रिपोर्ट भले ही तमाम उत्साहजनक कहानियों को फीचर करती है, एक बड़ी संख्या में अभी ऐसे शहर हैं जिन्हें अभी तक यह नहीं पता की करना क्या है। साथ ही, उनके पास ऐसा करने के लिए इच्छाशक्ति और संसाधनों की भी कमी है।

बहरहाल, जो आगे बढ़ने के लिए तैयार और इच्छुक लगते हैं, वो भी बाधाओं का सामना करते हैं। अक्सर होता ये है कि शक्तिशाली जीवाश्म ईंधन के हितों वाली लॉबी के चलते शहरों की डीकार्बनआईज़ेशन योजनाओं पर रोक लग जाती है। राणा अदीब का कहना है, “यह एक दुखद तथ्य है कि दुनिया के शहरों में जहाँ भी जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से निकालने की कोशिश होती है, उद्योग वापस लड़ने के लिए बहुत सारे संसाधन लगा देते है। वे स्थानीय अधिकारियों को अदालत में ले जाते हैं या, जैसा कि हाल ही में अमेरिका में देखा गया है, राज्य के नीति निर्माताओं को इस तरह के फैसले लेने के लिए शहरों में कानूनी रूप से असंभव बनाने के लिए राजी कर देते हैं।”

अंततः संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम में शहरों का काम का नेतृत्व कर रही मार्टिना औटो, यह निष्कर्ष निकलती हैं कि, “यदि दुनिया भर में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सरकारें बेहतर वित्तीय स्थितियों के निर्माण से परे शहरों को अच्छी तरह से सहायता प्रदान करती हैं तो हम राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में महत्वाकांक्षा और प्रगति के स्तर को बढ़ा सकते हैं।”