सब जानते हैं गुनाहगार कौन? तो जांच किस बात की, जनाब ?

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पुल ढहने पर टेंडर कंपनी पर चले हत्या का मामला

टेंडर किसी कंपनी को, काम कर रहा था कोई और !

लोनिवि और एनएच के अफसरों को महज कमीशन से है मतलब

गुणानंद जखमोला 
ऋषिकेश-बदरीनाथ राजमार्ग पर गूलर के निकट निर्माणाधीन 90 मीटर पुल गिरने से एक मजदूर की मौत हो गयी। दूसरा वेंटीलेटर पर है, यानी उसके बचने की संभावनाएं क्षीण हैं। अन्य 12 बुरी तरह जख्मी हैं। सीएम ने दुख जताया, जांच के आदेश मुख्य सचिव को दिये। मुख्य सचिव ने डीएम को दिये, डीएम ने मजिस्ट्रेटी जांच बिठा दी। जांच लंबे समय तक चलेगी। सब जानते हैं कि गुनाहगार कौन है तो जांच किस बात की? स्पष्ट है कि चारधाम यात्रा मार्ग के टेंडर उत्तराखंड की कंपनियों को मिले ही नहीं। बाहर की कंपनियों को टेंडर दिये गये। कारण, अच्छे ठेकेदार तो अत्याधुनिक मशीनें, अच्छे इंजीनियर और वैज्ञानिक तरीके से पहाड़ो का कटान। लेकिन कहा जा रहा है हादसे के वक्त की मजदूरों के सिर पर हेलमेट भी नहीं था, अन्य सुरक्षा की बात क्या करें। ये वही ठेकेदार है जिसने देहरादून में आईएसबीटी फ्लाईओवर बनाया।
गोलमाल यह है कि इन बड़े ठेकेदार कंपनियों ने चारधाम के टेंडर लिए और छोटे ठेकेदारों को काम सौंप दिये। छोटे ठेकेदारों ने और छोटे ठेकेदारों को काम सौंप दिये। इन छोटे ठेकेदारों ने भी और भी छोटे ठेकेदारों को काम सौंप दिया। मूल पैसा चार-पांच ठेकेदारों की कमीशनखोरी में बंट गया। सूत्रों के मुताबिक पीडब्ल्यूडी और एनएच के अफसरों को निर्धारित कमीशन काटने के बाद आधी सी भी कम रकम यानी जो 100 रुपये में से 50 रुपये भी मुश्किल से सड़क निर्माण पर खर्च हो रहा है। ऐसे में पुल तो गिरना ही था। इसमें हंगामा क्यों? और होगा भी नहीं, क्योंकि इस देश में पुल गिरते हैं, मजदूर मरते हैं और सब भूल जाते हैं। मजदूर की जान की परवाह कौन करता है? जांच फाइलों में दफन हो जाती है और एक रिटायर्ड और थके हुए अफसर को जीवन यापन के लिए अंतहीन काम मिल जाता है। जांच तभी समाप्त होती है जब ये थका हुआ आदमी मर जाता है। बस, जांच खत्म। रुड़की गंगनहर का पुल टूटा, चैरास का पुल टूटा, रुद्रप्रयाग का वैलीब्रिज टूटा, पिथौरागढ़ का ब्रिज टूटा। सुना किसी को सजा हुई। आरोपी इंजीनियरों के प्रमोशन की बात तो मैंने भी सुनी।
किसी ने यह आवाज नहीं उठाई कि तोताघाटी छह माह के लिए क्यों बंद रही? क्योंकि आम जनता को पता ही नहीं होता कि सरकार और ठेकेदारों के बीच खेल क्या चल रहा है? तोताघाटी को बमों से उड़ा दिया गया और आज भी यह घाटी खतरे में है। यहां यदि मूल कंपनी काम करती तो अच्छी तकनीक और इंजीनियरिंग के दम पर बेहतर सड़क निर्माण होता, लेकिन ऐसा हुआ ही नहीं। चारधाम यात्रा मार्ग को चैड़ा करने के लिए बेतरतीब और अवैज्ञानिक तरीके से पहाड़ काट डाले गये हैं। गूलर का हादसा शुरूआत है। निकट भविष्य में ऐसे हादसे होते रहेंगे, कयोंकि मंत्रियों, अफसरों और ठेकेदारों को तो कमीशनखोरी से मतलब है। न एनएच और न लोनिवि के अफसरों को इस बात से मतलब है कि सड़क निर्माण मानकों पर हो रहा है या नहीं। मजदूर के सिर पर हेलमेट है या नहीं। उसे वेतन मिल रहा है या नहीं। अफसर और इंजीनियर को तो महज अपने कमीशन से मतलब है। वो मिलता रहे तो दुनिया जाए भाड़ में।
पुलों के गिरने का यह सिलसिला रोकना है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। ठेकेदार या अफसर पर हत्या का मामला दर्ज होना चाहिए और जांच निर्धारित समय में पूरी होनी चाहिए। नही तो हादसे होते रहेंगे और मौत दर मौत होती रहेगी।