• पेयजल के अवर अभियंताओं का ब्रिडकुल में प्रतिनियुक्ति का मामला! 
  • प्रतिनियुक्ति  समय सीमा समाप्त होने पर भी मूल विभाग में जाने को नहीं हैं तैयार !
  • एक चर्चित आईएएस इन्हे थैली के एवज़ में संविलियन को है तैयार!

देवभूमि मीडिया ब्यूरो 

देहरादून : उत्तराखंड में ब्यूरोक्रेसी के तमाम उलूल-जुलूल निर्णयों  के चलते प्रदेश की जनता में अपने ही जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आक्रोश बढ़ रहा है। यही ब्यूरोक्रेट राज्य के अस्तित्व में आने के दिन से लेकर अब तक जहाँ अपने बनाये नियमों को सूबे के अधिकारियों और कर्मचारियों पर थोपते रहे हैं तो वहीँ अपने चहेतों को इन्ही कायदे कानूनों को धत्ता बताते हुए उनके मनमाफिक स्थानों पर जहाँ स्थानांतरण, समायोजन और प्रतिनियुक्ति दे देते हैं जिससे सूबे के ने लोगों में आक्रोश पनपता रहा है जिसकी परिणीति बीते दिनों मुख्यमंत्री के जनता दरबार में देखने को मिली। यह अधिकारियों की धींगामुश्ती का ही परिणाम साफतौर पर कहा जा सकता है जिन्होंने तमाम कायदे कानूनों को ताक पर रखते हुए अपनों पर रहम तो गैरों पर करम किया जिसका खामियाजा मुख्यमंत्री को महिला के आक्रोश के रूप में भोगना पड़ा।

ऐसा नहीं  है कि  सूबे में  केवल शिक्षा विभाग में ही यह सब चल रहा है सूबे के पेयजल निगम से लेकर जलागम और लोकनिर्माण विभाग से लेकर सिंचाई विभाग और भी अन्य विभागों में सुगम-दुर्गम में स्थानांतरण से लेकर समायोजन और प्रतिनियुक्ति का खेल जमकर खेला जा रहा है। हर किसी अधिकारी व कर्मचारी को सुगम के साथ -साथ मलाईदार कुर्सी की दरकार है। इसमें इनके गॉडफादर बने कुछ आईएएस ,आईपीएस और पीसीएस अधिकारी इनकी मंशा पूरी करते रहे हैं।  चर्चा तो यहाँ तक है इसकी एवज में कुछ  अधिकारी इनसे इनसे मोटा चढ़ावा भी लेते रहे हैं।  यही कारण है कि इनकी दखलंदाजी से जहाँ  सूबे के विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं वहीँ इन कार्यों की गुणवत्ता इतनी गिर चुकी है कि बीते चार सालों में राज्य के उत्तरकाशी जिले के लगातार पांच वैली ब्रिज का गिरना इसका एक उदाहरण मात्र है। इतना ही नहीं इन अधिकारियों के दिखावे मात्र के लिए जांच का वादा तो कर  दिया लेकिन चार-पांच साल बाद आज तक उन जांचों का क्या परिणाम हुआ किसी को नहीं पता। 

उदाहरण स्वरूप यदि देखा जाय तो पूर्व मुख्यमंत्री खंडूरी के शासनकाल में तत्कालीन राज्य सरकार ने उत्तरप्रदेश राजकीय निर्माण निगम की तर्ज पर सूबे की एक निर्माण संस्था बनायी और उसका नाम रखा गया ब्रिड्कुल।  इस संस्था में सूबे के पेयजल विभाग से कुछ अवर अभियंताओं को प्रतिनियुक्ति पर ब्रिड्कुल में भेजा गया लेकिन अब पांच साल पूरा होने के बाद न तो ब्रिड्कुल उनको उनके मूल विभाग पेयजल में वापस भेजने को तैयार है और न ही ब्रिड्कुल में आये अवर अभियंता ही अब वापस पेयजल निगम में जाने को तैयार हैं। चर्चा है कि ब्रिड्कुल ने इन्हें पाने यहाँ प्रोजेक्ट मेनेजर बना डाला है जो अधिशाषी अभियंता अथवा अधीक्षण अभियंता के पदों के समरूप है ऐसे में वे अब ब्रिड्कुल की मलाईदार कुर्सी छोड़ने को कतई तब तैयार नहीं हैं जब पेजयल विभाग के महाप्रबंधक ने ब्रिड्कुल के महाप्रबंधक को इस सबको 30 जून तक उनके मूल विभाग में भेजने का पत्र लिख डाला था।  पत्र में साफ़ लिखा है कि यदि वे 30 जून तक अपने मूल विभाग में वापस नहीं लौटते है तो उनकी सेवाओं में ब्रेक हो सकता है। 

पेयजल निगम के महाप्रबंधक के इस पत्र के बाद ब्रिड्कुल में प्रतिनियुक्ति पर गए अभियंताओं ने अभी तक पेयजल निगम में अपनी सेवाएँ नहीं दी हैं जबकि आजकल चर्चा यहाँ तक है कि ये अभियंता मोटी थैली लेकर आजकल सचिवालय के चक्कर काट रहे हैं कि किसी अधिकारी को यह थैली भेंट कर दी जाय जो इनका ब्रिड्कुल में संविलियन करवा दे। क्योंकि इससे पहले सचिवालय में एक चर्चित आईएएस ने इनको ब्रिड़कुल में ही प्रतिनियुक्ति का समय विस्तार दे दिया था। सचिवालय के गलियारों में चर्चा सरे आम है कि अभियंताओं की यह थैली इस चर्चित आईएएस के कार्यालय तक पहुँच भी गयी है लेकिन चर्चित आईएएस समय का इंतज़ार कर रहा है। चर्चा यह भी है सूबे का यह चर्चित आईएएस आजकल ख़ुफ़िया विभाग के कैमरे के साये  में है जिस कारण वह किसी भी तरह के विवादित निर्णय से बचता  रहा है।

अब यह देखने वाली बात होगी कि सरकार इस  तरह से प्रतिनियुक्ति पर दूसरे विभागों में मलाईदार पदों पर काम कर रहे अभियंताओं को वापस अपने मूल विभाग में जाने का फरमान सुनाती है या इस चर्चित आईएएस के दबाव आकर और आईएएस थैली के प्रभाव में आकर राज्य के साथ इन्साफ करता है या नहीं।  

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