कर्मचारी संगठनों को तुरन्त ऐसे अराजक लोगों को देनी होगी हिदायत

ऐसे बर्ताव से कर्मचारी संगठन अपने आंदोलन की मूल अवधारणा को कर रहे हैं नेस्तनाबूत 

शशि भूषण मैठाणी “पारस”

ये डॉक्टर हेमंत बिष्ट हैं  हम दोनों एक साथ  टाट पट्टी पर बैठकर स्कूल से पढ़े हैं । हेमंत बिष्ट को मैं अच्छे से जानता हूँ । वह बेहद सीधे व  सरल व्यवहार का व्यक्ति है । आज सुबह अचानक से जब हेमन्त का यह वीडियो देखा तो पहले हंसी  और बाद में गुस्सा भी आया । हंसी इसलिए कि वह मेरा बालसखा है और बचपन में हम मसखरी करते हुए एक दूसरे के स्कूल बैग में चुपके से कंडाली के पत्ते डाल देते थे । या कभी-कभी अपने गुरुजनों के द्वारा जब किसी एक साथी को कंडाली से सतोड़ा जाता था, तो और छात्र  मुस्कराते थे कि, चलो मैं बच गया । मुझे भी जब अंग्रेजी के अध्यापक नेगी जी द्वारा एक बार कंडाली लगाई गई थी तो हेमन्त, लाखी, विजेंद्र और अन्य खूब हंसे थे । 

हेमंत बिष्ट को कभी कंडाली इसलिए नहीं लगाई गई क्योंकि वह पढ़ने में बहुत होशियार था राइटिंग बहुत सुंदर थी । और हमेशा साफ-सुथरा रहता था । इस नाते वह टीचरों का चहेता भी था । 

आज जब दशकों बाद अपने बालसखा को कंडाली से तिलमिलाते हुए वीडियो देखा तो बचपन याद आ गया और सोचा कि आखिरकार हेमन्त को भी कंडाली की झपाक मिल ही गई ।  इस नाते ठिठोलीबस मुझे हंसी भी आई ।  लेकिन उससे ज्यादा मुझे उन तथाकथित कर्मचारियों की इस बेहूदी हरकत पर गुस्सा आया, जिनकी वजह से हेमन्त को इतना आगबबूला होना पड़ा । मैं हेमंत की समझदारी और सहनशक्ति की भी तारीफ करूँगा कि इस दरमियान हेमंत ने अपनी भाषा व व्यवहार में बहुत संयम का परिचय दिया । 

अब कई लोग कह रहे हैं कि , हेमंत को ऐसा गुस्सा क्यों आया ? क्या हेमंत को संगठन में कदम से कदम मिलाकर नहीं चलना चाहिए ? या फिर हेमंत संगठन को कुछ मानते ही नहीं हैं ? ऐसे कई सवाल वीडियो देखने वालों के दिल और दिमाग में उधेड़बुन कर रहे हैं । 

लेकिन हेमंत की इस नाराजगी की वजह वही जान सकता है जिसने पहाड़ का जीवन जिया हो और कंडाली की झपाक भी खाई हो । 

कंडाली का अचानक से लगना, या जानबूझकर लगाया, जाना दोनों ही स्थिति में यह बेहद कष्टकारी है ।  और वर्तमान में एक अजीब सी अराजकता उत्तराखंड में खासकर पहाड़ों में  हड़ताली कर्मचारियों के व्यवहार में देखी जा रही है । कंडाली लगाना मतलब सीधा-सीधा किसी पर हमला करने जैसा है कृत्य है । 

जब मैं गोपेश्वर में था तो मैंने तब खुद वर्ष 2006 तक वहां थाने में देखा है कि हर दिन दो ताजी कंडाली की टहनी पानी में भिगाकर रख ली जाती थी । तब गैर कानूनी काम करने वालों को पुलिस के थप्पड़ या डंडे का खौप नहीं बल्कि थाने के एक कोने में सजाई गई कंडाली घास का भय सताता था । पुलिस को ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ती थी । सिर्फ एक पत्ता कंडाली का तोड़ कर आरोपी के जूते के अंदर रखकर फिर उसे पहना दिया जाता था,  जिसके बाद आरोपी की पेंट गीली हो जाती थी और वह धार तब तक बहती थी, जब तक कि वह अपना गुनाह कबूल न ले या सच न बता दे । ऐसे में आप लोग समझ सकते हैं कि कंडाली घास कितनी खतरनाक हो सकती है ।   

अब आजकल प्रमोशन में आरक्षण के विरोध में उतरे कुछ कर्मचारियों द्वारा प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में जिस तरह कंडाली का खतरनाक खेल खेला जा रहा है वह वाकई किसी को भी हैरान परेशान करने के लिए काफी है ।  हड़ताल करना कर्मचारियों का लोकतांत्रिक अधिकार है वह करें और करते रहें कोई मना नहीं कर रहा है । लेकिन इस तरह से आप अपने ही साथ के कर्मचारियों को कंडाली से सतोड़ने का काम जो कर रहे हो वह वाकई निंदनीय है । यह भी एक तरह की मॉव लिंचिंग ही है । आप समूह में जाकर किसी एक कर्मचारी को एक साथ सतोड़ रहे हो तो यह गलत है।

कुछ दिन पूर्व पौड़ी में भी ऐसा ही कृत्य सामने आया जिसकी सबने आलोचना की और अब टिहरी कैम्पस में डॉक्टर हेमन्त के साथ यह बर्ताव बेहद चिंतनीय व निंदनीय है । 

कर्मचारी संगठनों को तुरन्त ऐसे अराजक लोगों को हिदायत देनी होगी और प्रशासन को ऐसे मामलों का संज्ञान लेकर इन लोगों को चिन्हित कर आपराधिक मामले दर्ज करने चाहिए ।  ऐसे बर्ताव से कर्मचारी संगठन अपने आंदोलन की मूल अवधारणा को नेस्तनाबूत कर रहे हैं ।